17 वर्षों से जारी अभियान, दमोह की 52 से अधिक पंचायतों और 184 गांवों में जागरूकता अभियान
बाल विवाह रोकने का लक्ष्य अब 1000 तक पहुंचाने की तैयारी, पत्रकार वार्ता में देवेंद्र दुबे ने दी अभियान की विस्तृत जानकारी
(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
दमोह। बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथा को समाप्त करने के लिए देश और दुनिया में चलाए जा रहे प्रयासों को नई दिशा देने की पहल की जा रही है। इसी क्रम में 27 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय बाल विवाह निषेध दिवस के रूप में मनाए जाने की पहल को लेकर दमोह में पत्रकार वार्ता आयोजित की गई। संकल्प समाज सेवी संस्था मध्यप्रदेश एवं सहयोगी संस्था जस्ट फॉर राइट्स चिल्ड्रेन फाउंडेशन के प्रयासों से चलाए जा रहे अभियान की जानकारी देते हुए देवेंद्र दुबे ने बताया कि बाल विवाह के खिलाफ उनकी संस्था पिछले करीब 17 वर्षों से लगातार काम कर रही है।
पत्रकार वार्ता के दौरान देवेंद्र दुबे ने आयोजन के उद्देश्य, संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ हुई बैठकों, देशभर में अभियान के विस्तार, दमोह जिले में किए जा रहे कार्यों, अब तक रोके गए बाल विवाह, सामने आने वाली चुनौतियों तथा भविष्य की कार्ययोजना को लेकर विस्तार से जानकारी दी। इस दौरान पत्रकारों द्वारा पूछे गए विभिन्न प्रश्नों के उत्तर भी उन्होंने दिए।
एक प्रश्न के उत्तर में देवेंद्र दुबे ने बताया कि 27 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय बाल विवाह निषेध दिवस के रूप में मनाए जाने की पहल के पीछे मुख्य उद्देश्य बाल विवाह जैसी कुप्रथा के खिलाफ वैश्विक स्तर पर एकजुटता पैदा करना है। उन्होंने कहा कि बाल विवाह किसी एक देश या समाज तक सीमित समस्या नहीं है। दुनिया के कई देशों में आज भी कम उम्र में विवाह की परंपरा और सामाजिक परिस्थितियां बच्चों के भविष्य को प्रभावित कर रही हैं।उन्होंने बताया कि ब्राजील, यमन और सऊदी अरब सहित कई देशों में बाल विवाह की समस्या अलग-अलग रूपों में मौजूद है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक दिवस निर्धारित होने से इस विषय पर वैश्विक चर्चा, जागरूकता और संयुक्त प्रयासों को मजबूती मिल सकती है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ हुई बैठकों को लेकर एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि संस्था द्वारा लंबे समय से बाल विवाह के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया जा रहा है। इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ विभिन्न स्तरों पर बैठकें और चर्चा हुई हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य बाल विवाह को केवल सामाजिक समस्या के रूप में देखने के बजाय बच्चों के अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य से जोड़कर वैश्विक स्तर पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।
देशभर में अभियान के विस्तार को लेकर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में देवेंद्र दुबे ने बताया कि जब इस अभियान की शुरुआत की गई थी, तब देश के लगभग 450 जिलों में काम प्रारंभ किया गया था। समय के साथ अभियान का दायरा लगातार बढ़ता गया और अब भारत के करीब 950 से 1100 जिलों तक इस दिशा में विभिन्न स्तरों पर कार्य पहुंच चुका है। उन्होंने कहा कि इतने बड़े स्तर पर अभियान का विस्तार इस बात का संकेत है कि समाज में बाल विवाह को लेकर जागरूकता बढ़ रही है और विभिन्न संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं।
दमोह जिले में चलाए जा रहे अभियान से जुड़े एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि जिले में भी बाल विवाह और बाल श्रम जैसी समस्याओं को रोकने के लिए व्यापक स्तर पर काम किया जा रहा है। नीति आयोग के एस्पिरेशनल ब्लॉक कार्यक्रम के तहत दमोह जिले की लगभग 52-53 पंचायतों और 184 गांवों में सघन जागरूकता अभियान संचालित किया जा रहा है।इस अभियान के दौरान ग्रामीणों, अभिभावकों, किशोर-किशोरियों तथा समाज के अन्य वर्गों से संवाद कर बाल विवाह के दुष्परिणामों की जानकारी दी जा रही है। लोगों को यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि कम उम्र में विवाह बच्चों की शिक्षा बाधित करने के साथ उनके स्वास्थ्य, मानसिक विकास और भविष्य के अवसरों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
एक प्रश्न के उत्तर में बाल विवाह रोकने के आंकड़ों की जानकारी देते हुए देवेंद्र दुबे ने बताया कि वर्ष 2023 से अभियान के इस चरण में प्रारंभिक रूप से 300 बाल विवाह रोकने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। अभियान के दौरान लगातार समझाइश और सामाजिक संवाद के माध्यम से पिछले वर्ष लगभग 270 बाल विवाह रुकवाने में सफलता मिली। कई मामलों में परिवारों से वचन पत्र लेकर उन्हें बाल विवाह नहीं करने के लिए समझाया गया।उन्होंने कहा कि अब संस्था का लक्ष्य और बड़ा है। आगामी समय में 1000 बाल विवाह रोकने का लक्ष्य लेकर अभियान को और अधिक गांवों एवं परिवारों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा।
