छोटे वाहन चालकों पर सख्ती, लेकिन ट्रांसपोर्टरों पर नरमी की चर्चा… क्या शहर में चयनात्मक ट्रैफिक प्रवर्तन चल रहा है?

(डॉ. एल.एन. वैष्णव)
दमोह, 3 मई 2026/दमोह नगर की यातायात व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। कारण—शहर की सड़कों पर सक्रिय बताई जा रही अत्याधुनिक इंटरसेप्टर व्यवस्था के बावजूद नो-एंट्री क्षेत्र में भारी वाहनों की लगातार मौजूदगी, नगर के भीतर संचालित ट्रांसपोर्ट सप्लाई का निर्बाध दबाव, और बाहरी मालवाहक वाहनों पर अपेक्षित कार्रवाई का अभाव। नागरिकों के बीच अब यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर इंटरसेप्टर जिस उद्देश्य से लाई गई थी, क्या वह उद्देश्य धरातल पर पूरा हो रहा है या नहीं?
जब यह हाईटेक प्रवर्तन वाहन दमोह को मिला था, तब दावा किया गया था कि अब यातायात पुलिस तकनीक के सहारे ओवरस्पीड, नियम उल्लंघन, भारी वाहन नियंत्रण, संदिग्ध वाहन ट्रैकिंग और शहरी ट्रैफिक अनुशासन को नई दिशा देगी। उम्मीद थी कि शहर के प्रवेश बिंदुओं से लेकर नो-एंट्री कॉरिडोर तक निगरानी मजबूत होगी और भारी मालवाहक वाहनों की मनमानी पर रोक लगेगी। लेकिन शहर का वर्तमान दृश्य इन दावों के ठीक उलट कई सवाल खड़े कर रहा है।
नो-एंट्री बोर्ड लगे हैं, लेकिन ट्रक भी दौड़ रहे हैं

दमोह के भीड़भाड़ वाले शहरी हिस्सों में दिन के समय भी भारी मालवाहक ट्रक, सीमेंट लोडर, सरिया वाहन और ट्रांसपोर्ट सप्लाई गाड़ियां आसानी से देखी जा सकती हैं। कई बार ये वाहन मुख्य बाजार संपर्क मार्गों तक पहुंचते हैं, जिससे पहले से जूझ रही सड़कें पूरी तरह जाम जैसी स्थिति में आ जाती हैं।
सवाल यह है कि—क्या इन वाहनों को अधिकृत अनुमति दी जाती है? यदि हां, तो उसका कोई सार्वजनिक प्रोटोकॉल क्यों नजर नहीं आता? यदि नहीं, तो इंटरसेप्टर और यातायात निगरानी के बावजूद ये वाहन नो-एंट्री में प्रवेश कैसे कर रहे हैं?यही वह बिंदु है जहां तकनीकी संसाधन और जमीनी परिणाम के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
इंटरसेप्टर का उद्देश्य केवल हेलमेट चेकिंग नहीं था
यातायात विशेषज्ञ मानते हैं कि इंटरसेप्टर वाहन का मूल उपयोग होता है—तेज रफ्तार निगरानी,नंबर प्लेट कैप्चर,नो-एंट्री उल्लंघन रिकॉर्ड,भारी वाहन ट्रैकिंग,मोबाइल प्रवर्तन,संवेदनशील मार्गों पर तत्काल रोकथाम
अर्थात यह केवल सड़क किनारे खड़ी चालान मशीन नहीं, बल्कि गतिशील नियंत्रण तंत्र है।ऐसी स्थिति में यदि शहर के भीतर भारी वाहनों का दबाव जस का तस है तो यह पूछना स्वाभाविक है कि इंटरसेप्टर की वास्तविक फील्ड डिप्लॉयमेंट कितनी प्रभावी है?
जनता का आरोप—छोटे वाहन चालकों पर कार्रवाई, बड़े वाहन बेफिक्र
दमोह के नागरिकों में यह धारणा लगातार मजबूत हुई है कि यातायात पुलिस की दृश्य सख्ती प्रायः दोपहिया चालकों, हेलमेट जांच, सीट बेल्ट, कागज चेकिंग और सामान्य चालानों तक सीमित दिखाई देती है।जबकि दूसरी ओर—बाहरी ट्रांसपोर्ट वाहन,भारी मालवाहक एंट्री,नो-एंट्री उल्लंघन,शहर के भीतर लोडिंग-अनलोडिंगजैसी बड़ी समस्याओं पर वैसी निरंतर कार्रवाई सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं देती।यही वजह है कि अब शहर में यह सवाल खुलकर पूछा जाने लगा है—क्या ट्रैफिक प्रवर्तन का कठोर चेहरा वहीं तक सीमित है जहां प्रतिरोध कम है?
ट्रांसपोर्ट कारोबारियों पर नरमी की चर्चा क्यों?
यातायात हलकों में इन दिनों एक और फुसफुसाहट चर्चा का विषय बनी हुई है—कुछ चर्चित सहयोगियों के माध्यम से ट्रांसपोर्ट कारोबारियों तक व्यवस्थागत सहजता पहुंचने की बात।हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन शहर में कई लोग इसे भारी वाहनों पर सीमित कार्रवाई से जोड़कर देखते हैं।
स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि कुछ ट्रांसपोर्ट परिचालन ऐसे हैं जिन्हें नो-एंट्री समय, वैकल्पिक मार्ग और निगरानी गतिविधियों की पूर्व जानकारी सहज उपलब्ध रहती है। यदि यह केवल जनचर्चा है तो इसे प्रशासनिक पारदर्शिता से खारिज किया जाना चाहिए, लेकिन यदि इन चर्चाओं में जरा भी तथ्य है तो मामला बेहद गंभीर माना जाएगा।
क्योंकि तब प्रश्न केवल ट्रैफिक जाम का नहीं रहेगा, बल्कि प्रवर्तन तंत्र की निष्पक्षता का होगा।
इंटरसेप्टर पर सार्वजनिक जवाबदेही जरूरी
अब नागरिक जानना चाहते हैं—इंटरसेप्टर प्रतिदिन किन मार्गों पर तैनात होती है?,पिछले एक महीने में कितने नो-एंट्री उल्लंघन दर्ज हुए?,कितने भारी बाहरी वाहनों पर चालान बना?,कितने ट्रांसपोर्ट वाहनों को नगर सीमा से वापस किया गया?,क्या इंटरसेप्टर की डिजिटल मॉनिटरिंग रिपोर्ट सार्वजनिक की जा सकती है?
यदि इस तकनीकी व्यवस्था का उपयोग मुख्यतः औपचारिक चेकिंग तक सीमित है और शहर की सबसे बड़ी यातायात समस्या जस की तस बनी हुई है, तो फिर इसके उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
दमोह में सवाल अब सिर्फ ट्रैफिक का नहीं, भरोसे का है
यातायात व्यवस्था तब मजबूत मानी जाती है जब नियम सब पर समान रूप से लागू होते दिखाई दें।लेकिन यदि छोटे वाहन चालकों पर सख्ती और बड़े ट्रांसपोर्ट दबाव पर नरमी की धारणा बन जाए, तो जनता के मन में निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है।दमोह में यही संदेह अब चर्चा का रूप ले चुका है।
इंटरसेप्टर आई, तकनीक आई, दावे हुए—लेकिन यदि नो-एंट्री में ट्रक अब भी दौड़ रहे हैं, तो शहर पूछेगा ही—सड़क पर मशीन है, मगर नियमों पर पकड़ किसकी है?
