छह न्यायालयों की जांच में गंभीर अनियमितताएं, बिना अधिकार आदेश और बिना सुनवाई प्रकरण निरस्त; जुर्माना वसूले बिना फाइलें बंद, सात अधिकारी-कर्मचारियों को नोटिस
लापरवाही या सुनियोजित खेल? भू-माफिया, राजनीतिक संरक्षण और किसी कथित ‘नटवरलाल‘ जैसे बिचौलिए की संभावित भूमिका पर भी सवाल; दमोह से भोपाल तक पुराने मामलों की चर्चाएं तेज
(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
दमोह, 10 अक्टूबर 2026, शनिवार। मध्य प्रदेश के दमोह जिले में राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आई गंभीर अनियमितताओं ने प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन राजस्व न्यायालयों में आम नागरिक अपनी जमीन, नामांतरण, सीमांकन और अन्य विवादों के निराकरण की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, उन्हीं न्यायालयों की जांच में ऐसी गड़बड़ियां सामने आई हैं, जिन्होंने पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला दिया है।
आज 10 अक्टूबर, शनिवार को कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने इस मामले में की गई बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की जानकारी दी। तहसील दमोह के सभी छह राजस्व न्यायालयों की जांच में गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद दमयंती नगर तहसीलदार रोबिन जैन और संबंधित रीडर को निलंबित किया गया है। वहीं एसडीएम दमोह को पद से हटाते हुए उनके विरुद्ध कार्रवाई का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। इसके अतिरिक्त सात अधिकारी-कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं।
इस कार्रवाई ने जहां राजस्व विभाग में हलचल पैदा कर दी है, वहीं अब पुराने चर्चित मामलों, स्थानांतरित अधिकारियों के विरुद्ध कथित शिकायतों और संभावित बाहरी हस्तक्षेप को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
जनसुनवाई में लगातार शिकायतें, कलेक्टर ने खुलवा दीं छह न्यायालयों की फाइलें
कलेक्टर प्रताप नारायण यादव के अनुसार, जनसुनवाई में लगातार राजस्व प्रकरणों के निराकरण में अनियमितताओं की शिकायतें प्राप्त हो रही थीं। इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए एसडीएम न्यायालय, तहसीलदार न्यायालय और राजस्व निरीक्षक कार्यालय की एक साथ जांच कराई गई।जांच की जिम्मेदारी अपर कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर और तहसीलदार स्तर के अधिकारियों को सौंपी गई थी। विस्तृत जांच रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई।जांच में सामने आए तथ्यों ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि राजस्व न्यायालयों में निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किस हद तक किया जा रहा था और जिन नागरिकों के प्रकरण प्रभावित हुए, उन्हें न्याय दिलाने के लिए अब क्या कदम उठाए जाएंगे।
बिना अधिकार आदेश पारित, पक्षकारों को सुने बिना प्रकरण निरस्त
जांच के दौरान अधिकारिता के बिना आदेश पारित करने, पक्षकारों को सुनवाई का पर्याप्त अवसर दिए बिना आवेदन निरस्त करने तथा प्रकरणों को मनमाने तरीके से नस्तीबद्ध करने जैसी अनियमितताएं सामने आई हैं।राजस्व न्यायालयों में पारित आदेश सीधे तौर पर नागरिकों के संपत्ति संबंधी अधिकारों और हितों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में बिना निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए आदेश पारित किए जाने की बात अत्यंत गंभीर है।अब सवाल यह है कि जिन अधिकारियों ने अपनी अधिकारिता से बाहर जाकर आदेश पारित किए, उन आदेशों की वैधानिक स्थिति क्या होगी? क्या ऐसे प्रकरणों की दोबारा समीक्षा होगी? जिन आवेदकों को सुनवाई का अवसर नहीं मिला, क्या उन्हें पुनः अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा?
