12 वर्षों में लाखों शिकायतें, हजारों समाधान; लेकिन अब व्यवस्था के सामने खड़े हैं कई असहज सवाल
रैंकिंग की होड़, आदतन शिकायतकर्ता, मानसिक दबाव और जवाबदेही के असंतुलन पर विशेष पड़ताल

( डॉ.एल.एन.वैष्णव)
मध्य प्रदेश में वर्ष 2014 में शुरू हुई सीएम हेल्पलाइन 181 को उस समय सुशासन की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल माना गया था। शासन का उद्देश्य स्पष्ट था—प्रदेश का कोई भी नागरिक अपनी समस्या सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचा सके, बिना किसी सिफारिश और बिना सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाए उसकी शिकायत दर्ज हो और निर्धारित समय सीमा में उसका निराकरण हो।
शुरुआती वर्षों में इस व्यवस्था ने लाखों लोगों को राहत पहुंचाई। राजस्व, बिजली, पानी, सड़क, पेंशन, राशन, शिक्षा, स्वास्थ्य और नगरीय सेवाओं से जुड़ी अनेक शिकायतों का समाधान हुआ। ऐसे हजारों उदाहरण सामने आए जहां वर्षों से लंबित समस्याओं का समाधान सीएम हेल्पलाइन के माध्यम से संभव हो सका।लेकिन आज, लगभग एक दशक बाद, प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों, सरकारी कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों के बीच एक नई बहस जन्म ले चुकी है।
सवाल यह नहीं है कि सीएम हेल्पलाइन उपयोगी है या नहीं।सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था अब अपने मूल उद्देश्य से भटकती जा रही है?क्या यह जनता की समस्याओं के समाधान का मंच बनी हुई है या फिर कुछ लोगों के लिए “शिकायत आधारित प्रभाव और कमाई” का माध्यम बनती जा रही है?
शिकायतकर्ता या पेशेवर शिकायतबाज?
प्रदेश के लगभग हर जिले में अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच कुछ ऐसे नाम चर्चा में रहते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे वर्षों से लगातार सीएम हेल्पलाइन में शिकायतें दर्ज करा रहे हैं।आरोप यह नहीं है कि वे शिकायत करते हैं।
लोकतंत्र में शिकायत करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। लेकिन प्रश्न तब उठता है जब एक शिकायत के निराकरण के बाद उसी विषय पर दूसरी शिकायत आ जाती है।
फिर तीसरी।
फिर चौथी।
फिर पांचवीं।
कई बार शिकायत का विषय वही रहता है, केवल शिकायतकर्ता का नाम बदल जाता है।
सूत्रों के अनुसार कुछ मामलों में स्वयं के अलावा पत्नी, पुत्र, पुत्री, भाई, रिश्तेदार अथवा परिचितों के मोबाइल नंबरों का उपयोग कर एक ही विषय पर बार-बार शिकायतें दर्ज कराई जाती हैं।यदि ऐसा हो रहा है तो यह केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं बल्कि पूरी शिकायत निवारण व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए भी गंभीर प्रश्न है।
क्या सीएम हेल्पलाइन के आसपास विकसित हो रहा है एक नया ‘शिकायत तंत्र‘?
प्रशासनिक स्तर पर भले ही कोई खुलकर स्वीकार न करे, लेकिन कर्मचारियों के बीच यह चर्चा आम है कि कुछ लोगों ने शिकायत दर्ज कराने को एक प्रकार की नियमित गतिविधि बना लिया है। कुछ कर्मचारी तो व्यंग्य में ऐसे लोगों को “फुल टाइम शिकायतकर्ता” तक कहने लगे हैं।गांवों और कस्बों में भी यह चर्चा सुनाई देती है कि कुछ लोग दिनभर सरकारी कार्यालयों में कम और शिकायत पोर्टलों पर अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं।
प्रश्न यह है—
क्या सरकार के पास ऐसे लोगों का कोई विश्लेषणात्मक डाटा है?
