डॉ. सुधा मलैया ने खोले 25 वर्ष की शैक्षणिक यात्रा के कई राज, बोलीं—विरोध और संकट आए, लेकिन लक्ष्य से नहीं भटके; 5 अक्टूबर सोमवार को होगा प्रथम दीक्षांत समारोह

( डॉ.एल.एन.वैष्णव )
दमोह। एक रेलगाड़ी की खिड़की से दिखाई देने वाले पुराने और अनुपयोगी भवनों को देखकर मन में उठे एक विचार ने कब संकल्प का रूप लिया और वह संकल्प कब विद्यालय, महाविद्यालय से होते हुए विश्वविद्यालय तक पहुंच गया, यह यात्रा अपने आप में किसी प्रेरक कहानी से कम नहीं है। वर्ष 2001 में ओजस्विनी विद्यालय की स्थापना से प्रारंभ हुई यह शैक्षणिक यात्रा आज एकलव्य विश्वविद्यालय के रूप में एक महत्वपूर्ण मुकाम पर पहुंच चुकी है।
एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह की संस्थापक एवं कुलाधिपति डॉ. सुधा मलैया ने प्रथम दीक्षांत समारोह के पूर्व आयोजित प्रेस ब्रीफिंग में संस्थान की स्थापना के पीछे की सोच, संघर्ष, आर्थिक कठिनाइयों, विरोध, उपलब्धियों और भविष्य की जिम्मेदारियों से जुड़े कई ऐसे पहलुओं को सामने रखा, जो अब तक व्यापक रूप से सामने नहीं आए थे।अपनी बात रखते हुए डॉ. सुधा मलैया कई बार भावुक दिखाई दीं। संघर्ष के दिनों को याद करते हुए उनकी आंखों में आंसू भी आए। उन्होंने कहा कि अनेक अवसर ऐसे आए, जब परिस्थितियां मन को पीड़ा देने वाली थीं, लेकिन लक्ष्य स्पष्ट था और इसी कारण विरोध तथा व्यवधानों को पीछे छोड़कर यात्रा जारी रखी गई।
रेलगाड़ी में सफर के दौरान आया था शैक्षणिक संस्था का विचार
डॉ. सुधा मलैया ने बताया कि जब वे निवास के समीप से गुजरने वाली रेलगाड़ी में बैठकर आती-जाती थीं, तब रास्ते में एक बड़ा परिसर दिखाई देता था। इस परिसर में छोटे-बड़े पुराने भवन मौजूद थे, जिनमें कभी मिलें संचालित हुआ करती थीं। समय बीतने के साथ यह परिसर और उसके भवन लगभग अनुपयोगी स्थिति में दिखाई देने लगे।उन्होंने बताया कि अक्सर मन में यह सवाल उठता था कि इतना बड़ा परिसर इस तरह क्यों पड़ा रहे। इसी विचार से यह कल्पना जन्मी कि यदि यहां कोई शैक्षणिक संस्था स्थापित की जाए तो इस स्थान का उपयोग आने वाली पीढ़ियों के भविष्य निर्माण के लिए किया जा सकता है।
यहीं से शुरू हुआ विचार धीरे-धीरे संकल्प में बदला और वर्ष 2001 में ओजस्विनी विद्यालय की स्थापना हुई। इसके बाद महाविद्यालय प्रारंभ हुआ और समय के साथ यही शैक्षणिक यात्रा विश्वविद्यालय की स्थापना तक पहुंच गई।डॉ. मलैया ने कहा कि यह सब किस प्रकार और इतनी तेजी से होता चला गया, इसे वे स्वयं भी पूरी तरह शब्दों में नहीं बता सकतीं। उन्होंने इसे ईश्वर की कृपा और आशीर्वाद का परिणाम बताया।
आर्थिक संसाधनों की कमी के बीच आगे बढ़ता गया संस्थान
संस्थान की स्थापना और विस्तार के दौरान आर्थिक परिस्थितियों के संबंध में पूछे गए सवाल पर डॉ. सुधा मलैया ने बताया कि आवश्यकता पड़ने पर परिवार का सहयोग और उत्साहवर्धन मिलता रहा। लेकिन संस्थान को खड़ा करने की यात्रा आसान नहीं थी।उन्होंने बताया कि कई बार उधारी के सहारे व्यवस्थाएं आगे बढ़ानी पड़ीं। संस्थान के लिए जो भी संसाधन उपलब्ध होते गए, उन्हें वापस इसी संस्थान के विकास में लगाया जाता रहा।उनके अनुसार प्राथमिकता हमेशा यही रही कि संस्था का विस्तार हो, विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिले और शिक्षा की व्यवस्था निरंतर आगे बढ़ती रहे।
