एक समय था जब भारत को केवल एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जाता था, किंतु आज परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं। आर्थिक वृद्धि, तकनीकी नवाचार, डिजिटल क्रांति, उद्यमिता, विनिर्माण और निवेश के क्षेत्र में भारत जिस गति से आगे बढ़ रहा है, उसने विश्व समुदाय का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।
वस्तुत: रियल एस्टेट निवेश न्यास बाजार की तेजी से बढ़ती संरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र में आने वाला परिवर्तन, मजबूत सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर और वैश्विक निवेशकों का बढ़ता विश्वास इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि भारत अब विकास की राह पर आगे बढ़ते हुए वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर है। वास्तव में 21वीं सदी भारत की ही सदी है। यह विचार जब दिया गया, तब लग रहा था कि ये संभव होगा भी कि नहीं! किंतु वर्तमान में जिस तरह के निर्णय राष्ट्रीय एवं समाज स्तर पर लिए जा रहे हैं उन्हें देखकर जरूर लगने लगा है कि भारत के प्राचीन मनीषियों और आधुनिक वैश्विक विचारकों ने जो अपनी दूरदृष्टि से कहा, वह आज साकार रूप में फलीभूत हो हर है।
कई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विश्लेषणों के अनुसार भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन चुका है। हाल के वर्षों में भारत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर लगातार छह प्रतिशत से अधिक बनी रही है, जोकि अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर प्रदर्शन को दर्शाती है। यह प्रगति भारत की आर्थिक संरचना में हो रहे गहरे परिवर्तन का संकेत भी है। घरेलू मांग का विस्तार, आर्थिक उदारीकरण के बाद निवेश के नए अवसर, डिजिटल ढांचे का विस्तार और युवा कार्यबल ने भारत की आर्थिक शक्ति को नया आधार प्रदान किया है। यही कारण है कि वैश्विक कंपनियां भारत को एक बड़ा बाजार होने के साथ ही दीर्घकालिक आर्थिक शक्ति के रूप में देखने लगी हैं।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन ने अपनी पुस्तक “द वर्ल्ड इकोनॉमी ए मिलेनियल पर्सपेक्टिव” में यह लिखा भी है कि ‘इतिहास में लंबे समय तक भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र रहा है और भविष्य में उसके पुनः उस स्थान को प्राप्त करने की संभावना है।’ भारत की आर्थिक प्रगति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण रियल एस्टेट निवेश न्यास बाजार का तेजी से बढ़ता आकार है। वित्त वर्ष 2020 में जहां इसका आकार लगभग 27 हजार 100 करोड़ रुपये था, वहीं वित्त वर्ष 2026 के पहले नौ महीनों में यह बढ़कर लगभग एक लाख बहत्तर हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह वृद्धि भारत के निवेश ढांचे में आ रहे व्यापक परिवर्तन को दर्शाती है। यह स्थिति इस बात का प्रमाण है कि भारत का वित्तीय तंत्र तेजी से आधुनिक और निवेश उन्मुख बन रहा है।
भारत की आर्थिक उन्नति का दूसरा महत्वपूर्ण आधार तकनीकी क्षेत्र है। उन्नीस सौ नब्बे के दशक के अंत से भारत सॉफ्टवेयर विकास और सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं का वैश्विक केंद्र बन गया। आज भारत की डिजिटल पहचान प्रणाली, मोबाइल भुगतान व्यवस्था और इंटरनेट की सुलभता ने करोड़ों लोगों को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया है। प्रसिद्ध अमेरिकी राजनीतिक विश्लेषक ‘इयान ब्रेमर’ ने अपनी पुस्तक “एवरी नेशन फॉर इटसेल्फ : विनर्स एंड लूजर्स इन अ जी जीरो वर्ल्ड) में लिखा है, “इक्कीसवीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की डिजिटल क्षमता और जनसांख्यिकीय शक्ति उसे विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक निर्णायक भूमिका प्रदान कर सकती है।” वस्तुत: यह पुस्तक वैश्विक राजनीति में आने वाले एक बड़े बदलाव का विश्लेषण करती है, जिसे ब्रेमर “जी जीरो” की स्थिति कहते हैं। एक तरह से देखें तो वर्तमान में ये सच होता हुआ भी दिखता है। डिजिटल मंचों के माध्यम से सरकारी सेवाओं की पहुंच बढ़ी है, वित्तीय समावेशन मजबूत हुआ है और छोटे व्यवसायों को नए अवसर प्राप्त हुए हैं।
