क्या संगठनात्मक “एसआईआर” के बिना कमजोर पड़ सकती है वैचारिक पहचान?
लेखक: डॉ. एल.एन. वैष्णव
भारतीय राजनीति में यदि किसी दल ने विचारधारा, संगठन और कार्यकर्ता संस्कृति के बल पर अपनी अलग पहचान बनाई है, तो वह भारतीय जनता पार्टी है। भारतीय जनसंघ से शुरू हुई यात्रा आज विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल तक पहुंच चुकी है। यह विस्तार किसी एक नेता, एक चुनाव या एक रणनीति का परिणाम नहीं, बल्कि लाखों कार्यकर्ताओं के दशकों लंबे त्याग, संघर्ष और वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रतिफल है।
भाजपा का मूल चरित्र एक कैडर आधारित संगठन का रहा है, जहां सत्ता साध्य नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में परिवर्तन का साधन मानी गई। यही कारण था कि जब भाजपा सत्ता से दूर थी, तब भी उसके कार्यकर्ताओं का उत्साह और समर्पण कम नहीं हुआ।
लेकिन आज, जब पार्टी अपने राजनीतिक उत्कर्ष के शिखर पर है, तब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि अपने मूल वैचारिक चरित्र को बचाए रखने की है।
प्रश्न यह नहीं है कि भाजपा कितनी बड़ी हो गई है।
प्रश्न यह है कि क्या बढ़ते आकार के साथ वह अपने मूल स्वरूप को सुरक्षित रख पाएगी?
संघर्ष के दिनों की भाजपा और आज की भाजपा
एक समय था, जब भाजपा का झंडा उठाना आसान नहीं था। सीमित संसाधन, राजनीतिक उपेक्षा और वैचारिक विरोध के बीच कार्यकर्ताओं ने बूथ से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संगठन को मजबूत किया।उस दौर में भाजपा से जुड़ने वाले लोगों के सामने सत्ता का आकर्षण नहीं, बल्कि विचारधारा की प्रतिबद्धता होती थी।वे जानते थे कि संगठन में आगे बढ़ने का रास्ता संघर्ष, धैर्य, अनुशासन और निरंतर कार्य से होकर गुजरता है।लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। सत्ता के विस्तार के साथ भाजपा की लोकप्रियता और प्रभाव बढ़ा है। इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं, लेकिन इसके साथ एक नई चुनौती भी पैदा हुई है—अवसरवाद।सवाल यह है कि क्या भाजपा अब वैचारिक आंदोलन से आगे बढ़कर सत्ता केंद्रित राजनीतिक मंच बनती जा रही है?
वैचारिक प्रतिबद्धता बनाम राजनीतिक उपयोगिता
आज पार्टी के भीतर और बाहर सबसे बड़ी बहस इसी मुद्दे को लेकर है।जो लोग वर्षों तक भाजपा की नीतियों, नेतृत्व और विचारधारा के आलोचक रहे, जो कांग्रेस, वामपंथ या अन्य दलों के मंचों से भाजपा का विरोध करते रहे, वे आज उसी पार्टी में सम्मानित और प्रभावशाली स्थान प्राप्त कर रहे हैं।लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति को अपनी राजनीतिक सोच बदलने का अधिकार है। विचार बदलना कोई अपराध नहीं है। लेकिन किसी वैचारिक संगठन के लिए यह जानना आवश्यक है कि बदलाव केवल राजनीतिक है या वैचारिक भी।क्या इन लोगों ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उनके पुराने विचार बदल चुके हैं?
