दमोह। अमृत सरोवरों के निर्माण में कथित अनियमितताओं को लेकर एक प्रतिष्ठित एवं चर्चित समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के बाद अब जिला प्रशासन ने पूरे मामले में अपना आधिकारिक पक्ष सामने रखते हुए विस्तृत तथ्य जारी किए हैं। जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी प्रवीण फुलपगारे द्वारा जारी लिखित खंडन में समाचार में लगाए गए दावों को तथ्यों एवं सरकारी अभिलेखों के आधार पर असत्य और भ्रामक बताया गया है। यह खंडन अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और जिलेभर में चर्चा का विषय बना हुआ है।
दरअसल, 7 जुलाई 2026 को प्रकाशित समाचार में दमोह जिले के अमृत सरोवरों के निर्माण में गंभीर अनियमितताओं तथा 12 अमृत सरोवरों के कथित रूप से “गायब” होने का दावा किया गया था। इसके बाद जिला पंचायत ने पूरे मामले की आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक करते हुए स्पष्ट किया कि भारत सरकार के अधिकृत पोर्टल पर दमोह जिले के 113 अमृत सरोवर विधिवत दर्ज हैं और सभी का रिकॉर्ड उपलब्ध है।
मुख्य कार्यपालन अधिकारी प्रवीण फुलपगारे ने बताया कि इन 113 अमृत सरोवरों की जांच विभिन्न विभागों के तकनीकी अधिकारियों एवं राजस्व अमले की संयुक्त उच्च स्तरीय टीमों द्वारा कराई गई थी। जांच के दौरान जनपद पंचायत हटा क्षेत्र में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) की अध्यक्षता वाली टीम ने 9 अमृत सरोवरों में कार्य प्राक्कलन के अनुरूप नहीं पाए जाने पर संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की थी।
इसके अतिरिक्त शेष 104 अमृत सरोवरों की भी अलग-अलग संयुक्त टीमों द्वारा जांच कराई गई। जांच में 11 कार्य तकनीकी रूप से मानकों के अनुरूप संभव नहीं पाए गए, जिनमें भी संबंधित अधिकारियों एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की गई। जिला पंचायत का कहना है कि जहां भी कमी मिली, वहां कार्रवाई की गई और पूरे मामले को छिपाने का कोई प्रयास नहीं किया गया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाचार में जिन 12 अमृत सरोवरों के गायब होने की बात कही गई थी, उस दावे का भी प्रशासन ने स्पष्ट खंडन किया है। लिखित जानकारी में कहा गया है कि दमोह जिले के सभी 113 अमृत सरोवर भारत सरकार के पोर्टल पर दर्ज हैं और निर्धारित मानकों के अनुसार उनकी स्थिति पोर्टल पर प्रदर्शित है। इसलिए उनके गायब होने संबंधी दावा तथ्यों से मेल नहीं खाता।
प्रशासन ने यह भी बताया कि वर्ष 2025 से जल संरक्षण एवं संवर्धन कार्यों की निगरानी को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत जीआईएस एवं रिमोट सेंसिंग आधारित निर्णय समर्थन प्रणाली (सिपरी) का उपयोग किया जा रहा है। इससे निर्माण कार्यों की मॉनिटरिंग, सत्यापन और मूल्यांकन वैज्ञानिक तरीके से किया जा रहा है।
गौरतलब है कि यह पहला अवसर नहीं है जब किसी प्रकाशित समाचार पर जिला प्रशासन को सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखना पड़ा हो। इससे पहले बीज वितरण से जुड़े एक समाचार के संबंध में भी कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने मीडिया के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा था कि प्रकाशित जानकारी तथ्यात्मक नहीं थी और वास्तविक स्थिति अलग है। उस समय भी प्रशासन ने दस्तावेजों और प्रमाणों के आधार पर अपना पक्ष सार्वजनिक किया था।
अब अमृत सरोवर मामले में भी जिला पंचायत द्वारा जारी लिखित खंडन की प्रतियां संबंधित समाचार पत्र के प्रबंधन को भेजी गई हैं। साथ ही यह दस्तावेज सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद जिले में समाचारों की तथ्यात्मकता, आधिकारिक पुष्टि और मीडिया की विश्वसनीयता को लेकर व्यापक चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
प्रशासन का कहना है कि सार्वजनिक महत्व के मामलों में किसी भी सूचना के प्रकाशन से पहले संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष लेना आवश्यक है, ताकि अपुष्ट सूचनाओं से भ्रम की स्थिति उत्पन्न न हो और आमजन तक प्रमाणित एवं तथ्यपरक जानकारी पहुंचे।
