धार भोजशाला मामले में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और गजट को लेकर अहम सवाल
ASI ने 1958 के गजट का हवाला दिया, वहीं इंटरविनर पक्ष ने मस्जिद होने के पुख्ता प्रमाण पेश किए

धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर चल रहे बहुचर्चित विवाद में कोर्ट की सुनवाई अब निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ती नजर आ रही है। सोमवार को हुई सुनवाई में जहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने अपने तर्कों की शुरुआत की, वहीं कोर्ट ने भी कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील सवाल उठाए, जिनका सीधा संबंध इस स्थल की ऐतिहासिक पहचान से है।
कोर्ट के अहम सवाल: सबसे पहले नाम कहां दर्ज?
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पूछा कि भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद का नाम सबसे पहले किस आधिकारिक दस्तावेज में दर्ज हुआ था? क्या इस संबंध में कभी कोई शासकीय नोटिफिकेशन जारी किया गया था?इस पर ऑनलाइन जुड़े हिंदू फ्रंट फार जस्टिस के वकील ने जानकारी दी कि वर्ष 2003 में दायर एक याचिका में इस विषय का उल्लेख किया गया था।वहीं ASI की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील जैन ने वर्ष 1958 में जारी गजट का हवाला देते हुए बताया कि उस समय इस स्थल को संरक्षित स्मारक के रूप में दर्ज किया गया था।
98 दिन के सर्वे पर टिकी नजरें
ASI ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष 2024 में कोर्ट के आदेश पर अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से 98 दिनों तक विस्तृत सर्वे किया गया, जिसकी रिपोर्ट पहले ही कोर्ट में प्रस्तुत की जा चुकी है।अब आगामी सुनवाई में सुनील जैन इस रिपोर्ट का बिंदुवार विश्लेषण पेश करेंगे और बताएंगे कि सर्वे के दौरान भोजशाला परिसर में क्या-क्या महत्वपूर्ण साक्ष्य मिले। यह रिपोर्ट मामले की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।इसके बाद मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद अपने तर्क प्रस्तुत करेंगे, जिससे बहस और भी गहन होने की संभावना है।
इंटरविनर पक्ष के तर्क: मस्जिद होने के संकेत
मामले में इंटरविनर बने स्थानीय पक्षकारों—जिब्रान अंसारी, फिरोज और अयाज—की ओर से उनके वकील सैय्यद अशहर अली वारसी ने अपने तर्क रखते हुए कहा कि किसी भी मंदिर की पहचान उसके स्थापत्य से होती है, जिसमें शिखर, गोपुरम, मंडप और गर्भगृह जैसे प्रमुख तत्व अनिवार्य होते हैं।उन्होंने दावा किया कि भोजशाला परिसर में ऐसे कोई स्पष्ट मंदिर संरचनात्मक तत्व मौजूद नहीं हैं।
इसके विपरीत उन्होंने यह तर्क दिया कि मस्जिद के लिए आवश्यक विशेषताएं—
- किबला (मक्का की दिशा में बनी दीवार)
- मेहराब (नमाज की दिशा दर्शाने वाली संरचना)
- सहन (खुला आंगन)
- वजू के लिए जलस्रोत
- इमाम के लिए मिंबर
ये सभी तत्व भोजशाला परिसर में मौजूद हैं, जो इसे मस्जिद होने की ओर संकेत करते हैं।
ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला
इंटरविनर पक्ष ने अपने तर्कों को मजबूत करते हुए कहा कि पुराने दस्तावेजों में भी इस स्थल को मस्जिद के रूप में वर्णित किया गया है।उन्होंने वर्ष 1935 के धार रियासत के गजट और वर्ष 1952 में जारी ASI कमिश्नर की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि इन दस्तावेजों में नमाज होने और मस्जिद के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं।साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि राजा भोज द्वारा मंदिर निर्माण के जो दावे किए जा रहे हैं, उनके समर्थन में अब तक कोई प्रमाणिक दस्तावेज या शपथपत्र कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
आगे क्या?
मामले की अगली सुनवाई में ASI अपनी विस्तृत सर्वे रिपोर्ट के तथ्यों को कोर्ट के सामने रखेगा, जिसके बाद दूसरे पक्ष की दलीलें सुनी जाएंगी।यह मामला न केवल ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलता से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में कोर्ट का अंतिम निर्णय व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
