नारियल की रस्सी से नायलॉन पट्टी तक बदला बंधन, लेकिन नहीं बदली बाइक की किस्मत! कलेक्टोरेट परिसर में लावारिस वाहन ने खोली व्यवस्था की पोल
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(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
दमोह। जिला मुख्यालय स्थित संयुक्त कलेक्टेड भवन का प्रांगण, जहां से जिले की प्रशासनिक व्यवस्था संचालित होती है, इन दिनों एक ऐसी मोटरसाइकिल को लेकर चर्चा में है, जो कथित तौर पर करीब डेढ़ से दो वर्षों से एक ही स्थान पर लोहे की ग्रिल से बंधी खड़ी है।मोटरसाइकिल का नंबर है MP 34 MA 5589। सवाल यह नहीं है कि बाइक पुरानी है या नई… सवाल यह है कि आखिर यह बाइक यहां कर क्या रही है? बताया जा रहा है कि पहले इस मोटरसाइकिल को नारियल की रस्सी से बांधा गया था। समय बीतता गया, रस्सी बदली और अब इसे नायलॉन तथा बैनर की पट्टी से लोहे की ग्रिल के साथ बांधकर रखा गया है। यानी वाहन की हालत और उसे बांधने का तरीका तो बदल गया, लेकिन बाइक आज भी उसी जगह खड़ी नजर आ रही है।
डेढ़-दो साल में मालिक का पता नहीं चला?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि यह मोटरसाइकिल वास्तव में लावारिस है तो डेढ़ से दो साल में पुलिस और प्रशासन इसके मालिक तक क्यों नहीं पहुंच पाए?
क्या वाहन के रजिस्ट्रेशन नंबर से मालिक की जानकारी निकालने का प्रयास किया गया?क्या आरटीओ रिकॉर्ड से वाहन स्वामी का पता लगाया गया?क्या संबंधित थाने में इसकी सूचना दी गई?क्या वाहन को जब्त कर सुरक्षित अभिरक्षा में रखा गया?या फिर इसे कलेक्टोरेट परिसर की ग्रिल से बांध देना ही पूरी कार्रवाई मान ली गई?
इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।
लावारिस वाहन के लिए नियम हैं, फिर यहां अलग व्यवस्था क्यों?
आमतौर पर सार्वजनिक स्थान पर कोई संदिग्ध अथवा लावारिस वाहन मिलने पर पुलिस उसकी जांच करती है। वाहन के दस्तावेज और स्वामित्व की जानकारी जुटाई जाती है तथा आवश्यकता होने पर उसे सुरक्षित अभिरक्षा में लिया जाता है।लेकिन यहां तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।
एक ऐसा वाहन, जो कथित तौर पर वर्षों से प्रशासनिक परिसर में बंधा हुआ है, उसे देखकर भी जिम्मेदार अधिकारियों की नजर क्यों नहीं पड़ी?
यदि नजर पड़ी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?और यदि कार्रवाई हुई है तो उसकी जानकारी क्या है?
कलेक्टेड की ग्रिल से बंधी बाइक, व्यवस्था से पूछ रही कई सवाल
कलेक्टोरेट परिसर कोई सुनसान जगह नहीं है। यहां प्रतिदिन अधिकारी, कर्मचारी, जनप्रतिनिधि और आम नागरिक आते-जाते हैं। ऐसे में इतने लंबे समय से एक मोटरसाइकिल का इसी तरह बंधा रहना अपने आप में चर्चा का विषय है।लोगों के बीच सवाल उठ रहा है कि अगर आम आदमी का वाहन कहीं लावारिस हालत में मिल जाए तो पुलिस की कार्रवाई तुरंत शुरू हो जाती है, लेकिन प्रशासनिक परिसर में वर्षों से खड़े वाहन की सुध लेने वाला कोई क्यों नहीं?क्या इस बाइक की कोई कहानी है?
क्या यह किसी पुराने विवाद या प्रकरण से जुड़ी है? क्या किसी कार्रवाई के दौरान इसे यहां रखा गया था? या फिर किसी व्यक्ति ने इसे यहां छोड़ दिया और उसके बाद किसी ने इसकी सुध ही नहीं ली?
इन तमाम सवालों का जवाब जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए।
रस्सी बदल गई, सिस्टम नहीं बदला!
इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि बाइक को बांधने वाली रस्सी तक बदल गई।
पहले नारियल की रस्सी, अब नायलॉन और बैनर की पट्टी।
लेकिन वाहन वहीं है।
अगर यह सचमुच लावारिस है तो सवाल उठता है कि डेढ़-दो साल में जांच पूरी क्यों नहीं हुई? और अगर यह किसी प्रकरण में जब्त वाहन है तो इसे कलेक्टेड की ग्रिल से बांधकर रखने का आधार क्या है?
अब जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब जरूरी
मामला छोटा दिखाई दे सकता है, लेकिन सवाल बड़ा है—क्या सरकारी परिसर में किसी वाहन को वर्षों तक इसी तरह बांधकर रखा जा सकता है?
मोटरसाइकिल MP 34 MA 5589 के संबंध में प्रशासन और पुलिस को स्पष्ट करना चाहिए कि—
- यह वाहन किसके नाम पर दर्ज है?
- इसे कलेक्टोरेट परिसर में किसने और कब रखा?
- वाहन को यहां बांधने के निर्देश किसने दिए?
- क्या पुलिस को इसकी सूचना दी गई?
- क्या वाहन की जांच और सत्यापन किया गया?
- क्या वाहन मालिक का पता लगाया गया?
- यदि मालिक नहीं मिला तो नियमानुसार क्या कार्रवाई की गई?
- और यदि वाहन किसी प्रकरण से जुड़ा है तो उसका विवरण क्या है?
अब यह बाइक सिर्फ कलेक्टोरेट की ग्रिल से नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवालों से बंधी नजर आ रही है।
प्रशासन यदि इस मामले में पारदर्शिता के साथ स्थिति स्पष्ट करता है तो लंबे समय से चली आ रही चर्चाओं पर विराम लग सकता है। वरना कलेक्टोरेट परिसर में बंधी यह मोटरसाइकिल आने वाले दिनों में व्यवस्था की लापरवाही का प्रतीक बन सकती है।
