लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत या व्यवस्था पर दबाव बनाने का नया माध्यम?
विशेष समीक्षात्मक लेख
(डॉ. एल.एन. वैष्णव)
वर्ष 2005 में जब सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम लागू हुआ था, तब इसे भारतीय लोकतंत्र में एक ऐतिहासिक क्रांति माना गया। पहली बार देश के आम नागरिक को यह वैधानिक अधिकार मिला कि वह सरकार से पूछ सके—सरकारी धन कहाँ खर्च हुआ, योजनाओं का लाभ किसे मिला, निर्णय कैसे लिए गए और जनता के नाम पर चल रही योजनाओं का वास्तविक सच क्या है।इस कानून ने सरकारी गोपनीयता की उस परंपरा को चुनौती दी, जिसके कारण वर्षों तक अनेक फाइलें जनता की पहुँच से बाहर रहती थीं। सूचना के अधिकार ने सत्ता के गलियारों में पारदर्शिता की नई खिड़कियाँ खोलीं और नागरिक को केवल मतदाता नहीं, बल्कि शासन का सहभागी बना दिया।
पिछले दो दशकों में RTI ने अनेक बड़े भ्रष्टाचारों का खुलासा किया, लाखों लोगों को उनका अधिकार दिलाया और प्रशासन को जवाबदेह बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई राज्यों में सड़क निर्माण, पंचायतों के विकास कार्य, मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना, राशन वितरण, छात्रवृत्ति, पेंशन और नगर निकायों की अनियमितताओं का खुलासा इसी कानून के माध्यम से हुआ।
लेकिन हर कानून की तरह सूचना के अधिकार का भी एक दूसरा चेहरा सामने आया है।
आज यह प्रश्न गंभीरता से पूछा जाने लगा है कि क्या सूचना का अधिकार अपने मूल उद्देश्य से भटक रहा है? क्या कुछ लोगों ने इसे जनहित के बजाय निजी हित, दबाव की राजनीति और कथित आर्थिक लाभ का साधन बना लिया है?
पहला पक्ष : जब RTI बनती है जनता की ताकत
देश के हजारों जागरूक नागरिक आज भी सूचना के अधिकार का उपयोग केवल जनहित में करते हैं। वे अपने गांव की सड़क, स्कूल, अस्पताल, आंगनवाड़ी, पंचायत, नगर पालिका, बिजली, पानी, राशन और सरकारी योजनाओं की जानकारी मांगते हैं ताकि जनता का पैसा जनता के हित में खर्च हो।ऐसे लोगों के कारण भ्रष्टाचार उजागर हुआ, फर्जी भुगतान रुके, अपात्र हितग्राहियों के नाम हटे और पात्र लोगों को उनका अधिकार मिला। वास्तव में ऐसे नागरिक लोकतंत्र की रीढ़ हैं। उन्होंने साबित किया कि जागरूक नागरिक किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत होता है।
दूसरा पक्ष : जब अधिकार बन जाता है हथियार
लेकिन इसी कानून का दूसरा पक्ष भी समाज के सामने है।
कुछ मामलों में सूचना का अधिकार व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने, अधिकारियों पर मानसिक दबाव बनाने, एक ही विषय पर बार-बार आवेदन देकर विभागों को उलझाने या केवल प्रचार पाने का माध्यम भी बनता दिखाई देता है।
कई बार दर्जनों RTI आवेदन, उसके बाद प्रथम अपील, द्वितीय अपील और लगातार शिकायतों का ऐसा सिलसिला चलता है कि विभाग का अधिकांश समय केवल उन्हीं मामलों में व्यतीत होने लगता है। प्रश्न यह नहीं है कि सूचना क्यों मांगी जा रही है। प्रश्न यह है कि सूचना मांगने के पीछे उद्देश्य क्या है?
