17 टंकियों, लीकेज, बिजली कटौती और पतली पाइपलाइन का हवाला; मगर करोड़ों की योजनाओं के बाद भी शहर प्यासा क्यों?

( डॉ. एल.एन. वैष्णव)
दमोह शहर में गहराते पेयजल संकट ने अब प्रशासनिक गलियारों से लेकर आम नागरिकों के घरों तक बेचैनी पैदा कर दी है। एक ओर नागरिक 2 से 3 दिन तक पानी के इंतजार में बाल्टी-कुप्पे सजाकर बैठे हैं, तो दूसरी ओर नगर पालिका अब तकनीकी कारणों का लंबा लेखा-जोखा पेश कर अपनी जिम्मेदारी हल्की करने में जुटी दिखाई दे रही है।
लगातार मिल रही शिकायतों, जनप्रतिनिधियों के दबाव और मीडिया में उठते सवालों के बीच आज कलेक्टर प्रताप नारायण यादव की अध्यक्षता में नगर के जनप्रतिनिधियों, पार्षदों और नगर पालिका अधिकारियों की एक अहम बैठक आयोजित की गई, जिसमें शहर की चरमराई जलापूर्ति व्यवस्था को लेकर गंभीर चर्चा हुई।
कलेक्टर ने सभी पार्षदों से उनके-उनके वार्डों की समस्याएं सुनीं और साफ संकेत दिए कि अब पेयजल संकट को लेकर ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। प्रशासन ने तत्काल राहत और स्थाई समाधान — दोनों स्तरों पर काम करने की बात कही है।
लेकिन बैठक के बाद जब मुख्य नगर पालिका अधिकारी राजेंद्र लोधी ने अपनी सफाई रखी तो कई नए सवाल खड़े हो गए।
सीएमओ बोले – सिर्फ 17 टंकियों से चल रहा पूरा शहर

मुख्य नगर पालिका अधिकारी राजेंद्र लोधी के अनुसार दमोह नगर का विस्तार तेजी से बढ़ा है, लेकिन शहर में वर्तमान में मात्र 17 पानी की टंकियां हैं, जिनसे कई जगह 2 से 3 वार्डों में सप्लाई देनी पड़ रही है। इससे पानी का दबाव प्रभावित होता है और अंतिम छोर तक पर्याप्त जल नहीं पहुंच पाता।
उन्होंने कहा कि:
- गर्मी में मांग कई गुना बढ़ जाती है,
- बिजली कटौती के कारण टंकियां समय पर नहीं भरतीं,
- अनेक स्थानों पर पाइपलाइन लीकेज है,
- पुरानी 4 इंच की पाइपलाइन वर्तमान जरूरत के हिसाब से छोटी पड़ रही है।
सीएमओ ने यह भी कहा कि अब नए एस्टीमेट में दबाव और पाइपलाइन क्षमता को ध्यान में रखा जा रहा है तथा सुधार एक निरंतर प्रक्रिया है।
उनका दावा है कि 20 साल पहले लोग हैंडपंपों पर निर्भर थे, आज घर-घर पानी पहुंच रहा है, अब इस व्यवस्था को और मजबूत करना लक्ष्य है।
लेकिन यही तो सबसे बड़ा प्रश्न है—20 साल में किया क्या गया?
सीएमओ का यह बयान सुनने के बाद शहर में सबसे तीखा सवाल यही उठ रहा है कि:
यदि 17 टंकियां अपर्याप्त थीं तो पिछले वर्षों में नई टंकियां क्यों नहीं बनीं?
यदि 4 इंच की पाइपलाइन कम थी तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी उसे बदला क्यों नहीं गया?
यदि लीकेज वर्षों से थे तो मरम्मत का बजट कहां गया?
यदि शहर का विस्तार बढ़ रहा था तो जल वितरण का मास्टर प्लान किसने रोके रखा?
