बकायन सहित नौ ग्राम पंचायतों के ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री के नाम सौंपा ज्ञापन, मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता और जनभागीदारी की उठाई मांग
(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
दमोह/बटियागढ़। मध्य प्रदेश के दमोह जिले की पथरिया विधानसभा अंतर्गत बटियागढ़ विकासखंड के ग्राम बकायन स्थित सैकड़ों वर्ष प्राचीन श्री कौशलाधीश हनुमान शाला मंदिर को शासकीय सार्वजनिक ट्रस्ट घोषित करने की मांग अब जोर पकड़ने लगी है। मंदिर के प्रबंधन, आय-व्यय और संपत्ति के संचालन को लेकर बढ़ती नाराजगी के बीच क्षेत्र के ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नाम जिला प्रशासन के माध्यम से विस्तृत ज्ञापन सौंपकर मंदिर के संचालन हेतु शासकीय समिति गठित करने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह मंदिर केवल बकायन गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के कई गांवों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में मंदिर के संचालन, चढ़ावे और संपत्तियों के संरक्षण के लिए पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
सैकड़ों वर्षों से आस्था का केंद्र है शाला मंदिर
बटियागढ़ विकासखंड के ग्राम बकायन में स्थित श्री कौशलाधीश हनुमान शाला मंदिर क्षेत्र की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान माना जाता है। स्थानीय जनश्रुतियों और परंपराओं के अनुसार यह मंदिर सैकड़ों वर्ष प्राचीन है तथा श्री रामानंदी वैष्णव संप्रदाय की परंपराओं और सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुरूप संचालित होता रहा है।
मंदिर में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के परम भक्त पवनपुत्र हनुमान की सिद्ध प्रतिमा विराजमान है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य फलित होती है। मनोकामना पूर्ण होने पर भक्तों द्वारा कपूर की आरती करने की परंपरा आज भी निरंतर निभाई जा रही है।
विशेष अवसरों, धार्मिक आयोजनों और पर्व-त्योहारों के दौरान यहां दूर-दूर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
महंत महादेव दास बोरे बाबा के ब्रह्मलीन होने के बाद बढ़ा विवाद
ग्रामीणों के अनुसार, लंबे समय तक मंदिर की महंत आसंदी पर विराजमान रहे महंत महादेव दास बोरे बाबा के ब्रह्मलीन होने के बाद मंदिर के प्रबंधन और उत्तराधिकार को लेकर विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई है।
मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि बोरे बाबा के समय में मंदिर की व्यवस्थाएं व्यवस्थित रूप से संचालित होती थीं, लेकिन उनके ब्रह्मलीन होने के बाद मंदिर की संपत्तियों, चढ़ावे और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इसी कारण मंदिर के संचालन और निर्णय प्रक्रिया को लेकर श्रद्धालुओं तथा स्थानीय ग्रामीणों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
मौजूदा प्रबंधन पर ग्रामीणों ने लगाए गंभीर आरोप
ज्ञापन में ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि वर्तमान में मंदिर की व्यवस्थाओं में पारदर्शिता का अभाव है। मंदिर में प्राप्त होने वाले चढ़ावे, दान राशि और अन्य आय के उपयोग को लेकर ग्रामीणों को कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी जाती।
ग्रामीणों का आरोप है कि मंदिर की संपत्तियों और आर्थिक संसाधनों के प्रबंधन में अनियमितताएं हो रही हैं तथा कुछ लोगों को विशेष संरक्षण देकर निर्णय लिए जा रहे हैं। ग्रामीणों ने मंदिर के चढ़ावे और संपत्तियों की निष्पक्ष जांच कराए जाने की भी मांग की है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित पक्ष की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
महामंडलेश्वर की उपाधि को लेकर उठ रहे सवाल