यदि उद्देश्य जनहित है तो RTI लोकतंत्र की शक्ति है। यदि उद्देश्य किसी व्यक्ति को परेशान करना, अनावश्यक दबाव बनाना या निजी लाभ प्राप्त करना है, तो यह कानून की मूल भावना के विपरीत है।
तीसरा पक्ष : जब RTI बन जाए रोजगार
समाज में यह चर्चा भी लगातार बढ़ रही है कि कुछ लोगों ने सूचना के अधिकार को लगभग अपना नियमित पेशा बना लिया है।दिनभर आवेदन, शिकायत, अपील, विभागों के चक्कर और सोशल मीडिया पर स्वयं को भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा घोषित करना—यह प्रवृत्ति कई स्थानों पर देखने को मिलती है।
स्पष्ट रूप से यह कहना आवश्यक है कि अधिक RTI लगाना गलत नहीं है। लेकिन यदि उसका उद्देश्य जनहित के बजाय व्यक्तिगत प्रभाव, अनुचित दबाव, प्रसिद्धि या किसी प्रकार का निजी लाभ हो, तो यह सूचना के अधिकार की आत्मा के साथ अन्याय है।
असली नुकसान किसका?
विडंबना यह है कि RTI के संभावित दुरुपयोग का सबसे बड़ा नुकसान उसी गरीब नागरिक को होता है जिसके लिए यह कानून बनाया गया था।
जिस किसान को सिंचाई योजना की जानकारी चाहिए…
जिस मजदूर को प्रधानमंत्री आवास योजना की सूची चाहिए…
जिस बुजुर्ग को पेंशन का रिकॉर्ड चाहिए…
जिस छात्र को छात्रवृत्ति की जानकारी चाहिए…
उसे भी महीनों इंतजार करना पड़ता है, क्योंकि विभाग का समय कई बार ऐसे मामलों में खर्च हो जाता है जिनमें जनहित गौण और निजी उद्देश्य प्रमुख प्रतीत होते हैं।
प्रशासन की चुनौती
सरकारी विभागों के सामने आज दोहरी चुनौती है। एक ओर उन्हें प्रत्येक नागरिक को समय पर सूचना उपलब्ध करानी है, वहीं दूसरी ओर लगातार बढ़ती अपीलों और जटिल मामलों का भी सामना करना पड़ता है।कई राज्यों के सूचना आयोगों में हजारों अपीलें लंबित हैं। इससे स्पष्ट है कि सूचना व्यवस्था को और अधिक मजबूत, डिजिटल और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है।
क्या समाधान केवल कानून बदलना है?
बिल्कुल नहीं।
समाधान कानून को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को मजबूत करना है।यदि सरकारी विभाग अधिक से अधिक सूचनाएँ स्वयं सार्वजनिक करें, रिकॉर्ड डिजिटल हों, निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी हो और नागरिक भी RTI का उपयोग जिम्मेदारी के साथ करें, तो अधिकांश विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं।
समाज के लिए संदेश
समाज को यह समझना होगा कि हर RTI कार्यकर्ता गलत नहीं है और हर सरकारी अधिकारी भ्रष्ट नहीं होता।जिस प्रकार ईमानदार पत्रकार और पीत पत्रकारिता में अंतर होता है, उसी प्रकार जनहित में काम करने वाले सूचना कार्यकर्ताओं और निजी स्वार्थ से प्रेरित लोगों में भी स्पष्ट अंतर है।
यह अंतर पहचानना ही लोकतंत्र की परिपक्वता है।
निष्कर्ष
सूचना का अधिकार लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इसे कमजोर करना देशहित में नहीं होगा, लेकिन इसका दुरुपयोग रोकना भी उतना ही आवश्यक है।यह कानून भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष का माध्यम है, किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध अभियान चलाने का नहीं।
यह जनता की आवाज है, दबाव की राजनीति का औजार नहीं।यह संविधान द्वारा दिया गया अधिकार है, निजी स्वार्थ का रोजगार नहीं।
जब तक सूचना का अधिकार जनहित के लिए उपयोग होगा, तब तक लोकतंत्र मजबूत होगा। लेकिन जिस दिन यह व्यक्तिगत स्वार्थ, भय और दबाव का माध्यम बन जाएगा, उसी दिन इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगने लगेंगे।आज समय की मांग है कि सूचना का अधिकार बचाया जाए, लेकिन उसके दुरुपयोग पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार किया जाए।
“अधिकार वही श्रेष्ठ है जो समाज को न्याय दे,
और कानून वही महान है जिसकी गरिमा उसके उपयोग से बनी रहे।”