राजनीतिक और अन्य विरोधों ने कई बार पहुंचाई मानसिक पीड़ा
जब उनसे पूछा गया कि वर्ष 2001 से शुरू हुई यात्रा में क्या कभी ऐसा समय आया, जब राजनीतिक परिस्थितियों, विरोध या अन्य व्यवधानों के कारण उनका मन विचलित हुआ हो, तो यह सवाल उनके लिए भावनात्मक हो गया।डॉ. सुधा मलैया ने कहा कि अनेक अवसर ऐसे आए जब राजनीतिक स्तर पर और अन्य लोगों की ओर से ऐसे प्रश्न खड़े किए गए, जिनसे उन्हें पीड़ा हुई।
अपनी बात कहते-कहते वे भावुक हो गईं और उनकी आंखों में आंसू दिखाई दिए। उन्होंने कहा कि उनके सामने केवल एक लक्ष्य था—कुछ नया करना।उन्होंने कहा कि ईश्वर ने उन्हें स्वस्थ मस्तिष्क और स्वस्थ शरीर दिया है और इसके लिए ईश्वर का धन्यवाद करते हुए उन्होंने विरोध करने वालों की बातों को अनदेखा कर अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना जारी रखा।डॉ. मलैया के अनुसार इस लंबी यात्रा में उतार-चढ़ाव लगातार आते रहे, लेकिन प्रत्येक कठिनाई के बाद आगे बढ़ने का प्रयास किया गया।
कभी विद्यार्थियों का इंतजार था, आज देशभर में सेवाएं दे रहे हैं विद्यार्थी
डॉ. सुधा मलैया ने संस्थान के शुरुआती दौर को याद करते हुए बताया कि जब नर्सिंग जैसे विषय प्रारंभ किए गए, तब विद्यार्थियों को संस्था से जोड़ना भी बड़ी चुनौती थी। उस समय पर्याप्त संख्या में विद्यार्थी मिलना आसान नहीं था।लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। विश्वविद्यालय से विभिन्न विषयों में शिक्षा प्राप्त करने वाले अनेक छात्र-छात्राएं शासकीय और अशासकीय संस्थानों में सेवाएं दे रहे हैं और अपने परिवारों का भरण-पोषण कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके भवन नहीं, बल्कि वहां से शिक्षा प्राप्त कर समाज और राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभाने वाले विद्यार्थी होते हैं।
कर्मचारियों के वेतन के लिए भी संघर्ष करना पड़ा
संस्थान के संघर्ष के दौर को याद करते हुए डॉ. मलैया ने बताया कि कई बार ऐसे कठिन अवसर भी आए जब कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी परेशानी का सामना करना पड़ा।उन्होंने कहा कि संस्थान केवल विद्यार्थियों से नहीं बनता, बल्कि उससे जुड़े प्रत्येक कर्मचारी और उनके परिवार की आजीविका भी उसकी जिम्मेदारी से जुड़ी होती है।
आज संस्थान में कार्यरत अनेक कर्मचारी अपने परिवारों का भरण-पोषण कर रहे हैं। इस बदलाव को याद करते हुए डॉ. मलैया ने संघर्ष के उस दौर को भावुक होकर याद किया और ईश्वर का धन्यवाद किया।
‘हम जननी हैं, अब इसे पालने की जिम्मेदारी अगली पीढ़ी की‘
संस्थान को स्थापित करने के बाद बीच के समय में स्वयं पर्याप्त समय नहीं दे पाने के सवाल पर डॉ. सुधा मलैया ने अपने मन की बात रखी।उन्होंने कहा कि संस्थान की स्थापना करने के कारण वे स्वयं को इसकी जननी मानती हैं, लेकिन अब इसे आगे बढ़ाने और पालने की जिम्मेदारी अगली पीढ़ी को सौंपना आवश्यक है।उन्होंने अपने बेटे सिद्धार्थ और बहू पूजा का उल्लेख करते हुए कहा कि अब संस्था को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अगली पीढ़ी को निभानी होगी।उनकी इस बात में संस्था के प्रति वर्षों के भावनात्मक लगाव के साथ भविष्य की जिम्मेदारी अगली पीढ़ी को सौंपने का भाव भी स्पष्ट दिखाई दिया।
