निजी विश्वविद्यालयों को शोध और अनुसंधान के जरिए प्राचीन ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का आह्वान
भोपाल। राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल प्राचीन ग्रंथों और इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जीवन को समझने की गहरी दृष्टि, व्यावहारिकता और मानव कल्याण की भावना समाहित है। हमारी संस्कृति प्रकृति को जीवन का अभिन्न हिस्सा मानती है और सूर्य, चंद्रमा, ग्रह-नक्षत्र के साथ-साथ पंचतत्वों को भी जीवन से जोड़कर देखती है।
राज्यपाल मंगलवार को कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में निजी विश्वविद्यालयों के योगदान’ विषय पर आयोजित कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। कार्यशाला का आयोजन मध्यप्रदेश निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग और निजी विश्वविद्यालय संघ के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। कार्यक्रम में उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार भी मौजूद रहे।
राज्यपाल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को वर्तमान दौर की आवश्यकताओं से जोड़ने की जरूरत है। निजी विश्वविद्यालय इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने शोध, अनुसंधान और दस्तावेजीकरण को बढ़ावा देने के साथ विश्वविद्यालयों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया, ताकि प्राचीन ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सके।
रामायण-महाभारत में ज्ञान और संस्कारों का भंडार
राज्यपाल पटेल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की जड़ें वैदिक, पौराणिक और प्राचीन सांस्कृतिक विरासत में हैं। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, संस्कार और जीवन मूल्यों के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
उन्होंने कहा कि इन ग्रंथों के विभिन्न पात्र प्रेम, त्याग, सम्मान, स्वाभिमान, कर्तव्य और नैतिकता जैसे मूल्यों की प्रेरणा देते हैं। निजी विश्वविद्यालयों को चाहिए कि विद्यार्थियों को इन मूल्यों से परिचित कराने के साथ समाज के गरीब, पिछड़े, वंचित और कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील बनाएं।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य ऐसी पीढ़ी तैयार करना होना चाहिए, जो विकसित भारत के निर्माण में सक्षम और सामर्थ्यवान भूमिका निभा सके।
शिक्षा वही, जो अज्ञान और भय से मुक्ति दिलाए
राज्यपाल ने भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन भारत में शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ याद कराना नहीं था। शिक्षा के माध्यम से चरित्र निर्माण, अनुशासन, आत्मनिर्भरता और कर्तव्यबोध विकसित किया जाता था।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में ज्ञान की सार्थकता मानव जीवन और समाज के कल्याण से जुड़ी रही है। ऐसी शिक्षा को महत्वपूर्ण माना गया, जो व्यक्ति को अज्ञान, भय और बंधनों से मुक्त करे तथा समाज में सभी के सुख और कल्याण की भावना को मजबूत बनाए।
चरक से कौटिल्य तक, ज्ञान की समृद्ध विरासत
राज्यपाल ने कहा कि भारत की पहचान केवल एक प्राचीन राष्ट्र के रूप में नहीं, बल्कि ऐसी ज्ञान सभ्यता के रूप में है, जिसने सत्य की खोज और लोककल्याण को महत्व दिया।
उन्होंने कहा कि उपनिषदों में जिज्ञासा, वेदों में प्रकृति और ब्रह्मांड के प्रति सम्मान तथा भारतीय दर्शन में जीवन के गहरे प्रश्नों पर चिंतन दिखाई देता है। वहीं चरक और सुश्रुत ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में व्यवस्थित ज्ञान को आगे बढ़ाया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में शासन, अर्थव्यवस्था, कूटनीति और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े विचार आज भी अध्ययन और शोध का विषय हैं।
राज्यपाल ने निजी विश्वविद्यालयों से इस विरासत को आधुनिक शिक्षा और शोध के साथ जोड़ने का आह्वान किया।
भारतीय ज्ञान परंपरा केवल पाठ्यक्रम नहीं : परमार
उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इंदर सिंह परमार ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा मानना उचित नहीं होगा। यह समाज के दैनिक जीवन में मौजूद व्यावहारिक ज्ञान की समृद्ध परंपरा है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा व्यवस्था में प्रभावी ढंग से शामिल करने का अवसर दिया है। इसके लिए सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों के बीच सक्रिय सहयोग आवश्यक है।
परमार ने निजी विश्वविद्यालयों से भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए विशेष प्रकोष्ठ गठित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्राचीन ज्ञान को तथ्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर संरक्षित किया जाए तथा उसे जीवनोपयोगी पाठ्य सामग्री के रूप में विकसित किया जाए।
आधुनिकता के साथ स्थानीय ज्ञान का समन्वय जरूरी
कार्यशाला में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा से जोड़ने के क्षेत्र में मध्यप्रदेश की पहल की सराहना की।
मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी के संचालक अशोक कड़ेल ने भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित पाठ्यक्रम तैयार करने और प्रकाशन कार्यों की जानकारी दी।
उच्च शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव अनुपम राजन ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के भविष्य के रोडमैप में स्थानीयता और आधुनिकता का संतुलित समन्वय आवश्यक है। उन्होंने प्रशिक्षण, शोध, अनुसंधान, प्रमाणित पाठ्यक्रम और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को महत्वपूर्ण बताया।
कार्यशाला के शुभारंभ पर राज्यपाल ने दीप प्रज्ज्वलित किया। निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के अध्यक्ष डॉ. खेमसिंह डेहरिया और निजी विश्वविद्यालय संघ के अध्यक्ष डॉ. संजीव अग्रवाल ने उनका स्वागत किया। कार्यक्रम में उच्च शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के सदस्य, निजी विश्वविद्यालय संघ के पदाधिकारी और शिक्षाविद् उपस्थित रहे।
