18 जून पुण्यतिथि विशेष

लेखिका : डॉ. निवेदिता शर्मा
(अध्यक्ष, मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग)
“खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी” — सुभद्रा कुमारी चौहान की यह अमर पंक्ति भारतीय जनमानस में रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का स्थायी स्मरण है।
18 जून 1858 को ग्वालियर की धरती पर वीरगति प्राप्त करने वाली झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई भारतीय इतिहास की उन विरल विभूतियों में हैं, जिनका जीवन साहस, स्वाभिमान, राष्ट्रभक्ति और नारी-शक्ति का अद्वितीय उदाहरण बन गया।
आज उनकी पुण्यतिथि के दिन ग्वालियर स्थित उनकी समाधि पर प्रतिवर्ष श्रद्धांजलि सभाएँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और मेला आयोजित होता है, जहाँ देशभर से लोग आकर इस महान वीरांगना को नमन करते हैं।
मणिकर्णिका से लक्ष्मीबाई तक का सफर
इतिहास हमें बताता है कि लगभग 1828 में वाराणसी में मणिकर्णिका तांबे के रूप में जन्मी लक्ष्मीबाई का बचपन सामान्य राजकन्याओं जैसा नहीं था। उन्हें घुड़सवारी, तलवारबाजी, धनुर्विद्या और युद्धकला का प्रशिक्षण मिला। यही कारण था कि आगे चलकर वे केवल एक रानी होने तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि रणभूमि में सेना का नेतृत्व करने वाली योद्धा बन गईं।
झाँसी के महाराजा गंगाधर राव से विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई पड़ा। पति की मृत्यु और दत्तक पुत्र दामोदर राव को उत्तराधिकारी मानने से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के इनकार ने उनके जीवन को निर्णायक मोड़ दिया।
लॉर्ड डलहौजी की ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ अर्थात व्यपगत सिद्धांत के अंतर्गत झाँसी को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने का प्रयास किया गया, जिसे रानी ने सिरे से अस्वीकार कर दिया।
“मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी” : प्रतिरोध का अमर उद्घोष
रानी लक्ष्मीबाई का प्रसिद्ध संकल्प — “मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी” — भारतीय प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।
1857 के विद्रोह के दौरान उन्होंने झाँसी की रक्षा का नेतृत्व किया और अंग्रेजी सेना के विरुद्ध अभूतपूर्व साहस दिखाया। वीर सावरकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Indian War of Independence 1857 (मूल मराठी: 1857 चे स्वातंत्र्यसमर) में 1857 की घटनाओं को “भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” बताया और रानी लक्ष्मीबाई को उसके प्रमुख नायकों में स्थान दिया।
सावरकर ने लिखा कि यह केवल सैनिक विद्रोह नहीं था, बल्कि विदेशी शासन के विरुद्ध व्यापक राष्ट्रीय संघर्ष था। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व को देशभक्ति, संगठन क्षमता और युद्धकौशल का अद्वितीय संगम बताया।
इतिहास और साहित्य में रानी लक्ष्मीबाई
रानी लक्ष्मीबाई के जीवन को समझने के लिए अनेक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ उपलब्ध हैं। इनमें प्रमुख हैं—
- वी. डी. सावरकर — The Indian War of Independence 1857 (प्रथम प्रकाशन : 1909)
- विष्णुभट्ट गोडसे — माझा प्रवास (Mazha Pravas)
- Joyce Chapman Lebra — The Rani of Jhansi: A Study in Female Heroism in India
- महाश्वेता देवी — झाँसी की रानी (Jhansir Rani)
- Tapti Roy — The Rani of Jhansi: Gender, History and Fable in India
इन कृतियों ने रानी लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व, उनके संघर्ष और भारतीय जनमानस पर उनके प्रभाव को विभिन्न दृष्टिकोणों से प्रस्तुत किया है।
नारी-शक्ति और राष्ट्रभक्ति का अद्वितीय उदाहरण
रानी लक्ष्मीबाई की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने उस युग में स्त्री की परंपरागत सीमाओं को तोड़ा। वे शासक होने के साथ-साथ रणनीतिकार, सैन्य नेत्री और प्रेरणास्रोत के रूप में सामने आईं।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका पर चर्चा होते ही लक्ष्मीबाई का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उनके जीवन ने यह सिद्ध किया कि राष्ट्ररक्षा और स्वतंत्रता के संघर्ष में स्त्री-पुरुष का भेद गौण है।
ग्वालियर की धरती पर वीरगति
1858 में जब अंग्रेजी सेना ने झाँसी पर अधिकार कर लिया, तब रानी कालपी पहुँचीं और तत्पश्चात तात्या टोपे के साथ ग्वालियर की ओर बढ़ीं।
ग्वालियर पर विद्रोहियों का नियंत्रण स्थापित हुआ, किंतु अंग्रेजी सेना ने शीघ्र ही पलटवार किया। 18 जून 1858 को कोटा-की-सराय के निकट युद्ध में रानी गंभीर रूप से घायल हुईं और वीरगति को प्राप्त हुईं।
कहा जाता है कि उन्होंने अपने शरीर को अंग्रेजों के हाथ न लगने देने का आदेश दिया था। आज ग्वालियर में स्थित उनकी समाधि भारतीय राष्ट्र-चेतना की तीर्थस्थली है।
पुण्यतिथि पर उमड़ती है श्रद्धा
हर वर्ष 18 जून को ग्वालियर में उनकी समाधि पर श्रद्धांजलि समारोह आयोजित होता है। मध्य प्रदेश शासन, स्थानीय प्रशासन, इतिहासकार, सामाजिक संगठन और हजारों नागरिक वहाँ पहुँचकर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं।
मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम, वीर रस की कविताएँ, लोकनृत्य तथा स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी प्रदर्शनी आयोजित की जाती हैं। वास्तव में यह आयोजन केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति और साहस का संदेश देने का माध्यम भी है।
राष्ट्र-चेतना की अमर प्रतीक
आज, उनकी पुण्यतिथि पर जब हम ग्वालियर की समाधि पर उमड़ती श्रद्धा को देखते हैं, तो स्पष्ट होता है कि लक्ष्मीबाई इतिहास का अध्याय मात्र नहीं, बल्कि वर्तमान भारत की राष्ट्रीय चेतना का जीवंत प्रमाण हैं।
उनका जीवन हमें सिखाता है कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, स्वाभिमान की रक्षा और मातृभूमि के लिए सर्वस्व अर्पित करने का साहस ही सच्ची वीरता है।
रानी लक्ष्मीबाई का प्रभाव भारतीय इतिहास की सीमाओं से कहीं आगे बढ़कर हमारे साहित्य, लोकगीत, नाटक, सिनेमा और जनस्मृति के कण-कण में समाया हुआ है। उन्हें कभी सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कविता में अमर किया, तो कभी वीर सावरकर जैसे स्वतंत्रता सेनानियों और साहित्य साधकों ने अपने लेखन के माध्यम से नई पीढ़ियों तक पहुँचाया।
वास्तव में वे केवल झाँसी की रानी नहीं थीं; वे कल भी और आज भी हर उस भारतीय के लिए प्रेरणा-पुंज हैं, जो अपनी माटी, अपनी सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति समर्पण रखता है।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन।