शिक्षा के साथ ज्ञान, संस्कार और भारतीय संस्कृति उद्देश्य
डॉ. सुधा मलैया ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को डिग्री उपलब्ध कराना नहीं था। उनका संकल्प था कि विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ ज्ञान, संस्कार और भारतीय संस्कृति की जानकारी भी मिले।उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यक्ति को केवल रोजगार के योग्य न बनाए, बल्कि उसे समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार नागरिक भी बनाए। इसी सोच के साथ संस्था की शैक्षणिक गतिविधियों को आगे बढ़ाया गया।
अब 5 अक्टूबर सोमवार को होगा प्रथम दीक्षांत समारोह
एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह का प्रथम दीक्षांत समारोह 5 अक्टूबर 2026, सोमवार को विश्वविद्यालय परिसर में गरिमामय एवं भव्य वातावरण में आयोजित होने जा रहा है।यह विश्वविद्यालय के लिए ऐतिहासिक अवसर माना जा रहा है। प्रथम दीक्षांत समारोह में शोधार्थियों, स्नातकोत्तर एवं स्नातक विद्यार्थियों को उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए विधिवत उपाधियां और पदक प्रदान किए जाएंगे।
विदेश यात्रा के कारण वर्चुअली जुड़ेंगे केंद्रीय संस्कृति मंत्री
समारोह में भारत सरकार के संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत वर्चुअल माध्यम से शामिल होंगे। जानकारी के अनुसार वे कार्यक्रम में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होने वाले थे, लेकिन विदेश यात्रा के कारण अब वहीं से कार्यक्रम से जुड़कर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करेंगे।समारोह में मध्यप्रदेश शासन के उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार, दमोह विधायक एवं पूर्व वित्त मंत्री जयंत मलैया, मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी, आनंद विभाग मंत्री लखन पटेल, दमोह सांसद राहुल सिंह लोधी तथा मध्यप्रदेश निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के सभापति प्रोफेसर खेम सिंह डेहरिया की गरिमामयी उपस्थिति रहेगी।
विद्यार्थियों के परिश्रम और उपलब्धियों का होगा सम्मान
कुलाधिपति डॉ. सुधा मलैया ने कहा कि दीक्षांत समारोह विद्यार्थियों के शैक्षणिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। यह केवल उपाधि प्राप्त करने का अवसर नहीं, बल्कि वर्षों के अध्ययन, परिश्रम, अनुशासन, ज्ञान और उपलब्धियों के सम्मान का अवसर है।उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के साथ उनके सर्वांगीण विकास के लिए निरंतर प्रयासरत है। दीक्षांत समारोह विद्यार्थियों को अपने अर्जित ज्ञान और प्रतिभा का उपयोग समाज और राष्ट्र के विकास में करने की प्रेरणा देगा।
दो अति विशिष्ट प्रतिभाओं को मानद उपाधि
प्रथम दीक्षांत समारोह में दो अति विशिष्ट प्रतिभाओं को मानद उपाधि से अलंकृत किया जाएगा।इसके साथ ही उत्कृष्ट विद्यार्थियों को विभिन्न पुरस्कार एवं पदक प्रदान किए जाएंगे। विज्ञान के क्षेत्र में श्री विजय कुमार मलैया सर्वश्रेष्ठ पदक, कला के क्षेत्र में श्री जयंत कुमार मलैया सर्वश्रेष्ठ पदक, सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता के आधार पर डॉ. सुधा मलैया बहुमुखी उत्कृष्टता पुरस्कार तथा कुलाधिपति स्वर्ण पदक प्रदान किया जाएगा।इसके अलावा विभिन्न संकायों में अकादमिक उत्कृष्टता के आधार पर विद्यार्थियों को स्वर्ण एवं रजत पदक भी प्रदान किए जाएंगे।
