प्रदर्शन के बाद अभिनेता आयुष शर्मा ने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती केवल चुनावों तक सीमित नहीं होती, बल्कि नागरिकों की बात सुनने और उनकी चिंताओं को समझने में भी दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि छात्रों सहित हर नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार है। उनके अनुसार, यदि अंततः छात्रों की मांगों पर विचार किया जाना था तो शुरुआत से ही संवाद का रास्ता अपनाया जाना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि अपनी मांग रखने के दौरान छात्रों को आंसू गैस और लाठीचार्ज जैसी परिस्थितियों का सामना करना दुर्भाग्यपूर्ण है।
अभिनेत्री हुमा कुरैशी ने भी इस घटना पर चिंता जताते हुए कहा कि प्रदर्शन के दौरान सामने आई तस्वीरें लंबे समय तक लोगों की स्मृति में बनी रहेंगी। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों को धैर्य, बातचीत और परस्पर विश्वास के जरिए सुलझाया जा सकता है। उन्होंने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने वाले छात्रों और नागरिकों के साहस की सराहना करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति को सम्मानपूर्वक सुनना आवश्यक है।
अभिनेता सोनू सूद ने भी इस घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि देश के छात्रों को कठोर कार्रवाई नहीं, बल्कि सहयोग और विश्वास की आवश्यकता है। वहीं अभिनेत्री भूमि पेडनेकर ने कहा कि किसी भी समस्या का समाधान हिंसा से नहीं निकल सकता। उन्होंने युवाओं की चिंताओं को गंभीरता से सुनने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार और संवाद की संस्कृति लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। उनके अनुसार, किसी भी आंदोलन का उद्देश्य सकारात्मक बदलाव होना चाहिए और सभी पक्षों को संयम बनाए रखना चाहिए।
फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने भी पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि कार्रवाई की प्रकृति और उसके प्रभाव पर गंभीरता से विचार किया जाए। उन्होंने अपने संदेश में पुलिस की भूमिका और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि लोकतांत्रिक समाज में जवाबदेही और संवेदनशीलता दोनों का समान महत्व है।
दिल्ली पुलिस के अनुसार प्रदर्शन के दौरान कई बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद कुछ प्रदर्शनकारी बैरिकेड पार कर संसद की ओर बढ़ने लगे, जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कार्रवाई की गई। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई स्थानों पर झड़पें भी हुईं। दूसरी ओर प्रदर्शन से जुड़े लोगों का कहना है कि उनकी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से रखने का प्रयास किया जा रहा था और बल प्रयोग से बचा जा सकता था।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर लोकतांत्रिक विरोध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है। राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के साथ-साथ फिल्म जगत की ओर से आई टिप्पणियों ने भी इस मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि छात्रों की मांगों और पूरे घटनाक्रम पर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।
