20 लाख 40 हजार के ‘आशीर्वाद के दीये’ से दमोह रोशन, लेकिन चार घंटे का जाम, पंचायत सचिवों की जेब पर खर्च और कार्यक्रम खत्म होते ही तेल बटोरते बच्चे-कर्मचारी छोड़ गए कई सवाल
चाणक्य के दो दीपकों की कहानी और बुंदेलखंड की कहावत के आईने में देखिए दमोह का दीपोत्सव—सरकारी संसाधन, प्रशासनिक अमला और राजनीतिक श्रेय के बीच आखिर जवाबदेही किसकी?

(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
दमोह। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर 17 सितंबर को दमोह में ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। कीर्ति स्तंभ से घंटाघर तक सड़क दीपों से जगमगा उठी। रोशनी का यह दृश्य आकर्षक था, लोगों की भागीदारी भी दिखाई दी और आयोजन ने शहर का ध्यान खींचा। लेकिन दीपों की लौ बुझने के बाद जो सवाल सामने आए हैं, वे शायद उस रोशनी से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।आयोजन पर लगभग 20 लाख 40 हजार रुपये खर्च होने का उल्लेख किया गया है। ग्राम पंचायतों में सचिवों द्वारा अपनी जेब से राशि खर्च किए जाने की बात भी सामने आई है। शहर में कीर्ति स्तंभ से घंटाघर तक दीप सजाए जाने के कारण लगभग चार घंटे तक यातायात प्रभावित होने की बात है।और फिर कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सामने आया एक दृश्य—कुछ बच्चे और कुछ लोग दीप बुझाकर उनमें बचा तेल बोतलों में भरते हुए नजर आए। मौके पर मौजूद कुछ लोग स्वयं को नगर पालिका का कर्मचारी बता रहे थे, जबकि कुछ बच्चे भी तेल भरकर ले जाते दिखाई दिए।
यहीं से पत्रकारिता का मूल प्रश्न शुरू होता है—
अगर यह सार्वजनिक आयोजन था, सामग्री सार्वजनिक संसाधनों से खरीदी गई थी और प्रशासनिक तंत्र इसकी व्यवस्था में लगा था, तो कार्यक्रम समाप्त होने के बाद दीपों में बचा तेल किसका था? उसे कौन ले जा रहा था? किसके आदेश से? क्या इसका कोई हिसाब है?इन सवालों का जवाब आरोप लगाकर नहीं, बल्कि जिम्मेदार विभाग द्वारा स्पष्ट जानकारी देकर दिया जाना चाहिए।
दीपों की रोशनी में सबसे बड़ा सवाल—खर्च का हिसाब कहां है?
किसी भी सार्वजनिक आयोजन की भव्यता पर सवाल उठाना पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं है। सवाल तब पैदा होता है जब सार्वजनिक धन और संसाधनों का उपयोग होता है और जनता यह जानना चाहती है कि उसका पैसा कहां और कैसे खर्च हुआ।यदि आयोजन पर 20 लाख 40 हजार रुपये खर्च हुए हैं तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि—कितने दीये खरीदे गए?प्रति दीया कितनी कीमत चुकाई गई?कितना तेल खरीदा गया?बाती, माचिस और मोमबत्ती पर कितना खर्च हुआ?सजावट, परिवहन और श्रमिकों पर कितना भुगतान किया गया?किस विभाग ने खरीद की?किसे भुगतान किया गया?क्या पूरी खरीद प्रक्रिया नियमानुसार हुई?और सबसे महत्वपूर्ण—क्या इस पूरे खर्च का मदवार विवरण सार्वजनिक किया जाएगा?क्योंकि दीपक की लौ कुछ घंटे जलती है, लेकिन सार्वजनिक धन के खर्च का हिसाब वर्षों तक जनता के सामने रहना चाहिए।
चाणक्य के दो दीपक आज फिर क्यों याद आ रहे हैं?
आचार्य चाणक्य से जुड़ा एक प्रसिद्ध प्रसंग इस पूरे घटनाक्रम के बीच अपने आप याद आता है। इसे ऐतिहासिक प्रमाण के बजाय एक लोकप्रिय नैतिक दृष्टांत के रूप में देखा जाता है।कहा जाता है कि चाणक्य अपने कक्ष में राष्ट्र के कार्य में व्यस्त थे। उसी समय उनका एक मित्र उनसे मिलने आया। चाणक्य ने पहले जल रहे दीपक को बुझाकर दूसरा दीपक जला दिया।मित्र ने पूछा—ऐसा क्यों?चाणक्य ने समझाया कि पहला दीपक राष्ट्र के कार्य के लिए जल रहा था, इसलिए उसमें राष्ट्र के संसाधनों का उपयोग हो रहा था। अब जब वह निजी बातचीत कर रहे हैं तो निजी दीपक जलना चाहिए।कहानी का संदेश बेहद स्पष्ट है—सार्वजनिक और निजी संसाधनों के बीच अंतर और उसकी जवाबदेही।
आज दमोह के ‘आशीर्वाद के दीये’ के बाद यही दृष्टांत एक बड़ा सवाल बनकर सामने खड़ा है—
क्या सरकारी संसाधन और राजनीतिक आयोजन के बीच भी वही स्पष्ट सीमा दिखाई देनी चाहिए?