क्या उन्होंने अपने पूर्व बयानों और आरोपों पर आत्ममंथन किया?क्या उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जिस विचारधारा का वे कल तक विरोध कर रहे थे, आज उसी के साथ क्यों खड़े हैं?या फिर सत्ता की निकटता ने विचारधारा की दूरी को समाप्त कर दिया है? यही वह प्रश्न है, जो भाजपा के लाखों समर्पित कार्यकर्ताओं के मन में उठ रहा है।
शासकीय सेवाओं से राजनीति तक: निष्पक्षता पर उठते सवाल
पिछले कुछ वर्षों में एक नई प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है।लंबे समय तक शासकीय सेवाओं में रहे अधिकारी और कर्मचारी सेवानिवृत्ति या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद सक्रिय राजनीति में प्रवेश कर रहे हैं।यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है और किसी भी नागरिक की तरह उन्हें भी राजनीतिक भागीदारी का पूरा अधिकार है।
लेकिन जब कोई अधिकारी सेवा काल में किसी विशेष वैचारिक झुकाव के साथ काम करता दिखाई दे और सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद किसी राजनीतिक दल में प्रभावशाली भूमिका निभाने लगे, तो उसकी पूर्व प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।क्या प्रशासनिक पदों पर रहते हुए लिए गए निर्णय पूरी तरह निष्पक्ष थे?क्या सेवा काल में राजनीतिक तटस्थता वास्तव में बनी रही?क्या राजनीतिक दलों को ऐसे मामलों में अतिरिक्त सतर्कता नहीं बरतनी चाहिए?इन प्रश्नों का संबंध केवल भाजपा से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से भी है।
क्या भाजपा सेवानिवृत्त प्रभावशाली वर्ग का नया राजनीतिक आश्रय बनती जा रही है?
यह सवाल आज पार्टी के भीतर सबसे अधिक चर्चा में है।क्या भाजपा उन लोगों के लिए सबसे सुरक्षित राजनीतिक मंच बनती जा रही है, जो सेवानिवृत्ति के बाद पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं?यदि पार्टी में प्रवेश की कसौटी वैचारिक प्रतिबद्धता के बजाय राजनीतिक उपयोगिता बन जाएगी, तो यह किसी भी कैडर आधारित संगठन के लिए गंभीर चेतावनी होगी।क्योंकि अवसरवादी लोग संगठन के साथ नहीं, सत्ता के साथ खड़े होते हैं।वे संघर्ष के समय नहीं आते, बल्कि सफलता के समय जुड़ते हैं।वे विचारधारा से नहीं, परिस्थितियों से संचालित होते हैं।और परिस्थितियां बदलते ही उनकी प्राथमिकताएं भी बदल जाती हैं।
पुराने कार्यकर्ताओं की पीड़ा: क्या हम केवल सीढ़ी थे?
भाजपा के समर्पित कार्यकर्ताओं के बीच सबसे बड़ा असंतोष इसी मुद्दे को लेकर दिखाई देता है।वे कार्यकर्ता, जिन्होंने उस समय पार्टी का साथ दिया जब सत्ता दूर थी, जिन्होंने विरोध, उपेक्षा और संघर्ष के बीच संगठन को मजबूत किया, आज पूछ रहे हैं—
क्या वर्षों की निष्ठा और संघर्ष का मूल्य केवल इतना है कि चुनाव के समय उन्हें भीड़ जुटाने के लिए याद किया जाए?क्या संगठन में समर्पण से अधिक महत्व प्रभाव और संपर्क को मिलने लगा है?क्या कल तक विरोधी विचारधारा से जुड़े लोग सीधे निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में पहुंच जाएंगे, जबकि दशकों से काम कर रहे कार्यकर्ता प्रतीक्षा करते रहेंगे?यदि कार्यकर्ता का मन टूटता है, तो संगठन का मनोबल कमजोर होता है।और जब संगठन का मनोबल कमजोर होता है, तो चुनावी जीत भी स्थायी नहीं रहती।
“पार्टी विद ए डिफरेंस” की पहचान पर प्रश्न
भाजपा ने हमेशा स्वयं को अन्य दलों से अलग बताया है।
लेकिन यदि वही प्रवृत्तियां यहां भी दिखाई देने लगें—दल-बदल, अवसरवाद, व्यक्तिपूजा और राजनीतिक उपयोगिता—तो फिर भाजपा और अन्य दलों के बीच मूल अंतर क्या रह जाएगा?
