(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
दमोह। शहर के हृदय स्थल घंटाघर पर शुक्रवार, 19 जून को नगर पालिका, प्रशासन और यातायात पुलिस की मौजूदगी में चलाया गया अतिक्रमण हटाओ अभियान अब कार्रवाई से ज्यादा सवालों के घेरे में आ गया है। नगर पालिका की जेसीबी ने फुटपाथ पर वर्षों से अपनी आजीविका चला रहे गरीब और छोटे दुकानदारों पर तो जमकर कार्रवाई की, लेकिन बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों के सामने फैले अतिक्रमण पर दिखाई गई नरमी शहरभर में चर्चा का विषय बनी हुई है।
सबसे अधिक प्रभावित वे कुंभकार प्रजापति परिवार रहे, जो पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन बनाकर और बेचकर अपना जीवनयापन करते आए हैं। उनके ठेले, दुकानें और सामान हटाए गए, लेकिन शहर के लोगों के मन में एक ही सवाल गूंजता रहा—क्या अतिक्रमण केवल गरीबों का ही होता है?
क्या कानून की नजर में सब बराबर हैं?
घंटाघर और आसपास के क्षेत्रों में ऐसे कई बड़े प्रतिष्ठान हैं, जिनके सामने स्थायी रूप से सामान रखा जाता है। कई व्यापारियों ने दुकानों के सामने कॉरिडोर और सार्वजनिक स्थानों पर कब्जा कर रखा है। कुछ स्थानों पर तो मूल दुकानों के ऊपर अस्थायी निर्माण और शेड लगाकर सार्वजनिक जगह का उपयोग किया जा रहा है।स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन बड़े प्रतिष्ठानों को कार्रवाई से पहले सूचना दी गई, उन्हें अपना सामान हटाने के लिए पर्याप्त समय दिया गया और कई मामलों में प्रशासन की मौजूदगी के बावजूद कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मीडिया के पहुंचने के बाद कार्रवाई का स्वरूप बदलता दिखाई दिया। लेकिन तब तक कई बड़े दुकानदार अपना सामान सुरक्षित कर चुके थे।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—
- क्या अतिक्रमण हटाओ अभियान केवल गरीब और फुटपाथी दुकानदारों तक सीमित है?
- क्या बड़े व्यापारियों के लिए अलग नियम और छोटे दुकानदारों के लिए अलग कानून लागू होता है?
- क्या प्रशासन कार्रवाई से पहले प्रभावशाली लोगों को सूचित करता है?
- क्या सड़क सुरक्षा समिति के निर्णयों में सामाजिक और आर्थिक संतुलन का ध्यान रखा गया?

लाखों रुपये के ट्रैफिक सिग्नल बने मलबा, जिम्मेदार कौन?
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान घंटाघर पर लगे यातायात सिग्नलों को भी नगर पालिका की जेसीबी ने जमींदोज कर दिया। यही वह सिग्नल हैं, जिन्हें कुछ वर्ष पूर्व नगर पालिका ने लाखों रुपये की लागत से स्थापित किया था। विडंबना देखिए कि जिस व्यवस्था को कभी शहर की यातायात समस्या का समाधान बताया गया था, आज उसी को अनुपयोगी घोषित कर हटाया जा रहा है।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जनता के पैसे की जवाबदेही तय कौन करेगा? यदि सिग्नल अनुपयोगी थे, तो इन्हें लगाने का निर्णय किसने लिया? यदि इन्हें हटाना जरूरी था, तो क्या किसी तकनीकी समिति या विशेषज्ञ एजेंसी की रिपोर्ट सार्वजनिक की गई? यदि सिग्नलों के खंभों की आड़ में अतिक्रमण हो रहा था, तो अतिक्रमणकारियों पर कार्रवाई करने के बजाय पूरी व्यवस्था को ही खत्म करना क्या समस्या का समाधान है?
