हर महीने औसतन 22 से अधिक रिश्वतखोरी के मामले, राजस्व से लेकर नगरीय प्रशासन तक कई विभाग जांच के दायरे में, सवाल—रिश्वत लेते पकड़े जाने के बाद भी व्यवस्था में क्यों नहीं आ रहा स्थायी सुधार?

(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
भोपाल, बुधवार 14 अक्टूबर 2026/ मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकायुक्त संगठन की लगातार कार्रवाई के बावजूद सरकारी कार्यालयों में रिश्वतखोरी की समस्या प्रशासनिक व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती बनी हुई है। आम नागरिकों के काम समय पर करने, शासकीय सेवाओं में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए शासन स्तर पर अनेक प्रयास किए जाते रहे हैं, लेकिन लोकायुक्त के सामने आने वाले रिश्वतखोरी के मामले यह सवाल खड़ा करते हैं कि आखिर सरकारी तंत्र में जवाबदेही की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
लोकायुक्त के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच प्रदेश में रिश्वत लेते पकड़े जाने के 91 ट्रैप प्रकरण दर्ज किए गए। अर्थात महज चार महीने के भीतर औसतन प्रत्येक महीने 22 से अधिक मामलों में कार्रवाई हुई। इन कार्रवाइयों की जद में राजस्व, नगरीय प्रशासन, वन, सहकारिता तथा महिला एवं बाल विकास सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी और कर्मचारी आए हैं।
यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि रिश्वतखोरी केवल आर्थिक अनियमितता का मामला नहीं है, बल्कि इससे शासन-प्रशासन के प्रति आम नागरिकों का विश्वास भी प्रभावित होता है। जब किसी व्यक्ति को अपने वैधानिक अधिकार, प्रमाणपत्र, स्वीकृति अथवा सरकारी सुविधा प्राप्त करने के लिए अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ता है, तब सवाल केवल संबंधित कर्मचारी की कार्यप्रणाली पर नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर उठता है जो समयबद्ध और पारदर्शी सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार है।
पांच वित्तीय अवधियों के आंकड़ों में उतार-चढ़ाव, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण का दावा कितना मजबूत?
लोकायुक्त के उपलब्ध आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले वर्षों में रिश्वतखोरी के ट्रैप प्रकरणों की संख्या में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है।वित्तीय वर्ष 2022-23 में प्रदेश में 238 ट्रैप प्रकरण दर्ज किए गए थे। इसके बाद 2023-24 में यह संख्या घटकर 162 रह गई। अगले वित्तीय वर्ष 2024-25 में फिर वृद्धि हुई और 215 मामले दर्ज हुए। वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 222 तक पहुंच गया।
अब वित्तीय वर्ष 2026-27 के शुरुआती चार महीनों, अर्थात अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच ही 91 ट्रैप प्रकरण सामने आ चुके हैंआंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023-24 में ट्रैप प्रकरणों में कमी अवश्य आई थी, लेकिन उसके बाद लगातार दो वित्तीय वर्षों में संख्या बढ़ी। इससे इतना स्पष्ट होता है कि दर्ज ट्रैप प्रकरणों में निरंतर गिरावट का रुझान नहीं दिखाई देता।हालांकि यह समझना भी जरूरी है कि ट्रैप कार्रवाई की संख्या बढ़ने का अर्थ अपने आप भ्रष्टाचार बढ़ना नहीं है। संभव है कि शिकायतों की संख्या बढ़ी हो, नागरिक अधिक जागरूक हुए हों अथवा लोकायुक्त की कार्रवाई अधिक सक्रिय हुई हो। इसी प्रकार ट्रैप मामलों में कमी आने को भी भ्रष्टाचार समाप्त होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
राजस्व से लेकर नगरीय प्रशासन तक, आम नागरिकों से जुड़े विभागों पर सवाल
