सागर की त्रासदी ने फिर खोले व्यवस्था के घाव—पुलिस का अभियान तेज, लेकिन सवाल यह कि मौत से पहले क्यों नहीं टूटता अवैध शराब का नेटवर्क?

(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
मध्य प्रदेश में जहरीली और अवैध शराब का कारोबार कोई नई समस्या नहीं है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में समय-समय पर जहरीली शराब लोगों की जिंदगी निगलती रही है। सागर की हालिया त्रासदी ने एक बार फिर उसी पुराने सवाल को सामने ला खड़ा किया है—आखिर अवैध शराब के खिलाफ सिस्टम तब ही क्यों जागता है, जब कई परिवार उजड़ चुके होते हैं?
घटना के बाद पुलिस सक्रिय होती है, प्रशासन बैठकें करता है, छापेमारी शुरू होती है, संदिग्ध पकड़े जाते हैं और अवैध शराब की बरामदगी के आंकड़े सामने आते हैं। लेकिन कुछ समय बाद हालात फिर सामान्य होने लगते हैं और अवैध शराब का कारोबार किसी दूसरे रास्ते से अपना नेटवर्क खड़ा कर लेता है।यही वह चक्र है जिसे तोड़ना अब सबसे बड़ी चुनौती है।
सागर की घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जांच में अवैध शराब की सप्लाई दूसरे राज्य से मध्य प्रदेश तक पहुंचने की जानकारी सामने आई है। नकली रैपर और फर्जी क्यूआर कोड के जरिए शराब को असली ब्रांड जैसा दिखाने की कोशिश किए जाने की बात सामने आई है। इसका अर्थ साफ है कि मामला केवल किसी एक व्यक्ति द्वारा चोरी-छिपे शराब बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक संगठित सप्लाई नेटवर्क होने की आशंका है।
पुलिस का अभियान तेज, लेकिन असली चुनौती नेटवर्क की जड़ तक पहुंचना
सागर की घटना के बाद पुलिस ने अवैध शराब के खिलाफ अभियान तेज किया है। दूसरे राज्य की पुलिस के सहयोग से संदिग्ध ठिकानों पर दबिश दी जा रही है। स्थानीय स्तर पर शराब बेचने और सप्लाई करने वालों की तलाश की जा रही है।लेकिन पुलिस के सामने चुनौती केवल आरोपियों को गिरफ्तार करने की नहीं है। असली चुनौती उस पूरी सप्लाई चेन को तोड़ने की है जिसमें शराब तैयार करने वाले, परिवहन करने वाले, भंडारण करने वाले और स्थानीय स्तर पर उसे बेचने वाले लोग शामिल हो सकते हैं।यदि केवल अंतिम कड़ी पकड़ी जाती है और नेटवर्क के पीछे बैठे लोग बच निकलते हैं तो कुछ समय बाद वही कारोबार नए लोगों और नए रास्तों के साथ फिर खड़ा हो सकता है।
इसलिए जांच का दायरा बोतल से लेकर नेटवर्क की जड़ तक पहुंचना जरूरी है।
दूसरे राज्यों से आने वाली शराब पर निगरानी बड़ी चुनौती
सागर की घटना ने यह भी दिखाया है कि अवैध शराब का कारोबार जिला और राज्य की सीमाओं से आगे तक फैला हो सकता है। दूसरे राज्यों से आने वाली शराब को रोकना पुलिस और प्रशासन के लिए आसान काम नहीं है।तस्कर अक्सर रास्ते बदलते हैं। मुख्य मार्गों के बजाय ग्रामीण रास्तों का इस्तेमाल किया जा सकता है। छोटे वाहनों और अलग-अलग माध्यमों से शराब को मंजिल तक पहुंचाया जा सकता है।ऐसे में सिर्फ मुख्य सड़कों पर जांच बढ़ा देना पर्याप्त नहीं है। सीमावर्ती क्षेत्रों, ग्रामीण रास्तों, संदिग्ध गोदामों और उन स्थानों पर भी लगातार नजर रखने की आवश्यकता है जहां अवैध शराब के भंडारण या वितरण की आशंका हो।इसके लिए पड़ोसी राज्यों की पुलिस और आबकारी विभाग के बीच लगातार सूचना साझा करना और संयुक्त कार्रवाई करना जरूरी है।
मौतों का सिलसिला पहले भी कई बार सामने आ चुका है
सागर की घटना को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता। मध्य प्रदेश में उज्जैन, मुरैना, मंदसौर और इंदौर सहित कई स्थानों पर जहरीली शराब से मौतों की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।उज्जैन में वर्ष 2020 की घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। मुरैना में 2021 में अवैध शराब के सेवन से बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और कई लोगों की आंखों की रोशनी तक चली गई। मंदसौर और इंदौर में भी जहरीली शराब से मौतों के बाद पुलिस और प्रशासन ने कार्रवाई की।इन घटनाओं के बाद आरोपी गिरफ्तार हुए, जांच हुई और कुछ मामलों में अधिकारियों पर भी कार्रवाई की गई।लेकिन वर्षों बाद भी यदि जहरीली शराब का कारोबार नए रूप में सामने आ रहा है तो यह सवाल स्वाभाविक है कि पिछली घटनाओं से सिस्टम ने आखिर कितना सबक लिया?