80 के दशक में जरूरत थी, तो आज क्यों नहीं?
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि 1980 के दशक में घंटाघर चौराहे पर मैन्युअल ट्रैफिक सिग्नल संचालित होते थे। उस समय शहर की आबादी वर्तमान की तुलना में लगभग आधी थी और वाहनों की संख्या भी बेहद कम थी।
आज स्थिति बिल्कुल उलट है।
- शहर की आबादी कई गुना बढ़ चुकी है।
- दोपहिया और चारपहिया वाहनों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है।
- घंटाघर क्षेत्र शहर का सबसे व्यस्त व्यावसायिक केंद्र बन चुका है।
- यातायात दबाव पहले से कहीं अधिक है।
ऐसे समय में यातायात सिग्नलों को हटाने का निर्णय आम नागरिकों की समझ से परे है। क्या शहर में आधुनिक ट्रैफिक प्रबंधन की जरूरत खत्म हो गई है? क्या दमोह जैसे तेजी से बढ़ते शहर को अब सिग्नल मुक्त बनाने की योजना है? या फिर यह निर्णय बिना दूरगामी सोच और ठोस अध्ययन के आधार पर लिया गया है?
अधिकारी क्या कहते हैं?
मुख्य नगर पालिका अधिकारी राजेंद्र सिंह लोधी का कहना है कि यह कार्रवाई सड़क सुरक्षा समिति के निर्णय के अनुसार की जा रही है। जब उनसे बड़े व्यापारियों द्वारा किए गए अतिक्रमण, कॉरिडोर पर कब्जे और दुकानों के ऊपर बने अवैध ढांचों के संबंध में सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कार्रवाई का आश्वासन दिया, लेकिन स्पष्ट समयसीमा नहीं बताई। यातायात सिग्नलों को हटाने के संबंध में उन्होंने कहा कि ये अनुपयोगी हो चुके थे और इनके खंभों की आड़ में अतिक्रमण बढ़ रहा था।
नायब तहसीलदार रघुनंदन चतुर्वेदी ने इस पूरी कार्रवाई को नगर पालिका का अभियान बताते हुए कहा कि प्रशासनिक दृष्टि से उनकी मौजूदगी मौके पर थी। यातायात प्रभारी दलबीर सिंह मार्को ने भी कहा कि सड़क सुरक्षा समिति के निर्णय के तहत कार्रवाई की जा रही है।
जवाबदेही तय होना जरूरी
शहर की जनता यह जानना चाहती है कि सड़क सुरक्षा समिति की बैठक कब हुई, उसमें कौन-कौन सदस्य शामिल थे और किस आधार पर ट्रैफिक सिग्नलों को हटाने का निर्णय लिया गया?क्या इस निर्णय की कोई सार्वजनिक रिपोर्ट है?क्या नगर पालिका ट्रैफिक सिग्नल लगाने और हटाने में खर्च हुई राशि का ब्यौरा सार्वजनिक करेगी?
क्या भविष्य में शहर के प्रमुख चौराहों पर कोई वैकल्पिक यातायात व्यवस्था लागू की जाएगी?और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—क्या अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में समानता और पारदर्शिता सुनिश्चित की जाएगी?
प्रशासन को यह समझना होगा कि अतिक्रमण हटाना आवश्यक है, लेकिन कार्रवाई निष्पक्ष और समान होनी चाहिए। गरीबों की रोजी-रोटी छीनकर यदि प्रभावशाली लोगों को संरक्षण मिलता है, तो यह व्यवस्था पर लोगों के विश्वास को कमजोर करता है।घंटाघर की यह कार्रवाई सिर्फ अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक प्राथमिकताओं, सार्वजनिक धन के उपयोग और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।अब शहर की नजर इस बात पर है कि प्रशासन इन सवालों का जवाब देता है या फिर यह मुद्दा भी कुछ दिनों की चर्चा बनकर रह जाएगा।