बाल विवाह रोकने में सबसे बड़ी चुनौती को लेकर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी रूढ़िवादी सोच, सामाजिक दबाव और जागरूकता की कमी बड़ी चुनौती है। कुछ परिवार आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण बच्चों का विवाह कम उम्र में करने का निर्णय लेते हैं। कई अभिभावक बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं और कम उम्र में विवाह को अपनी जिम्मेदारी पूरी करने का माध्यम समझ लेते हैं।उन्होंने कहा कि इस सोच को बदलने के लिए केवल कानून का डर दिखाना पर्याप्त नहीं है। परिवारों को यह समझाना जरूरी है कि बच्चों को बेहतर शिक्षा, सुरक्षित वातावरण और अपने भविष्य का निर्णय लेने के लिए पर्याप्त अवसर देना ही उनकी वास्तविक जिम्मेदारी है।
बच्चों की भूमिका से जुड़े प्रश्न के उत्तर में देवेंद्र दुबे ने बताया कि बाल विवाह रोकने के लिए बच्चों और किशोर-किशोरियों को भी उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना आवश्यक है। बच्चों को यह जानकारी होनी चाहिए कि कम उम्र में विवाह उनके जीवन और भविष्य को किस तरह प्रभावित कर सकता है। स्कूलों और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों तक यह जानकारी पहुंचाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।उन्होंने कहा कि शिक्षा बाल विवाह रोकने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। जब बच्चे पढ़ाई से जुड़े रहते हैं और अपने भविष्य के प्रति जागरूक होते हैं तो कम उम्र में विवाह की संभावना कम होती है।
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में प्रशासनिक सहयोग को लेकर उन्होंने बताया कि बाल विवाह की सूचना मिलने पर महिला एवं बाल विकास विभाग और पुलिस प्रशासन द्वारा त्वरित कार्रवाई की जाती है। प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल होने से कई मामलों में समय रहते बाल विवाह को रोका जा सकता है।
उन्होंने आम नागरिकों से भी अपील की कि यदि उन्हें कहीं बाल विवाह होने की जानकारी मिलती है तो वे इसकी सूचना संबंधित विभाग या पुलिस प्रशासन को दें। समय पर मिलने वाली सूचना किसी बच्चे का भविष्य सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
विभागों के बीच समन्वय की आवश्यकता
पत्रकार वार्ता के दौरान देवेंद्र दुबे ने कहा कि बाल विवाह की रोकथाम के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग, शिक्षा विभाग, पुलिस प्रशासन, पंचायतों और सामाजिक संस्थाओं के बीच निरंतर समन्वय होना जरूरी है। केवल किसी एक विभाग या संस्था के प्रयास से इस सामाजिक कुप्रथा को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।उन्होंने कहा कि गांव-गांव तक जागरूकता पहुंचाने, अभिभावकों से संवाद करने और बच्चों को उनके अधिकारों की जानकारी देने के साथ-साथ समाज के प्रभावशाली लोगों को भी इस अभियान से जोड़ना होगा।
बाल विवाह के दुष्परिणामों की दी जानकारी
पत्रकार वार्ता में बाल विवाह के कारण बच्चों की शिक्षा छूटने, कम उम्र में जिम्मेदारियों का बोझ आने, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ने तथा उनके मानसिक और सामाजिक विकास पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई। संस्था ने कहा कि बाल विवाह को रोकना केवल कानून का पालन कराने का विषय नहीं है, बल्कि बच्चों को सुरक्षित और बेहतर भविष्य देने की दिशा में महत्वपूर्ण सामाजिक जिम्मेदारी है।
आमजन से की बाल विवाह के खिलाफ आगे आने की अपील
देवेंद्र दुबे ने आमजन से अपील करते हुए कहा कि बाल विवाह की जानकारी होने पर समाज को चुप नहीं रहना चाहिए। प्रत्येक नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ऐसे मामलों की सूचना प्रशासन तक पहुंचानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब परिवार, समाज, प्रशासन और सामाजिक संस्थाएं मिलकर प्रयास करेंगे, तभी बाल विवाह जैसी कुप्रथा को जड़ से समाप्त किया जा सकेगा।उन्होंने कहा कि 27 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय बाल विवाह निषेध दिवस के रूप में स्थापित करने की पहल भी इसी व्यापक सोच का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य दुनिया भर में बच्चों के सुरक्षित भविष्य और उनके अधिकारों को लेकर जनजागरूकता बढ़ाना है।
पत्रकार वार्ता के दौरान बाल विवाह के कानूनी प्रावधानों, इसके सामाजिक एवं स्वास्थ्य संबंधी दुष्परिणामों और रोकथाम के उपायों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। इस अवसर पर नगर पालिका परिषद दमोह की पूर्व अध्यक्ष श्रीमती मालती असाटी, खुशबू तिवारी सहित संस्था से जुड़े पदाधिकारी और पत्रकारगण उपस्थित रहे।