सिस्टम के सामने सबसे बड़ा सवाल—सूचना पहले क्यों नहीं मिलती?
अवैध शराब का कारोबार किसी बंद कमरे में एक दिन में शुरू होकर अचानक हजारों लोगों तक नहीं पहुंच जाता। इसके पीछे कई स्तर होते हैं। निर्माण, भंडारण, परिवहन और बिक्री की पूरी श्रृंखला होती है।कई बार स्थानीय लोगों को भी इसकी जानकारी होती है।ऐसे में पुलिस और प्रशासन के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है—मौत होने से पहले खतरे की सूचना हासिल करना।यदि किसी गांव या क्षेत्र में लंबे समय से अवैध शराब बिक रही है और इसकी शिकायतें भी मिल रही हैं, तो कार्रवाई में देरी क्यों होती है?यदि शिकायत नहीं मिलती तो स्थानीय सूचना तंत्र कितना सक्रिय है?और यदि जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई तो जवाबदेही किसकी होगी?इन सवालों से बचने के बजाय व्यवस्था को इनका जवाब तलाशना होगा।
पुलिस और आबकारी विभाग के बीच तालमेल भी जरूरी
अवैध शराब के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। आबकारी विभाग की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।शराब के वैध कारोबार पर निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी, अवैध भंडारण की पहचान और स्थानीय स्तर पर होने वाली शिकायतों पर कार्रवाई—इन सभी मामलों में पुलिस और आबकारी विभाग के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।सिर्फ घटना के बाद संयुक्त अभियान चलाने के बजाय संवेदनशील क्षेत्रों की लगातार निगरानी की व्यवस्था बनानी होगी।
अभियान की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी बोतलें जब्त हुईं, बल्कि इस बात से होनी चाहिए कि अवैध सप्लाई का नेटवर्क कितने समय तक दोबारा सक्रिय नहीं हुआ।
नकली रैपर और क्यूआर कोड ने चुनौती और बढ़ाई
सागर मामले में नकली रैपर और क्यूआर कोड के इस्तेमाल की जानकारी सामने आना एक नई चुनौती की ओर भी संकेत करता है।यदि अवैध शराब को इस तरह पैक किया जा रहा है कि आम ग्राहक उसे असली समझ ले, तो केवल सामान्य जांच से इसकी पहचान कठिन हो सकती है।ऐसे मामलों में पुलिस और आबकारी अमले को तकनीकी रूप से प्रशिक्षित करने, आधुनिक जांच उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ाने और नकली पैकेजिंग के स्रोत तक पहुंचने की जरूरत है।
रसायन की सच्चाई भी जनता के सामने आनी चाहिए
जहरीली शराब से मौत के हर मामले में एक सवाल बेहद महत्वपूर्ण होता है—आखिर शराब में ऐसा क्या था जिसने लोगों की जान ले ली?पहले भी कई मामलों में डिनैचर्ड या मेथिलेटेड स्पिरिट और जहरीले अल्कोहल से जुड़े तत्वों का उल्लेख हुआ है। लेकिन ऐसी घटनाओं में वैज्ञानिक जांच के अंतिम निष्कर्ष और जहरीले पदार्थ की स्पष्ट जानकारी आम लोगों तक पारदर्शी तरीके से पहुंचना जरूरी हैयह जानकारी केवल कानूनी जांच के लिए नहीं, बल्कि जनजागरूकता के लिए भी महत्वपूर्ण है।
सिर्फ सिस्टम को दोष देना भी पर्याप्त नहीं
अवैध शराब के मामले में प्रशासन और पुलिस से सवाल करना जरूरी है, लेकिन समाज को भी अपनी जिम्मेदारी से बचना नहीं चाहिए।यदि किसी गांव, मोहल्ले या कस्बे में अवैध शराब खुलेआम बिक रही है और लोग जानते हुए भी चुप हैं, तो यह चुप्पी भी समस्या को बढ़ाने में भूमिका निभाती है।कई बार लोग यह सोचकर नजरअंदाज कर देते हैं कि अवैध शराब पीने वाला अपनी जिंदगी खुद खराब कर रहा है। लेकिन जब जहरीली शराब मौत का कारण बनती है तो उसकी कीमत पूरा परिवार चुकाता है।एक व्यक्ति की मौत के साथ बच्चों की पढ़ाई रुक सकती है, परिवार की आय का स्रोत खत्म हो सकता है और घर वर्षों तक आर्थिक संकट में रह सकता है।इसलिए समाज को भी तय करना होगा कि वह अवैध शराब को सामान्य गतिविधि मानकर चुप नहीं रहेगा।