भारतीय परंपरा में दिखाई देगी दीक्षांत समारोह की झलक
प्रथम दीक्षांत समारोह को भारतीय संस्कृति और परंपरा से जोड़ने का विशेष प्रयास किया गया है। दीक्षा प्राप्त करने वाले छात्र धोती-कुर्ता तथा छात्राएं साड़ी पहनकर समारोह में शामिल होंगी।डॉ. सुधा मलैया के अनुसार भारतीय संस्कृति, ज्ञान और संस्कार संस्था की मूल सोच का हिस्सा रहे हैं और दीक्षांत समारोह में भी इसकी झलक दिखाई देगी।
समारोह की तैयारियों को लेकर समितियां गठित
विश्वविद्यालय की प्रति कुलाधिपति श्रीमती पूजा मलैया ने बताया कि प्रथम दीक्षांत समारोह को सुव्यवस्थित एवं गरिमापूर्ण बनाने के लिए विभिन्न समितियों का गठन किया गया है।उन्होंने बताया कि विद्यार्थियों, अभिभावकों और अतिथियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जा रही हैं। समारोह की प्रत्येक व्यवस्था को लेकर विश्वविद्यालय परिवार द्वारा तैयारियां की जा रही हैं।वहीं प्रति कुलाधिपति श्रीमती रति मलैया ने कहा कि एकलव्य विश्वविद्यालय का प्रथम दीक्षांत समारोह विश्वविद्यालय की शैक्षणिक यात्रा में एक नए अध्याय का शुभारंभ होगा।
उन्होंने कहा कि यह अवसर केवल विश्वविद्यालय परिवार के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उन विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के लिए भी विशेष महत्व रखता है, जिन्होंने विद्यार्थियों की पूरी शैक्षणिक यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।उन्होंने संबंधित विद्यार्थियों एवं अभिभावकों से निर्धारित समय पर उपस्थित होकर इस ऐतिहासिक अवसर के साक्षी बनने की अपील की।
विद्यालय से विश्वविद्यालय तक—एक लंबे संकल्प की कहानी
एकलव्य विश्वविद्यालय की यात्रा को यदि पीछे मुड़कर देखा जाए तो इसकी शुरुआत किसी बड़े विश्वविद्यालय परिसर या विशाल संसाधनों से नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत एक ऐसे विचार से हुई, जो रेलगाड़ी से गुजरते समय पुराने भवनों को देखकर मन में आया था।वर्ष 2001 में ओजस्विनी विद्यालय की स्थापना से शुरू हुई यात्रा ने धीरे-धीरे महाविद्यालय का रूप लिया और आगे चलकर विश्वविद्यालय की स्थापना तक पहुंची।
इस दौरान आर्थिक कठिनाइयां आईं, उधारी का सहारा लेना पड़ा, संस्थान में उपलब्ध संसाधनों को पुनः संस्थान के विकास में लगाया गया, विद्यार्थियों की कमी का दौर आया, कर्मचारियों के वेतन की चिंता सामने आई और विरोध के कारण मानसिक पीड़ा भी झेलनी पड़ी। लेकिन संकल्प जारी रहा।आज उसी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव 5 अक्टूबर 2026, सोमवार को सामने आने जा रहा है, जब एकलव्य विश्वविद्यालय अपने प्रथम दीक्षांत समारोह का आयोजन करेगा।
डॉ. सुधा मलैया की आंखों में आए आंसू इस यात्रा के उन संघर्षों की कहानी कहते नजर आए, जिन्हें केवल उपलब्धियों और आंकड़ों में नहीं समेटा जा सकता। उनके लिए यह समारोह विद्यार्थियों के लिए उपाधि प्राप्त करने का अवसर होने के साथ-साथ उस लंबे संकल्प की एक महत्वपूर्ण परिणति भी है, जिसकी शुरुआत वर्षों पहले रेलगाड़ी की खिड़की से दिखाई देने वाले पुराने भवनों को देखकर हुई थी।