लोकायुक्त की कार्रवाइयों में राजस्व, नगरीय प्रशासन, वन, सहकारिता और महिला एवं बाल विकास जैसे विभागों के अधिकारी-कर्मचारियों का सामने आना महत्वपूर्ण है। इन विभागों का सीधा संबंध नागरिकों की दैनिक आवश्यकताओं, सरकारी योजनाओं, अनुमति, प्रमाणपत्र और प्रशासनिक सेवाओं से होता है।राजस्व विभाग में नामांतरण, सीमांकन, बंटवारा और भूमि संबंधी अभिलेखों के कार्य नागरिकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। नगरीय प्रशासन में भवन निर्माण अनुमति, संपत्ति संबंधी दस्तावेज, स्थानीय निकायों की सेवाएं और विभिन्न स्वीकृतियां शामिल होती हैं।इसी प्रकार सहकारिता, वन तथा महिला एवं बाल विकास विभागों में भी अनेक ऐसी सेवाएं और प्रशासनिक प्रक्रियाएं हैं, जिनसे नागरिकों, हितग्राहियों और संस्थाओं का सीधा संपर्क होता है।ऐसे में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या विभागीय स्तर पर उन प्रक्रियाओं की पहचान की जा रही है, जिनमें अनावश्यक विलंब, अस्पष्ट नियम अथवा अधिकारियों के अत्यधिक विवेकाधिकार के कारण रिश्वत मांगने की गुंजाइश बनती है?यदि किसी कार्यालय में एक ही प्रकार की शिकायतें बार-बार सामने आती हैं, तो केवल संबंधित कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। उस कार्यालय की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक निगरानी की भी समीक्षा आवश्यक है।
रिश्वत लेते पकड़े जाने के बाद क्या होता है, विभागीय कार्रवाई की स्थिति भी सामने आए
लोकायुक्त द्वारा ट्रैप कार्रवाई किए जाने पर संबंधित लोकसेवक के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जा सकता है। ऐसी कार्रवाई से पहले शिकायत का परीक्षण और आवश्यक सत्यापन किया जाता है।लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी का ट्रैप कार्रवाई में पकड़ा जाना और न्यायालय द्वारा दोषी ठहराया जाना दो अलग-अलग कानूनी चरण हैं। अंतिम दोषसिद्धि साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करती है।यही कारण है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की वास्तविक प्रभावशीलता जानने के लिए केवल ट्रैप प्रकरणों की संख्या पर्याप्त नहीं है।यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि दर्ज प्रकरणों में कितने मामलों में अभियोजन की कार्रवाई आगे बढ़ी, कितनों में न्यायालय ने निर्णय सुनाया, कितने मामलों में दोषसिद्धि हुई और संबंधित विभागों ने अपने स्तर पर क्या अनुशासनात्मक कदम उठाए।इसके अतिरिक्त जिन कार्यालयों में रिश्वतखोरी के मामले सामने आए, वहां संबंधित नागरिक का लंबित कार्य निर्धारित समयसीमा में पूरा हुआ या नहीं, इसकी समीक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।
क्या रिश्वतखोरी की शिकायतों के पीछे सरकारी कामकाज में अनावश्यक देरी भी एक कारण है?
सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार की समस्या को समझने के लिए केवल रिश्वत लेने और देने की घटना तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि नागरिकों को सरकारी सेवाएं प्राप्त करने में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।कई प्रशासनिक प्रक्रियाओं में दस्तावेजों की जांच, अनुमोदन और विभिन्न स्तरों पर फाइलों के निराकरण की व्यवस्था होती है। यदि किसी प्रक्रिया की समयसीमा स्पष्ट नहीं है अथवा नागरिक को अपने आवेदन की स्थिति जानने की सुविधा नहीं मिलती, तो अनावश्यक निर्भरता और मनमानी की आशंका बढ़ सकती है।इसीलिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक कार्यालय में नागरिकों को स्पष्ट जानकारी मिले कि उनका कार्य कितने दिनों में पूरा होगा, किन दस्तावेजों की आवश्यकता है और आवेदन लंबित होने की स्थिति में शिकायत कहां की जा सकती है।यदि सरकारी सेवाओं को वास्तव में समयबद्ध, सरल और पारदर्शी बनाया जाए, तो रिश्वतखोरी की संभावनाओं को सीमित करने में सहायता मिल सकती है।
कार्रवाई के बाद भी वही व्यवस्था, तो सुधार कैसे होगा?