जुर्माना लगाया, वसूली नहीं हुई और बंद कर दी गईं फाइलें
जांच में एक और गंभीर अनियमितता सामने आई है। कुछ प्रकरणों में जुर्माना आरोपित किए जाने के बावजूद उसकी राशि जमा कराए बिना ही प्रकरणों को दाखिल-दफ्तर अथवा नस्तीबद्ध कर दिया गया।कलेक्टर के अनुसार, इससे शासन को वित्तीय क्षति होने की आशंका है।ऐसे में प्रश्न उठता है कि जुर्माने की राशि जमा हुए बिना संबंधित प्रकरण किस आधार पर बंद किए गए? क्या यह केवल प्रक्रियागत त्रुटि थी अथवा किसी स्तर पर नियमों की जानबूझकर अनदेखी की गई? संभावित वित्तीय क्षति कितनी है और उसकी वसूली की जिम्मेदारी किसकी होगी?इन प्रश्नों का उत्तर संबंधित अभिलेखों की विस्तृत जांच से ही सामने आ सकेगा।
तहसीलदार रोबिन जैन निलंबित, एसडीएम सौरभ गंधर्व का प्रभार बदला
सागर संभागायुक्त द्वारा 9 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश के तहत दमयंती नगर तहसीलदार रोबिन जैन को मध्यप्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1965 के अंतर्गत निलंबित कर दिया गया है।निलंबन अवधि में उनका मुख्यालय कलेक्टर कार्यालय दमोह निर्धारित किया गया है। उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ते की पात्रता रहेगी।वहीं एसडीएम दमोह सौरभ गंधर्व को वर्तमान पद से हटाकर उप जिला निर्वाचन अधिकारी (सामान्य) एवं स्थानीय निर्वाचन का प्रभार सौंपा गया है। उनके विरुद्ध कार्रवाई का प्रस्ताव शासन को भेजे जाने की जानकारी भी दी गई है।
प्रभारी डिप्टी कलेक्टर संजय कुमार दुबे को एसडीएम एवं उपखंडीय मजिस्ट्रेट दमोह की जिम्मेदारी सौंपी गई है। नायब तहसीलदार रघुनंदन चतुर्वेदी को दमयंती नगर तहसीलदार का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।संबंधित रीडर के निलंबन के साथ सात अधिकारी-कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। उनके जवाब मिलने के बाद आगे की कार्रवाई निर्धारित की जाएगी।
अनियमितताएं महज लापरवाही या जानबूझकर की गईं?
राजस्व न्यायालयों की जांच में सामने आए तथ्यों के बाद अब यह महत्वपूर्ण प्रश्न भी है कि आखिर इतनी गंभीर अनियमितताएं कैसे हुईं?क्या ये मामले केवल अधिकारियों की लापरवाही और प्रक्रियागत त्रुटियों का परिणाम थे या कुछ प्रकरणों में जानबूझकर नियमों की अनदेखी की गई?यदि किसी प्रकरण में अधिकारिता के बिना आदेश पारित किया गया, तो उससे किस पक्ष को लाभ अथवा हानि हुई? जिन मामलों में जुर्माने की राशि जमा कराए बिना फाइलें बंद की गईं, उनमें संबंधित पक्षकारों की क्या भूमिका थी? क्या किसी विशेष व्यक्ति अथवा समूह से जुड़े प्रकरणों में इस प्रकार की अनियमितताएं बार-बार हुईं?इन सवालों के जवाब जांच रिपोर्ट और संबंधित अभिलेखों के परीक्षण से ही सामने आ सकते हैं।
क्या भू-माफिया, राजनीतिक संरक्षण या किसी कथित नटवरलाल जैसे बिचौलिए की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी?
राजस्व न्यायालयों में सामने आई अनियमितताओं के बाद संभावित बाहरी हस्तक्षेप का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया है।क्या जमीन के कारोबार से जुड़े किसी प्रभावशाली व्यक्ति अथवा भू-माफिया ने राजस्व प्रकरणों को प्रभावित करने का प्रयास किया? क्या किसी राजनीतिक व्यक्ति के दबाव या संरक्षण में किसी प्रकरण में नियमों की अनदेखी की गई? क्या किसी कथित नटवरलाल जैसे बिचौलिए ने अधिकारियों और पक्षकारों के बीच अनुचित भूमिका निभाई? या फिर सारी अनियमितताएं विभागीय स्तर पर ही हुईं?
ये जांच योग्य सवाल हैं। फिलहाल उपलब्ध जानकारी में किसी भू-माफिया, जनप्रतिनिधि, बिचौलिए अथवा अन्य बाहरी व्यक्ति की संलिप्तता का पुष्ट प्रमाण सामने नहीं आया है।लेकिन यदि जांच में किसी प्रकरण में अनुचित दबाव, सिफारिश, आर्थिक लेन-देन अथवा किसी व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के तथ्य मिलते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच आवश्यक होगी।
स्थानांतरित और चर्चित अधिकारियों की शिकायतों का क्या हुआ?
राजस्व न्यायालयों में हुई कार्रवाई के बाद पूर्व में दमोह में पदस्थ रहे कुछ स्थानांतरित और चर्चित अधिकारियों के विरुद्ध कथित शिकायतों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।सूत्रों के अनुसार, कुछ पूर्व पदस्थ अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतें प्राप्त होने की बात सामने आ रही है। हालांकि इन शिकायतों की प्रकृति, जांच की वर्तमान स्थिति और अब तक की गई कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि पूर्व में शिकायतें प्राप्त हुई थीं, तो क्या उनकी जांच पूरी हुई? यदि जांच रिपोर्ट तैयार हुई, तो उसके निष्कर्ष क्या रहे? क्या किसी अधिकारी की जिम्मेदारी निर्धारित की गई या शिकायतें निराधार पाई गईं?इन मामलों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होने से प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान हो सकता है।
दमोह से भोपाल तक कथित सक्रियता की चर्चा, पुराने मामलों को दबाने के दावों में कितनी सच्चाई?
