दमोह। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हाल ही में कोचिंग संस्थान में हुए दर्दनाक अग्निकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस घटना के बाद दमोह शहर में संचालित कोचिंग संस्थानों और लाइब्रेरी सेंटरों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। शहर के विभिन्न क्षेत्रों में संचालित दर्जनों कोचिंग सेंटर और लाइब्रेरी में प्रतिदिन हजारों छात्र-छात्राएं अध्ययन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन इनमें से कई संस्थान ऐसे भवनों में संचालित हो रहे हैं जहां फायर सेफ्टी के बुनियादी मानकों तक का पालन नहीं किया जा रहा है।
मंगलवार को शहर के विभिन्न क्षेत्रों में संचालित कोचिंग एवं लाइब्रेरी सेंटरों का जायजा लेने पर कई चिंताजनक स्थितियां सामने आईं। टंडन बगीचा, गायत्री गेट, बस स्टैंड, स्टेशन रोड, तुलसी होटल क्षेत्र, दवा बाजार और अन्य व्यावसायिक इलाकों में बड़ी संख्या में कोचिंग सेंटर एवं लाइब्रेरी संचालित हैं। इनमें से कई संस्थान बहुमंजिला इमारतों की दूसरी, तीसरी और चौथी मंजिल पर चल रहे हैं, जहां पहुंचने के लिए मात्र तीन से चार फीट चौड़ी सीढ़ियां ही उपलब्ध हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी आपात स्थिति में इतनी संकरी सीढ़ियां विद्यार्थियों की सुरक्षित निकासी में बड़ी बाधा बन सकती हैं। यदि आगजनी, शॉर्ट सर्किट या अन्य कोई दुर्घटना होती है तो भगदड़ की स्थिति में गंभीर जनहानि की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
पार्किंग और यातायात भी बना गंभीर खतरा
शहर के कोचिंग हब बन चुके क्षेत्रों में सुरक्षा के साथ-साथ यातायात व्यवस्था भी बड़ी चुनौती बन चुकी है। गायत्री गेट से पीजी कॉलेज जाने वाले मार्ग पर सुबह और शाम के समय सैकड़ों दोपहिया वाहन सड़क किनारे खड़े रहने से जाम जैसी स्थिति बन जाती है। चार पहिया वाहनों के आमने-सामने आने पर आवागमन बाधित हो जाता है।
चिंता की बात यह भी है कि इन क्षेत्रों में फर्नीचर, हार्डवेयर और प्लाईवुड की बड़ी दुकानें संचालित हैं, जहां बड़ी मात्रा में ज्वलनशील सामग्री रखी रहती है। आग लगने की स्थिति में यह सामग्री खतरे को कई गुना बढ़ा सकती है।
टंडन बगीचा, एचडीएफसी बैंक के पीछे संचालित लाइब्रेरी और कोचिंग सेंटरों में भी पार्किंग की समुचित व्यवस्था नहीं है। यहां सड़क पर ही वाहन खड़े किए जाते हैं, जिससे स्थानीय नागरिकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
इमरजेंसी एग्जिट का अभाव, सुरक्षा उपकरण भी नाकाफी
कई कोचिंग और लाइब्रेरी भवनों में वैकल्पिक निकास मार्ग (इमरजेंसी एग्जिट) उपलब्ध नहीं हैं। अधिकांश स्थानों पर अग्निशमन यंत्र या तो नहीं मिले या केवल औपचारिकता के लिए लगाए गए दिखाई दिए। कहीं भी नियमित मॉक ड्रिल या आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण की व्यवस्था नजर नहीं आई।
अभिभावकों का कहना है कि वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए कोचिंग भेजते हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा को लेकर प्रशासन और संचालकों दोनों को गंभीरता दिखानी चाहिए। उनका मानना है कि समय-समय पर निरीक्षण और सुरक्षा ऑडिट कराया जाना आवश्यक है।
दो साल पहले चला था अभियान
जानकारी के अनुसार लगभग दो वर्ष पूर्व जिला प्रशासन ने शहर में संचालित कोचिंग एवं लाइब्रेरी सेंटरों में सुरक्षा मानकों की जांच के लिए विशेष अभियान चलाया था। उस दौरान सुरक्षा मानकों का पालन नहीं करने वाले कुछ लाइब्रेरी सेंटरों को सील भी किया गया था।
विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए जिला प्रशासन ने पुरानी जिला पंचायत भवन परिसर में निशुल्क लाइब्रेरी की व्यवस्था कराई थी। शहर में तीन निशुल्क लाइब्रेरी भी शुरू की गई थीं। हालांकि इसके बाद नियमित निरीक्षण और निगरानी की प्रक्रिया ठंडी पड़ गई।
क्या कहते हैं सुरक्षा विशेषज्ञ
सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार जिन भवनों में बड़ी संख्या में विद्यार्थी एकत्रित होते हैं, वहां फायर सेफ्टी ऑडिट, पर्याप्त चौड़ाई वाली सीढ़ियां, अग्निशमन यंत्र, फायर अलार्म सिस्टम, आपातकालीन निकास मार्ग और नियमित मॉक ड्रिल अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। इससे किसी भी आपदा की स्थिति में जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है।
प्रशासन ने दिए जांच के संकेत
इस पूरे मामले में एसडीएम सौरव गंधर्व ने कहा कि वे कलेक्टर से चर्चा कर शहर में संचालित कोचिंग सेंटरों और लाइब्रेरी संस्थानों का निरीक्षण कराएंगे। यदि कहीं सुरक्षा मानकों की अनदेखी पाई जाती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
लखनऊ जैसी दुखद घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा संस्थानों में सुरक्षा व्यवस्था केवल कागजी औपचारिकता नहीं बल्कि विद्यार्थियों के जीवन से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है। ऐसे में दमोह में भी प्रशासन, कोचिंग संचालकों और अभिभावकों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा के मंदिर किसी भी प्रकार की दुर्घटना का कारण न बनें।
