दमोह, मध्य प्रदेश 20 अप्रैल, 2026/अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर समूचा देश भगवान विष्णु के छठवें अवतार, शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता भगवान परशुराम की जन्मोत्सव के उल्लास में डूबा नजर आया। मध्य प्रदेश के दमोह जिले में भी इस अवसर पर भक्ति और शक्ति का अनूठा संगम देखने को मिला। सुबह की शांत बेला में जहाँ वैदिक मंत्रोच्चार के साथ अनुष्ठान हुए, वहीं संध्या काल में निकली भव्य शोभायात्रा ने नगर को केसरिया रंग में सरोबार कर दिया।
प्रातः काल: परशुराम टेकरी पर हवन और पूजन
दिवस का शुभारंभ नगर की प्रसिद्ध परशुराम टेकरी पर हुआ। सनातन धर्म की प्राचीन मान्यताओं और परंपराओं का निर्वहन करते हुए विप्र समाज द्वारा विशेष हवन-पूजन का आयोजन किया गया।वैदिक अनुष्ठान: विद्वान पंडितों के सानिध्य में विश्व कल्याण की कामना के साथ आहुतियां दी गईं।अक्षय पुण्य: श्रद्धालुओं ने भगवान परशुराम के चरणों में मत्था टेककर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगा। मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन किया गया दान और पूजन कभी क्षय नहीं होता।
संध्या काल: जनसैलाब और भक्ति का उल्लास
शाम होते ही सिविल वार्ड स्थित शिव-पार्वती मंदिर परिसर में भारी जनसमूह एकत्रित हुआ। यहाँ से भगवान परशुराम की भव्य शोभायात्रा का श्रीगणेश हुआ।शोभायात्रा का स्वरूप: सुसज्जित रथ पर भगवान परशुराम की दिव्य प्रतिमा विराजमान थी। यात्रा में हजारों की संख्या में विप्र समाज के पुरुष, महिलाएं और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए।नृत्य और संगीत: पारंपरिक वाद्य यंत्रों, ढोल-नगाड़ों और बैंड-बाजे की धुन पर युवा और महिलाएं जमकर थिरके।जयघोष: ‘जय परशुराम’ और ‘ब्राह्मण एकता’ के जयकारों से नगर की गलियां और प्रमुख मार्ग गूंज उठे।जगह-जगह स्वागत: नगर के प्रमुख चौराहों पर विभिन्न सामाजिक संगठनों और नागरिकों द्वारा पुष्प वर्षा कर शोभायात्रा का आत्मीय स्वागत किया गया। पेयजल और स्वल्पाहार की व्यवस्था भी जगह-जगह देखने को मिली।
कौन हैं भगवान परशुराम? (पौराणिक महत्व)
भगवान परशुराम मात्र एक जाति या वर्ग के आराध्य नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए न्याय और तपस्या के प्रतीक हैं।”अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः। इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि॥”(अर्थ: जिनके आगे चारों वेद हैं और पीठ पर धनुष-बाण, अर्थात् जो शास्त्र और शस्त्र दोनों में निपुण हैं।)विष्णु के अवतार: इन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। इनका जन्म त्रेतायुग में ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र के रूप में हुआ था।अमरता का वरदान: परशुराम जी को ‘सप्त चिरंजीवी’ (सात अमर महापुरुषों) में गिना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वे आज भी महेंद्रगिरि पर्वत पर तपस्यारत हैं।शस्त्र और शास्त्र: उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर ‘परशु’ (फरसा) प्राप्त किया था। वे शस्त्र विद्या के महान गुरु थे, जिन्होंने भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे योद्धाओं को शिक्षा दी थी।अधर्म का विनाश: उन्होंने पृथ्वी को आततायी और अहंकारी क्षत्रियों के आतंक से मुक्त कराने के लिए 21 बार अभियान चलाया था।दमोह में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम ने न केवल धार्मिक आस्था को प्रदर्शित किया, बल्कि सामाजिक एकजुटता का संदेश भी दिया। देर रात तक चले इस उत्सव ने वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बनाए रखा।
