कथा के अनुसार माता पार्वती ने राजा हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था। बचपन से ही उनके मन में भगवान शिव को पति के रूप में पाने की इच्छा थी। उन्होंने भगवान शिव की प्राप्ति के लिए कठिन तपस्या शुरू कर दी। धार्मिक मान्यता के अनुसार पार्वती ने लंबे समय तक भगवान शिव का ध्यान किया और कठोर तप करते हुए अपनी इच्छा पर अडिग रहीं। उनकी तपस्या का उद्देश्य केवल भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना था।
इसी दौरान एक दिन नारद मुनि राजा हिमालय के पास पहुंचे। उन्होंने पार्वती के विवाह के लिए भगवान विष्णु का प्रस्ताव रखा। राजा हिमालय ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और पार्वती का विवाह भगवान विष्णु से करने का मन बना लिया। जब माता पार्वती को इस बात का पता चला तो वह बहुत दुखी हुईं क्योंकि वह मन से भगवान शिव को अपना पति मान चुकी थीं।
पार्वती ने अपनी व्यथा अपनी सखी को बताई। सखी ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें घने जंगल में ले जाने का निर्णय लिया ताकि उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से न हो। पार्वती अपनी सखी के साथ जंगल में चली गईं और एक गुफा में रहकर भगवान शिव की आराधना करने लगीं। उन्होंने कठोर तप किया और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखा।
माता पार्वती की तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने पार्वती को दर्शन देकर उनकी इच्छा पूरी होने का आशीर्वाद दिया और उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वचन दिया। इसके बाद पार्वती की सखी उन्हें लेकर वापस लौटीं। राजा हिमालय अपनी पुत्री के अचानक गायब होने से चिंतित थे और उन्हें लगा कि किसी ने पार्वती का अपहरण कर लिया है। काफी खोजबीन के बाद जब उन्हें पार्वती और उनकी सखी मिलीं तो उन्होंने बेटी से वापस घर चलने को कहा।
पार्वती ने पिता के सामने अपनी इच्छा रखी कि वह तभी घर लौटेंगी जब उनका विवाह भगवान शिव से कराने का वचन दिया जाएगा। राजा हिमालय ने बेटी की इच्छा स्वीकार कर ली। इसके बाद उचित समय आने पर माता पार्वती का विवाह भगवान शिव के साथ हुआ। इसी पौराणिक प्रसंग से हरतालिका तीज का संबंध माना जाता है।
हरतालिका नाम भी इसी कथा से जुड़ा माना जाता है। हरत और आलिका शब्दों से मिलकर बने हरतालिका का अर्थ सखी द्वारा पार्वती को अपने साथ ले जाना और उनके लिए रास्ता बनाना माना जाता है। इसीलिए हरतालिका तीज पर महिलाएं माता पार्वती के तप और उनके अटूट संकल्प को याद करती हैं। मान्यता है कि इस दिन शिव पार्वती की पूजा और व्रत कथा का श्रवण करने से दांपत्य जीवन में सुख और सौभाग्य की कामना की जाती है।
इस कथा का सबसे बड़ा संदेश यही माना जाता है कि माता पार्वती ने अपने संकल्प को पूरा करने के लिए कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं छोड़ा। हरतालिका तीज इसलिए केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं बल्कि प्रेम आस्था तपस्या और दृढ़ संकल्प का प्रतीक भी माना जाता है।