यदि प्रशासनिक व्यवस्था ने सामग्री जुटाई, सरकारी अमला लगा और सार्वजनिक धन खर्च हुआ, तो जनता को यह जानने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए कि इसकी पूरी जिम्मेदारी और खर्च का स्वरूप क्या था?
बुंदेलखंड की कहावत ने जैसे पूरे दृश्य को आईना दिखा दिया
बुंदेलखंड की एक लोककहावत है—
“दीप जले, बाती जले, नाम दिया का होय,
लल्ला खेले को का काहू का, नाम पिया का होय।”
इस कहावत का आशय यह है कि संसाधन और मेहनत किसी की हो, लेकिन उसका श्रेय किसी और के नाम चला जाए तो सवाल पैदा होता है।
दमोह के इस आयोजन में प्रशासनिक तंत्र और संबंधित विभागों द्वारा दीये, तेल, बाती, माचिस तथा अन्य व्यवस्थाएं किए जाने की बात सामने आई है। दूसरी ओर भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं की आयोजन में सक्रिय भूमिका और राजनीतिक संदेश भी सार्वजनिक रूप से दिखाई दिया।
यहां पत्रकारिता का सवाल किसी दल के समर्थन या विरोध का नहीं है।
सवाल सिर्फ इतना है—सरकारी संसाधन कितना लगा?राजनीतिक संगठन की भूमिका क्या रही?आयोजन का वास्तविक वित्तीय भार किस पर पड़ा?और सार्वजनिक धन से हुए आयोजन का राजनीतिक श्रेय किस रूप में लिया गया?इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए ताकि जनता स्वयं तथ्य समझ सके।
पंचायत सचिवों की जेब पर पड़ा भार—सरकारी कार्यक्रम या निजी खर्च?
प्रकाशित रिपोर्ट में ग्राम पंचायतों के सचिवों द्वारा अपनी जेब से लगभग 1700 रुपये तक खर्च किए जाने का उल्लेख है।यदि यह सरकारी स्तर का कार्यक्रम था तो सचिवों को अपनी जेब से खर्च करने की जरूरत क्यों पड़ी?क्या उन्हें लिखित निर्देश दिए गए थे?यदि खर्च किया गया तो उसकी प्रतिपूर्ति होगी या नहीं?यदि होगी तो किस मद से?और यदि प्रतिपूर्ति नहीं होगी तो सरकारी कार्यक्रम में कर्मचारियों से निजी धन खर्च कराने की व्यवस्था का औचित्य क्या है?यह रकम किसी एक कर्मचारी के लिए छोटी हो सकती है, लेकिन यदि यही व्यवस्था बड़ी संख्या में पंचायतों में हुई है तो कुल भार का प्रश्न भी सामने आता है।
कार्यक्रम खत्म होते ही तेल बोतलों में भरते लोग—यह दृश्य सवाल क्यों बन गया?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे असहज करने वाला पहलू कार्यक्रम समाप्त होने के बाद दिखाई दिया।दीपों की लौ बुझने लगी तो कुछ लोग दीपों में बचा तेल निकालकर बोतलों में भरते नजर आए। कुछ बच्चे भी ऐसा करते दिखाई दिए। मौके पर कुछ लोगों ने स्वयं को नगर पालिका कर्मचारी बताया।
अब सवाल यह नहीं कि किसी ने तेल उठाया या नहीं।सवाल यह है कि वह तेल किस मद से खरीदा गया था?यदि वह सार्वजनिक धन से खरीदा गया था तो कार्यक्रम के बाद उसका स्वामित्व किसका था?क्या बचा हुआ तेल वापस संबंधित विभाग को जमा होना था?क्या उसकी मात्रा का कोई रिकॉर्ड बनाया गया?