क्या यह देखा जाता है कि एक व्यक्ति ने पांच वर्षों में कितनी शिकायतें कीं?
उनमें से कितनी सही निकलीं?
कितनी गलत पाई गईं?
और कितनी बार एक ही विषय को दोहराया गया?
यदि यह विश्लेषण नहीं हो रहा तो होना चाहिए।
क्या शिकायत बंद कराने के नाम पर भी चल रहा है खेल?
यह विषय सबसे संवेदनशील है।
कई जिलों में समय-समय पर ऐसी चर्चाएं सामने आती रही हैं कि कुछ लोग शिकायत दर्ज कराने के बाद संबंधित पक्षों पर दबाव बनाते हैं।फिर शिकायत बंद करने या संतुष्टि दर्ज कराने के बदले समझौते की स्थिति बनती है।
आज यूपीआई और ऑनलाइन भुगतान के युग में मोबाइल नंबर केवल संपर्क का माध्यम नहीं, बल्कि वित्तीय लेन-देन का भी माध्यम बन चुके हैं।ऐसे में यह प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या शिकायत प्रणाली के दुरुपयोग की निगरानी के लिए कोई स्वतंत्र तंत्र मौजूद है?
यदि कोई व्यक्ति बार-बार शिकायत दर्ज कर आर्थिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करता है तो उसे चिन्हित करने की व्यवस्था क्या है? और यदि ऐसी व्यवस्था नहीं है तो क्यों नहीं है?
जिले के मुखिया सब जानते हैं, फिर कार्रवाई क्यों नहीं?
यह सवाल प्रशासनिक गलियारों में सबसे ज्यादा सुनाई देता है।
कलेक्टर जानते हैं।
सीईओ जानते हैं।
विभाग प्रमुख जानते हैं।
अनुविभागीय अधिकारी जानते हैं।
कार्यालय प्रमुख जानते हैं।
अधिकांश मामलों में यह जानकारी रहती है कि कौन व्यक्ति बार-बार शिकायतें कर रहा है और किन विषयों पर कर रहा है।फिर भी ऐसे लोगों के खिलाफ शायद ही कभी कोई प्रभावी कार्रवाई दिखाई देती है।
क्या कारण है? क्या वर्तमान नियम कार्रवाई की अनुमति नहीं देते? क्या शासन ने ऐसे मामलों के लिए अलग नीति नहीं बनाई?
या फिर रैंकिंग और शिकायत संख्या के दबाव के बीच यह विषय प्राथमिकता ही नहीं बन पाता?
रैंकिंग का खेल: समाधान पीछे, आंकड़े आगे?
सीएम हेल्पलाइन की सबसे बड़ी विडंबना शायद इसकी रैंकिंग व्यवस्था बन चुकी है।
हर माह समीक्षा।
हर माह रिपोर्ट।
हर माह अंक।
हर माह जिलों की सूची।
हर माह विभागों की तुलना।
निश्चित रूप से प्रतिस्पर्धा कार्य संस्कृति को बेहतर बनाती है, लेकिन जब रैंकिंग स्वयं लक्ष्य बन जाए तो समस्या शुरू होती है। प्रदेश के कई कर्मचारियों का कहना है कि अब शिकायत का वास्तविक समाधान उतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया है जितना उसका “क्लोजर”। कई बार शिकायत का समाधान हो जाता है लेकिन शिकायतकर्ता संतुष्टि दर्ज नहीं करता।
परिणाम?
अधिकारी की रैंकिंग प्रभावित।
कर्मचारी पर दबाव।
वरिष्ठ अधिकारी की नाराजगी।
और फिर शुरू होता है संतुष्टि प्राप्त करने का अभियान।
हाथ जोड़ते कर्मचारी, मुस्कुराता सिस्टम
आज कई विभागों में यह स्थिति देखने को मिलती है कि कर्मचारी शिकायतकर्ता को बार-बार फोन करते हैं।
“सर, शिकायत बंद कर दीजिए।”
“मैडम, संतुष्टि दर्ज कर दीजिए।”
“हमने काम कर दिया है, कृपया प्रतिक्रिया दे दीजिए।”
एक समय था जब जनता अधिकारी के पीछे घूमती थी।
आज कई मामलों में अधिकारी जनता के पीछे घूमते दिखाई देते हैं।
यह स्थिति व्यवस्था की सफलता का प्रतीक है या विफलता का?