क्या पार्टी का विस्तार उसकी विचारधारा के विस्तार का परिणाम है या केवल सत्ता के आकर्षण का?
क्या संगठन में प्रवेश आसान हो गया है और विचारधारा की परीक्षा कठिन?
क्या अब संगठन के भीतर भी चुनावी गणित विचारधारा पर भारी पड़ने लगा है?
ये प्रश्न असहज अवश्य हैं, लेकिन इन्हें टालना भविष्य के लिए और अधिक खतरनाक हो सकता है।
इतिहास की चेतावनी: बड़े संगठन भीतर से टूटते हैं
इतिहास गवाह है कि बड़े संगठन बाहरी विरोधियों से कम और आंतरिक कमजोरियों से अधिक प्रभावित होते हैं।
गुटबाजी, पदलोलुपता, अवसरवाद, व्यक्तिपूजा और वैचारिक शिथिलता—ये वे दीमक हैं, जो किसी भी मजबूत संगठन को भीतर से खोखला कर सकती हैं।
जब समर्पण की जगह संपर्क, संघर्ष की जगह प्रभाव और विचारधारा की जगह उपयोगिता को महत्व मिलने लगे, तो संगठन का विस्तार तो होता है, लेकिन उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है।
क्या अब संगठनात्मक “एसआईआर” का समय आ गया है?
यहां एसआईआर का अर्थ मतदाता सूची पुनरीक्षण नहीं, बल्कि “संगठनात्मक समीक्षा एवं वैचारिक पुनर्मूल्यांकन” से है।
इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति का विरोध करना नहीं, बल्कि संगठन की मूल आत्मा की रक्षा करना होना चाहिए।
ऐसे एसआईआर के तहत निम्न बिंदुओं पर विचार किया जा सकता है—
- नए प्रवेशकर्ताओं की राजनीतिक और वैचारिक पृष्ठभूमि की समीक्षा।
- पूर्व सार्वजनिक वक्तव्यों और राजनीतिक गतिविधियों का मूल्यांकन।
- महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने से पहले वैचारिक प्रशिक्षण अनिवार्य करना।
- दल बदलकर आने वालों के लिए न्यूनतम प्रतीक्षा अवधि निर्धारित करना।
- संगठन के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का आकलन।
- पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता और सम्मान सुनिश्चित करना।
- संगठन में पद और जिम्मेदारी के लिए स्पष्ट मानदंड तय करना।
- यह मूल्यांकन करना कि व्यक्ति संगठन को मजबूत करना चाहता है या संगठन के माध्यम से स्वयं को स्थापित करना चाहता है।
आत्ममंथन का समय अभी है
भाजपा आज जितनी मजबूत दिखाई देती है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी उसके सामने है।
किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी पूंजी सत्ता नहीं, बल्कि उसका कार्यकर्ता होता है।
वह कार्यकर्ता, जो बिना किसी पद, प्रतिष्ठा और अपेक्षा के वर्षों तक संगठन के लिए खड़ा रहता है।
संगठन को यह तय करना होगा कि वह केवल राजनीतिक विस्तार चाहता है या अपनी वैचारिक पहचान को भी अक्षुण्ण रखना चाहता है।
क्योंकि विचारधारा से समझौता कर प्राप्त की गई राजनीतिक सफलता अल्पकालिक हो सकती है, लेकिन वैचारिक प्रतिबद्धता पर आधारित संगठन ही लंबे समय तक टिकते हैं।
यदि समय रहते आत्ममंथन नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपने भीतर बढ़ता अवसरवाद होगा ?
और तब सवाल यह नहीं होगा कि भाजपा कितनी बड़ी है ?
सवाल यह होगा कि क्या वह अब भी वैसी ही है, जैसी बनने का उसने दावा किया था ?