इस बीच कुछ सूत्रों ने दावा किया है कि राजस्व प्रशासन से जुड़े पुराने प्रकरणों को लेकर दमोह से भोपाल तक सक्रियता बनी हुई है। कुछ मामलों को दबाने अथवा रफा-दफा कराने के कथित प्रयासों की बातें भी सामने आ रही हैं।इन चर्चाओं में एक महिला अधिकारी का नाम भी जोड़ा जा रहा है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। किसी अधिकारी द्वारा शिकायत दबाने अथवा जांच प्रभावित करने का प्रमाण उपलब्ध जानकारी में सामने नहीं आया है।सूत्रों का यह भी कहना है कि आने वाले दिनों में कुछ अन्य जानकारियां सामने आ सकती हैं। इन दावों की वास्तविकता संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक जांच के निष्कर्षों से ही स्पष्ट होगी।
गोपनीय सूत्रों और समाचार पत्रों में चर्चित पुराने प्रकरणों का क्या हुआ?
दमोह के राजस्व प्रशासन से जुड़े कुछ पुराने घटनाक्रम पूर्व में गोपनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारियों और समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के कारण चर्चा में रहे हैं।वर्तमान कार्रवाई के बाद उन पुराने प्रकरणों के अंतिम निराकरण को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।क्या पूर्व में प्रकाशित शिकायतों और आरोपों की जांच हुई थी? यदि जांच हुई, तो क्या संबंधित अधिकारियों का पक्ष लिया गया? क्या जांच में किसी प्रकार की अनियमितता प्रमाणित हुई या आरोप निराधार पाए गए?इन प्रश्नों के उत्तर सामने आना आवश्यक है, ताकि अपुष्ट चर्चाओं और वास्तविक प्रशासनिक तथ्यों के बीच अंतर स्पष्ट हो सके।
केवल आदेश देने वालों की नहीं, आदेशों से लाभ पाने वालों की भूमिका भी महत्वपूर्ण
राजस्व न्यायालयों में सामने आई अनियमितताओं की जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी हो सकता है कि संबंधित आदेशों से किन व्यक्तियों को लाभ अथवा हानि हुई।यदि किसी प्रकरण में नियमों के विपरीत आदेश पारित किया गया, तो क्या उससे किसी पक्षकार को अनुचित लाभ मिला? क्या किसी विशेष व्यक्ति के प्रकरण में निर्धारित प्रक्रिया से अलग व्यवहार किया गया? क्या ऐसे मामलों में किसी बाहरी व्यक्ति के हस्तक्षेप की शिकायत दर्ज हुई थी?
यदि जांच में इस प्रकार के तथ्य सामने आते हैं, तो केवल आदेश पारित करने वाले अधिकारी की जिम्मेदारी निर्धारित करना पर्याप्त नहीं होगा। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अन्य संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का परीक्षण भी आवश्यक हो सकता है।हालांकि जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
कलेक्टर का संदेश, आमजन को न्याय के लिए कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें
कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने स्पष्ट किया है कि आम नागरिकों को अपने प्रकरणों के निराकरण के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ने चाहिए।उन्होंने सभी अधिकारी-कर्मचारियों को निर्देश दिए कि प्रत्येक प्रकरण का निराकरण समय-सीमा में पारदर्शी और विधिसम्मत तरीके से सुनिश्चित किया जाए।कलेक्टर ने नर सेवा को नारायण सेवा मानकर कार्य करने तथा जनसेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की अपेक्षा की है।
अब कलेक्टर प्रताप नारायण यादव के अगले निर्णय पर निगाहें
दमोह में छह राजस्व न्यायालयों की जांच के बाद हुई कार्रवाई ने प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर अपेक्षाएं बढ़ा दी हैं।अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या जांच का अगला चरण उन प्रकरणों तक भी पहुंचेगा, जिनमें नागरिकों के अधिकार प्रभावित हुए हैं?क्या बिना अधिकार पारित आदेशों की समीक्षा होगी? क्या बिना सुनवाई निरस्त प्रकरणों में दोबारा सुनवाई का अवसर मिलेगा? क्या शासन को हुई संभावित वित्तीय क्षति की वसूली सुनिश्चित की जाएगी?
और सबसे बड़ा सवाल यह कि यदि जांच में जानबूझकर अनियमितता, बाहरी हस्तक्षेप, राजनीतिक दबाव अथवा किसी कथित बिचौलिए के माध्यम से अनुचित लाभ पहुंचाने के प्रमाण सामने आते हैं, तो क्या कार्रवाई का दायरा उन तक भी बढ़ेगा?फिलहाल कलेक्टर प्रताप नारायण यादव की कार्रवाई ने दमोह के राजस्व प्रशासन में हलचल पैदा कर दी है। अब देखना होगा कि यह कार्रवाई केवल अधिकारियों के निलंबन और प्रभार परिवर्तन तक सीमित रहती है या पुराने प्रकरणों की समीक्षा, जवाबदेही तय करने और प्रभावित नागरिकों को वास्तविक न्याय दिलाने की दिशा में भी आगे बढ़ती है।