नशे से दूरी है जरूरी
इस पूरे संकट का सबसे बड़ा सामाजिक संदेश यही है—नशे से दूरी है जरूरी।नशा किसी भी रूप में व्यक्ति और परिवार के लिए नुकसानदायक हो सकता है। विशेष रूप से युवाओं को इससे बचाना समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए।परिवारों को बच्चों और युवाओं के साथ संवाद बढ़ाना होगा। स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम होने चाहिए। पंचायतों और सामाजिक संगठनों को नशा मुक्ति अभियान लगातार चलाना चाहिए।युवाओं को खेल, शिक्षा, रोजगार और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना भी जरूरी है।
नशे के खिलाफ लड़ाई सिर्फ पुलिस की कार्रवाई से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए परिवार, समाज और प्रशासन तीनों को साथ आना होगा।
पुलिस अभियान लगातार चलना चाहिए
सागर की घटना के बाद अवैध शराब के खिलाफ जो कार्रवाई शुरू हुई है, उसे केवल कुछ दिनों का अभियान नहीं बनने देना चाहिए।संवेदनशील क्षेत्रों की सूची तैयार हो। पुराने मामलों में शामिल लोगों की गतिविधियों पर नजर रखी जाए। दूसरे राज्यों से आने वाली अवैध शराब की निगरानी बढ़ाई जाए। संदिग्ध ठिकानों की नियमित जांच हो और स्थानीय शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की व्यवस्था बने।साथ ही यह भी देखा जाए कि जिस इलाके में कार्रवाई की गई, वहां कुछ महीने बाद स्थिति क्या है।
क्योंकि असली सफलता छापेमारी के दिन नहीं, उसके बाद दिखाई देती है।
पुलिस-प्रशासन के सामने असली चुनौती
आज पुलिस और प्रशासन के सामने चार बड़ी चुनौतियां हैं—
पहली— अवैध शराब के पूरे नेटवर्क की पहचान और उसे जड़ से खत्म करना।
दूसरी— दूसरे राज्यों से आने वाली अवैध शराब की सप्लाई रोकना।
तीसरी— स्थानीय सूचना तंत्र को मजबूत कर समय रहते कार्रवाई करना।
चौथी— पुलिस, आबकारी विभाग और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय बनाना।
इनके साथ एक पांचवीं चुनौती भी है—जनता का भरोसा कायम करना।
जब लोगों को यह विश्वास होगा कि उनकी सूचना पर कार्रवाई होगी और उनकी पहचान सुरक्षित रहेगी, तभी समाज अवैध शराब के खिलाफ खुलकर सामने आएगा।
मौत के बाद जागना नहीं, पहले चेतना जरूरी
सागर की घटना को केवल एक और शराब त्रासदी मानकर आगे बढ़ जाना उचित नहीं होगा। इसे एक चेतावनी के रूप में देखना होगा।सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि अवैध शराब का नेटवर्क किसी बड़ी घटना का इंतजार किए बिना पकड़ा जाए। पुलिस को अपनी खुफिया व्यवस्था और स्थानीय संपर्क मजबूत करने होंगे। आबकारी विभाग को भी लगातार निगरानी करनी होगी।और समाज को भी यह समझना होगा कि किसी अवैध कारोबार को देखकर चुप रहना समाधान नहीं है।
मौत के बाद आरोपी को पकड़ना जरूरी है, लेकिन मौत से पहले खतरे को पहचान लेना उससे कहीं बड़ी सफलता है।
एक बोतल शराब के पीछे पूरा परिवार दांव पर लग सकता है
जहरीली शराब की एक बोतल सिर्फ एक व्यक्ति की जान नहीं लेती। वह पूरे परिवार का भविष्य बदल सकती है।
इसलिए संदेश स्पष्ट है—
नशे से दूरी है जरूरी।
अवैध शराब का विरोध जरूरी है।
संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देना जरूरी है।
और पुलिस-प्रशासन से जवाबदेही मांगना भी जरूरी है।
सागर की त्रासदी से यदि सिस्टम और समाज दोनों सबक लेते हैं, तो शायद आने वाले समय में किसी दूसरे परिवार को अपने सदस्य की मौत के बाद यह सवाल न पूछना पड़े कि “अगर समय रहते कार्रवाई हो जाती तो क्या हमारी जिंदगी बच सकती थी?”यही इस त्रासदी से निकलने वाला सबसे बड़ा संदेश होना चाहिए।