इस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
कर्मचारियों का मानसिक स्वास्थ्य भी मुद्दा है
सीएम हेल्पलाइन की चर्चा में एक पक्ष अक्सर गायब रहता है—सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों का मानसिक स्वास्थ्य।
पटवारी।
सचिव।
लाइनमैन।
शिक्षक।
स्वास्थ्य कर्मचारी।
नगरपालिका कर्मचारी।
लिपिक।
राजस्व अधिकारी।
इनमें से अधिकांश पहले ही कार्यभार से दबे रहते हैं।
इसके ऊपर लगातार शिकायतें, समीक्षा बैठकें, नोटिस, स्पष्टीकरण और रैंकिंग का दबाव जुड़ जाता है। कई कर्मचारी स्वीकार करते हैं कि सीएम हेल्पलाइन के कारण उनका तनाव पहले की तुलना में कई गुना बढ़ गया है।
सबसे बड़ा नुकसान किसका?
विडंबना यह है कि इस पूरे तंत्र का सबसे बड़ा नुकसान वास्तविक शिकायतकर्ता को उठाना पड़ सकता है। जब सिस्टम हजारों दोहराई गई शिकायतों, निरर्थक शिकायतों और आदतन शिकायतकर्ताओं के मामलों में व्यस्त रहेगा, तब उस किसान की शिकायत पीछे चली जाएगी जिसे सिंचाई की समस्या है।
उस बुजुर्ग की शिकायत पीछे चली जाएगी जिसकी पेंशन बंद है। उस गरीब परिवार की शिकायत पीछे चली जाएगी जिसे राशन नहीं मिल रहा। और यही वह स्थिति है जिससे बचने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी।
समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि सीएम हेल्पलाइन को और प्रभावी बनाने के लिए अब दूसरे चरण के सुधारों की आवश्यकता है।
- आदतन शिकायतकर्ताओं की डिजिटल प्रोफाइलिंग।
- एक विषय पर बार-बार शिकायतों की स्वतः पहचान।
- तथ्यहीन शिकायतों पर चेतावनी और दंड।
- शिकायतकर्ता और विभाग दोनों की जवाबदेही।
- रैंकिंग के साथ गुणवत्ता आधारित मूल्यांकन।
- स्वतंत्र ऑडिट व्यवस्था।
- कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य और कार्यभार की समीक्षा।
- शिकायतों के वास्तविक सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन।
अंतिम प्रश्न
सीएम हेल्पलाइन ने मध्य प्रदेश में सुशासन को नई दिशा दी है, इसमें कोई दो राय नहीं।लेकिन क्या अब समय नहीं आ गया है कि व्यवस्था स्वयं अपना आत्ममंथन करे?क्या शिकायतों की संख्या ही सफलता का पैमाना है? क्या हर शिकायत सही होती है?क्या हर शिकायतकर्ता निष्पक्ष होता है?क्या केवल अधिकारी ही जवाबदेह हैं?क्या शिकायतकर्ता की भी कोई जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या सीएम हेल्पलाइन का उद्देश्य जनता को न्याय दिलाना है या केवल रैंकिंग की सूची में ऊपर आना?
इन प्रश्नों के उत्तर ही तय करेंगे कि आने वाले वर्षों में सीएम हेल्पलाइन सुशासन का सबसे मजबूत हथियार बनेगी या फिर अपने ही बोझ तले दबती चली जाएगी।
क्योंकि किसी भी व्यवस्था की सफलता शिकायतों की संख्या से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और पारदर्शी समाधान से तय होती है।
