बॉलीवुड की चर्चित फिल्म डॉन इसका बेहतरीन उदाहरण है। साल 2006 में रिलीज हुई इस फिल्म में शाह रुख खान ने डॉन का किरदार निभाया था। फिल्म के गणपति विसर्जन वाले दृश्य में जबरदस्त भीड़ और उत्सव के बीच पुलिस डॉन का पीछा करती है। इसी अफरा तफरी में डॉन घायल होकर कोमा में चला जाता है। इसके बाद कहानी पूरी तरह बदल जाती है। डॉन की जगह उसके हमशक्ल विजय को गैंग में भेजा जाता है। गणपति विसर्जन के बीच घटने वाली यह घटना फिल्म के सस्पेंस और पहचान से जुड़े सबसे बड़े मोड़ों में से एक बन जाती है।
संजय दत्त की फिल्म वास्तव द रियलिटी में भी गणपति विसर्जन कहानी के बेहद भावुक और निर्णायक हिस्से के रूप में सामने आता है। रघु परिस्थितियों के कारण अपराध की दुनिया में पहुंच जाता है और धीरे धीरे एक खतरनाक गैंगस्टर बन जाता है। फिल्म के अंत में गणपति विसर्जन का जुलूस चल रहा होता है। चारों तरफ भीड़ और बप्पा के जयकारों के बीच रघु अपनी मां तक पहुंचता है। मां समझ जाती है कि उसका बेटा अपराध की दुनिया से वापस नहीं लौट सकता। इसके बाद वह ऐसा फैसला लेती है जो हिंदी सिनेमा के सबसे दर्दनाक क्लाइमेक्स में गिना जाता है। गणपति विसर्जन के बीच मां अपने ही बेटे को गोली मार देती है।
ऋतिक रोशन की अग्निपथ में भी गणपति उत्सव कहानी के महत्वपूर्ण हिस्से से जुड़ा है। देवा श्री गणेशा गीत के दौरान विजय गणपति पूजा करता है और इसके बाद अपने दुश्मन सूर्या को खत्म करने के लिए आगे बढ़ता है। सूर्या की हत्या के बाद कांचा चीना विजय और उसके परिवार को खत्म करने की कसम खाता है। इस तरह गणपति उत्सव के दौरान लिया गया फैसला आगे की कहानी में बड़े संघर्ष की नींव रखता है।
राम गोपाल वर्मा की सरकार 3 में भी गणपति आरती के दौरान कहानी में बड़ा मोड़ आता है। अमिताभ बच्चन का किरदार सुभाष नागरे गणपति आरती कर रहा होता है तभी उस पर गोलीबारी होती है। यह हमला फिल्म में चल रही राजनीतिक साजिशों और सत्ता संघर्ष को नया मोड़ देता है।
इन फिल्मों को देखकर साफ समझ आता है कि बॉलीवुड ने गणेश चतुर्थी को सिर्फ आस्था और उत्सव के दृश्य के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया। कई बार बप्पा की मौजूदगी कहानी के सबसे अहम मोड़ का कारण बनी। कहीं पहचान बदली तो कहीं रिश्तों की परीक्षा हुई और कहीं दुश्मनी ने नया रूप लिया। यही वजह है कि गणपति उत्सव से जुड़े ये फिल्मी दृश्य आज भी दर्शकों की यादों में खास जगह बनाए हुए हैं।