ग्रामीणों के बीच वर्तमान महंत द्वारा स्वयं को “महामंडलेश्वर” बताए जाने को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। ग्रामीणों का कहना है कि भारतीय संत परंपरा में महामंडलेश्वर की उपाधि प्रदान करने की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि इस संबंध में स्पष्ट किया जाए कि संबंधित उपाधि किस संस्था या अखाड़े द्वारा प्रदान की गई है तथा क्या निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया है।
शासकीय सार्वजनिक ट्रस्ट गठन की मांग

ज्ञापन में ग्रामीणों ने कहा है कि मंदिर क्षेत्र की अमूल्य धार्मिक धरोहर है और इससे कई गांवों की आस्था जुड़ी हुई है। इसलिए मंदिर को शासकीय सार्वजनिक ट्रस्ट घोषित कर उसके संचालन के लिए एक समिति गठित की जाए।
ग्रामीणों का मानना है कि ट्रस्ट गठन के बाद मंदिर की आय-व्यय का नियमित लेखा-जोखा रखा जा सकेगा, चढ़ावे और दान राशि का पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित होगा, मंदिर की अचल संपत्तियों का संरक्षण किया जा सकेगा, श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी तथा स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों की सहभागिता बढ़ेगी।
नौ ग्राम पंचायतों की आस्था जुड़ी है मंदिर से
ज्ञापन के अनुसार, मंदिर से जुड़े निर्णयों में बकायन, मोटा, मैनवार, फतेरा, सकतपुर, अहरोरा, चैनपुरा, लुकायन और बहोरी भाट सहित आसपास के गांवों की धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि इन सभी ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों को मंदिर प्रबंधन समिति में उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए, ताकि निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता और जनभागीदारी सुनिश्चित हो सके।
मुख्यमंत्री सहित विभिन्न अधिकारियों को भेजा गया ज्ञापन
ग्रामीणों द्वारा सौंपा गया ज्ञापन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नाम संबोधित है। इसकी प्रतिलिपि प्रदेश सरकार के मंत्रियों, स्थानीय विधायक, जिला प्रशासन और अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) पथरिया को भी भेजी गई है।
बड़ी संख्या में ग्रामीण हुए शामिल
ज्ञापन सौंपने वालों में पुरुषोत्तम असाटी, वीरेंद्र पटेल (प्रतिनिधि सरपंच, बकायन), महेंद्र पटेल (प्रतिनिधि सरपंच, मोटा), श्रीराम पटेल (किसान संघ अध्यक्ष, सकतपुर), सुनील नंबरदार (पूर्व सरपंच, लुकायन), आनंद पटेल, कैलाश पटेल, अशोक पटेल, द्वारका पटेल, अशोक पटेल (हिनौता), रणमत सुमेर, साधु पटेल (लुकायन), तुलसीराम पटेल, रुपनारायण जैन, रितेश पटेल (सुमेर), दस्सी रैकवार, अशोक अहिरवार, संधू अहीरवाल, परशुराम अहिरवार, रंगनाथ पटेल, जितेंद्र पटेल, सचिन पटेल, मुलु पटेल, राममिलन मिश्रा, विशाल पटेल और सुधीश प्रजापति सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल रहे।
कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी
ग्रामीणों का कहना है कि उनकी मांग किसी व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं, बल्कि मंदिर की गरिमा, पारदर्शिता और श्रद्धालुओं के हितों की रक्षा के लिए है।
उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि मंदिर के प्रबंधन और संपत्तियों की निष्पक्ष जांच कर शीघ्र निर्णय लिया जाए। साथ ही चेतावनी दी है कि यदि समय रहते उचित कार्रवाई नहीं की गई, तो वे लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।
ग्रामीणों ने पारदर्शी व्यवस्था की उठाई मांग
ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर उनके पूर्वजों की आस्था और विरासत का प्रतीक है। इसलिए मंदिर से जुड़े सभी निर्णय पारदर्शी तरीके से होने चाहिए और समय-समय पर आय-व्यय तथा विकास कार्यों की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