क्या नगर पालिका ने इसके लिए कोई अधिकृत व्यवस्था बनाई थी?क्या मौके पर मौजूद लोगों को तेल ले जाने की अनुमति थी?यदि सब कुछ नियम के अनुसार हुआ तो संबंधित विभाग के लिए इन सवालों के जवाब देना कठिन नहीं होना चाहिए।
और यदि कोई व्यक्ति बिना अनुमति ऐसा कर रहा था तो जिम्मेदार विभाग ने क्या कार्रवाई की?यही वह जगह है जहां एक तस्वीर या वीडियो महज दृश्य नहीं रहता—वह जवाबदेही का सवाल बन जाता है।
चार घंटे का जाम—उत्सव जरूरी, लेकिन नागरिक सुविधा का क्या?
कीर्ति स्तंभ से घंटाघर तक सड़क के एक हिस्से में दीप सजाए जाने से लगभग चार घंटे तक यातायात प्रभावित होने की बात सामने आई है।शहर में आयोजन हों, धार्मिक-सामाजिक कार्यक्रम हों या राष्ट्रीय महत्व के अवसर—जनभागीदारी लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन क्या आयोजन की योजना बनाते समय यातायात और व्यापारिक गतिविधियों का पर्याप्त ध्यान रखा गया?क्या वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था थी?क्या दुकानदारों को पहले जानकारी दी गई?क्या यातायात विभाग और नगर पालिका के बीच पर्याप्त समन्वय था?क्या भविष्य के आयोजनों के लिए इससे कोई सबक लिया जाएगा?भव्यता और जनसुविधा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बेहतर योजना दोनों को साथ लेकर चल सकती है।
दीप बुझ गए, लेकिन पत्रकारिता का सवाल अभी बाकी है
17 सितंबर की रात दमोह में दीप जले। तस्वीरें बनीं। आयोजन की चर्चा हुई। राजनीतिक संदेश भी सामने आया। लेकिन 18 सितंबर की सुबह पत्रकारिता का काम केवल यह बताना नहीं है कि कितने दीप जले।पत्रकारिता का काम यह पूछना भी है कि उन दीपों के पीछे कितना पैसा लगा, पैसा कहां से आया, किसने खर्च किया, किस नियम के तहत खर्च किया और कार्यक्रम समाप्त होने के बाद बची सामग्री का क्या हुआ?क्योंकि जनता को केवल जगमगाहट नहीं चाहिए—उसे हिसाब भी चाहिए।अगर 20 लाख 40 हजार रुपये खर्च हुए हैं तो हिसाब सामने रखिए।अगर पंचायत सचिवों ने अपनी जेब से खर्च किया है तो प्रतिपूर्ति का आदेश दिखाइए।अगर तेल सरकारी संसाधन से खरीदा गया है तो कार्यक्रम के बाद उसका लेखा बताइए।अगर नगर पालिका कर्मचारी तेल एकत्र कर रहे थे तो बताइए—किस आदेश के तहत?
अगर बच्चों ने तेल उठाया तो बताइए—उन्हें रोकने या सामग्री सुरक्षित रखने की व्यवस्था क्यों नहीं थी?और यदि इन सभी सवालों के पीछे पूरी तरह नियमसम्मत प्रक्रिया है, तो उसे सार्वजनिक करने में संकोच क्यों?
असली ‘आशीर्वाद’ पारदर्शिता का होना चाहिए
दीपक जलाना आस्था, उत्सव और शुभकामना का प्रतीक हो सकता है। लेकिन सार्वजनिक धन से होने वाला आयोजन पारदर्शिता और जवाबदेही का भी प्रतीक होना चाहिए।चाणक्य के लोकप्रिय दो दीपकों के प्रसंग का संदेश यही है कि राष्ट्र के संसाधन राष्ट्र के काम में और निजी संसाधन निजी काम में स्पष्ट रूप से अलग रहने चाहिए।
और बुंदेलखंड की कहावत अपने अंदाज में पूछती है—
“दीप जले, बाती जले, नाम दिया का होय?”
दमोह में अब जनता का सवाल इससे थोड़ा आगे है—
दीप किसने जलाए, तेल किसके पैसे से आया, व्यवस्था किसने की, खर्च किसने उठाया और नाम किसके खाते में गया?
इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक बहस से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, भुगतान विवरण, खरीद अभिलेख और जिम्मेदार अधिकारियों के स्पष्ट जवाब से मिलना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में दीपक की रोशनी कुछ घंटे रहती है,
लेकिन जनता के पैसे का हिसाब हमेशा जनता के सामने रहना चाहिए।
और यही वह जगह है जहां पत्रकारिता केवल खबर नहीं रहती—वह जनता और व्यवस्था के बीच जवाबदेही का आईना बन जाती है।