यानी जिन कारणों को आज समस्या की जड़ बताया जा रहा है, वे कोई अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं हैं।
ये सभी समस्याएं वर्षों पुरानी हैं — और यही नगर पालिका प्रशासन की सबसे बड़ी विफलता मानी जा रही है।
नगर के वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि दमोह ने वह दौर भी देखा है जब हर गली में पीले पानी के कुप्पे रखे दिखाई देते थे। तब करोड़ों की योजनाएं आईं, पाइपलाइन बिछी, टंकियां बनीं, पंप हाउस सुधारे गए, लेकिन आज फिर वही जल संकट लौट आया है।
तो फिर स्वाभाविक है कि जनता पूछे —
इतने सालों में खर्च हुआ पैसा क्या सिर्फ कागजों में बहा?
तकनीकी कारण या जिम्मेदारी से बचने की कोशिश?
नगर पालिका अधिकारी बिजली कटौती, लीकेज, टंकी की कमी और पाइपलाइन का व्यास गिनाकर समस्या का तकनीकी पक्ष सामने रख रहे हैं, लेकिन आम नागरिकों का मानना है कि यह आधा सच है।
क्योंकि तकनीकी कमियां तभी संकट बनती हैं जब:
- समय पर सर्वे न हो,
- विस्तार योजना न बने,
- रखरखाव न किया जाए,
- लीकेज बंद न हों,
- वितरण की निगरानी न हो,
- और शिकायतों को गंभीरता से न लिया जाए।
शहर में चर्चा है कि नगर पालिका में लंबे समय से बैठे लापरवाह अधिकारियों की सुस्ती और कार्यों की कमजोर मॉनिटरिंग ने पूरे जल प्रबंधन को खोखला कर दिया। हर बार गर्मी में यही संकट आता है, बैठकें होती हैं, मरम्मत के प्रस्ताव बनते हैं, बजट जारी होता है और कुछ महीनों बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
क्या फिर शुरू होगा पानी के नाम पर करोड़ों का नया खेल?
कलेक्टर की बैठक के बाद अब पाइपलाइन सुधार, नए वाल्व, डाइवर्टर, तकनीकी स्वीकृति, अतिरिक्त व्यवस्था और वार्डवार सप्लाई प्लान की बातें हो रही हैं। नगर पालिका ने मुनादी कराकर यह भी घोषित किया है कि अब दो दिन में नागरिकों को पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा।
लेकिन शहर में यह सवाल भी जोर पकड़ रहा है कि:
क्या हर बार की तरह इस बार भी जल संकट करोड़ों के नए प्रस्तावों का रास्ता बनेगा?
क्योंकि जब पुराने कार्यों का हिसाब स्पष्ट नहीं, योजनाओं का मूल्यांकन नहीं, और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय नहीं — तब नए एस्टीमेट जनता के मन में संदेह पैदा कर रहे हैं।
जनता अब घोषणा नहीं, नतीजा चाहती है
दमोह की जनता के लिए यह सिर्फ पानी का मसला नहीं, बल्कि भरोसे का संकट बन चुका है।
लोग पूछ रहे हैं:
- क्या इस बार सच में तय समय पर पानी मिलेगा?
- क्या 17 टंकियों की व्यवस्था बढ़ेगी?
- क्या पुरानी पतली पाइपलाइन बदलेगी?
- क्या लीकेज बंद होंगे?
- क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?
या फिर यह बैठक भी गर्मी निकलते ही फाइलों में दफन हो जाएगी?
कलेक्टर की सख्ती ने व्यवस्था को झटका जरूर दिया है,
सीएमओ ने तकनीकी कारण भी गिना दिए हैं,
मगर दमोह की प्यास तब बुझेगी जब नलों में पानी और प्रशासन में जवाबदेही दोनों साथ दिखाई देंगे।
फिलहाल शहर का एक ही सवाल है—
20 साल में सुधरा क्या, और अब बदलेगा क्या?