इसके साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत के विनिर्माण क्षेत्र में एक नया परिवर्तन ला रही है। एक संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार 2035 तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र के मूल्य सृजन में लगभग एक सौ पैंतीस से डेढ़ सौ अरब डॉलर तक का योगदान दे सकती है। यदि भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण की हिस्सेदारी पच्चीस प्रतिशत तक बढ़ाने में सफल होता है और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की हिस्सेदारी 2047 तक पचास प्रतिशत तक पहुंच जाती है, तो यह क्षेत्र तीन ट्रिलियन डॉलर से अधिक की आर्थिक संभावनाएं खोल सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग से मशीनों की भविष्यवाणी आधारित मरम्मत, ऊर्जा अनुकूलन, गुणवत्ता जांच और डिजिटल ग्राहक सेवा जैसे अनेक क्षेत्रों में सुधार संभव है। इससे छोटे उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अधिक प्रभावी ढंग से भाग ले सकेंगे और उत्पादन की लागत भी कम होगी।
यही कारण भी है कि वर्तमन में वित्तीय प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत तकनीक जैसे क्षेत्रों में हर वर्ष हजारों नई कंपनियां शुरू हो रही हैं। यह उद्यमिता रोजगार सृजन के साथ ही भारत को नवाचार की वैश्विक प्रयोगशाला भी बना रही है। प्रसिद्ध प्रबंधन विचारक ‘पीटर ड्रकर’ ने अपनी पुस्तक ‘इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप’ में लिखते हैं कि “आर्थिक विकास का वास्तविक इंजन नवाचार और उद्यमिता होती है।”
भारत के प्राचीन और आधुनिक विचारकों ने बहुत पहले ही यह संकेत दिया था कि भारत का भविष्य उज्ज्वल है। स्वामी विवेकानंद ने कहा, “भारत फिर से उठेगा और दुनिया को आध्यात्मिक तथा नैतिक दिशा देगा।” इसी प्रकार महान दार्शनिक श्री अरविंद ने अपनी पुस्तक ‘द रिनेसां इन इंडिया’ में लिखा है, भारत की सभ्यता में विश्व को दिशा देने की अद्वितीय क्षमता है और भविष्य में उसका पुनर्जागरण निश्चित है।
भारतीय चिंतक पंडित ‘दीनदयाल उपाध्याय’ ने भी अपने “एकात्म मानवदर्शन” के माध्यम से यह कहा है कि भारत का विकास सिर्फ आर्थिक आधार पर नहीं, सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों पर आधारित होना चाहिए। उनके अनुसार भारत का विकास मॉडल विश्व के लिए संतुलित और समावेशी विकास का मार्ग प्रस्तुत कर सकता है। आज जब भारत आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक क्षेत्रों में एक साथ प्रगति कर रहा है, तब इन विचारकों की दूरदृष्टि वास्तविकता के रूप में सामने आती दिखाई देती है।
हम देख भी रहे हैं, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। वैश्विक निवेशक भारत को स्थिर लोकतंत्र, विशाल बाजार और दीर्घकालिक विकास क्षमता वाले देश के रूप में देखते हैं। आधारभूत संरचना विकास, डिजिटल अर्थव्यवस्था, तकनीकी नवाचार और औद्योगिक सुधारों ने भारत की वैश्विक छवि को मजबूत किया है। इन्हीं कारणों के आधार पर हम आज ये कह भी सकते हैं कि अनेक वैश्विक विश्लेषक भारत को आने वाले दशकों में विश्व अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र मानते हैं।
एक तरह से देखें तो भारत की वर्तमान विकास यात्रा ‘सभ्यता के पुनर्जागरण की कथा’ है। निवेश से लेकर तकनीक तक, विनिर्माण से लेकर डिजिटल क्रांति तक और उद्यमिता से लेकर वैश्विक नेतृत्व तक हर क्षेत्र में भारत तेज गति से आगे बढ़ रहा है। यदि वर्तमान गति बनी रहती है तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इक्कीसवीं सदी वास्तव में भारत की सदी बनने की ओर अग्रसर है।