लोकायुक्त की कार्रवाई का उद्देश्य केवल रिश्वत लेने के आरोप में किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी को पकड़ना नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कानूनी जवाबदेही सुनिश्चित करना भी है।इसके साथ प्रशासनिक सुधार का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। यदि किसी कार्यालय में रिश्वत मांगने का मामला सामने आता है, तो विभागीय अधिकारियों को यह जांचना चाहिए कि संबंधित कार्य के निष्पादन में किस स्तर पर अनावश्यक बाधा उत्पन्न हुई।क्या आवेदन निर्धारित समयसीमा से अधिक समय तक लंबित था? क्या संबंधित कर्मचारी को निर्णय लेने का ऐसा अधिकार प्राप्त था, जिसकी पर्याप्त निगरानी नहीं हो रही थी? क्या शिकायत निवारण की व्यवस्था प्रभावी थी? क्या वरिष्ठ अधिकारियों को लंबित प्रकरणों की जानकारी मिल रही थी?इन प्रश्नों के उत्तर तलाशे बिना केवल एक कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई करने से व्यवस्था की मूल कमियां दूर होना सुनिश्चित नहीं होता।
डिजिटल व्यवस्था और समयबद्ध सेवाओं के बावजूद मानवीय हस्तक्षेप की समीक्षा जरूरी
मध्यप्रदेश में अनेक शासकीय सेवाओं को ऑनलाइन माध्यम से उपलब्ध कराने तथा नागरिकों के कार्य निर्धारित समयसीमा में पूरे करने के लिए व्यवस्थाएं विकसित की गई हैं। लोक सेवा गारंटी जैसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य भी नागरिकों को निर्धारित समय में सेवाएं उपलब्ध कराना है।इसके बावजूद जहां आवेदन के परीक्षण, स्थल निरीक्षण, अनुशंसा अथवा अंतिम स्वीकृति में मानवीय हस्तक्षेप आवश्यक होता है, वहां पारदर्शिता और निगरानी का विशेष महत्व बना रहता है।विशेषज्ञ दृष्टिकोण से देखें तो भ्रष्टाचार की संभावनाएं कम करने के लिए डिजिटल आवेदन व्यवस्था के साथ फाइल की स्थिति, निर्णय का कारण, निर्धारित समयसीमा और जिम्मेदार अधिकारी की जानकारी भी आवेदक को उपलब्ध कराई जानी चाहिए।केवल आवेदन ऑनलाइन कर देने से संपूर्ण प्रक्रिया पारदर्शी नहीं हो जाती। अंतिम निर्णय तक प्रत्येक चरण की जवाबदेही सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही पर भी उठते हैं प्रश्न
किसी सरकारी कार्यालय में रिश्वतखोरी का मामला सामने आने पर प्राथमिक कानूनी जिम्मेदारी संबंधित आरोपी की होती है। लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था की समीक्षा भी महत्वपूर्ण हो जाती है।यदि किसी विभाग में एक ही प्रकृति की शिकायतें लगातार सामने आती हैं, तो यह देखना आवश्यक है कि वरिष्ठ स्तर पर शिकायतों की समीक्षा कितनी नियमितता से की जा रही है।क्या लंबित प्रकरणों की समय-समय पर जांच होती है? क्या नागरिकों से प्राप्त शिकायतों पर निष्पक्ष सुनवाई की जाती है? क्या अनावश्यक देरी के कारणों की पहचान की जाती है?
इन व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाकर भ्रष्टाचार की संभावनाओं को शुरुआती स्तर पर ही कम किया जा सकता है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में नागरिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण
रिश्वतखोरी के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई के लिए नागरिकों की जागरूकता और शिकायत करने का साहस भी आवश्यक है। कई बार लोग अपना कार्य शीघ्र कराने अथवा संभावित परेशानी से बचने के लिए अनुचित मांगों के सामने असहाय महसूस कर सकते हैं।ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि सरकारी कार्यालयों में शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया सरल और सुरक्षित हो। शिकायतकर्ता को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी शिकायत का निष्पक्ष परीक्षण होगा और उसे अनावश्यक प्रताड़ना का सामना नहीं करना पड़ेगा।लोकायुक्त जैसी संस्थाओं की प्रभावशीलता के लिए शिकायतकर्ताओं का विश्वास अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि नागरिकों को शिकायत दर्ज कराने, साक्ष्य उपलब्ध कराने और कानूनी प्रक्रिया के संबंध में पर्याप्त जानकारी मिले, तो भ्रष्टाचार के मामलों को सामने लाने में सहायता मिल सकती है।साथ ही यह भी आवश्यक है कि प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष जांच हो और किसी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी न माना जाए।
चार महीने में 91 ट्रैप प्रकरण, अब इन सवालों के जवाब भी जरूरी
प्रदेश में अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच सामने आए 91 ट्रैप प्रकरणों के बाद प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े अनेक प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाते हैं।पहला सवाल यह है कि किन विभागों और सेवाओं से रिश्वत मांगने की शिकायतें सबसे अधिक प्राप्त हो रही हैं?दूसरा, क्या जिन कार्यालयों में लोकायुक्त ने कार्रवाई की, वहां की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए विशेष समीक्षा की गई?तीसरा, पिछले वर्षों में दर्ज ट्रैप प्रकरणों में कितने मामलों का न्यायिक निराकरण हुआ और कितनों में दोषसिद्धि हुई?चौथा, क्या संबंधित विभागों ने कार्रवाई के बाद लंबित आवेदनों, शिकायतों और नागरिक सेवाओं की स्थिति की समीक्षा की?पांचवां, क्या आम नागरिकों को यह जानकारी आसानी से उपलब्ध है कि उनके कार्य में अनावश्यक विलंब होने पर किस अधिकारी की जवाबदेही तय होगी?इन सवालों के उत्तर सार्वजनिक होने से भ्रष्टाचार के विरुद्ध की जा रही कार्रवाई का अधिक व्यापक और तथ्यपरक मूल्यांकन संभव होगा।
लोकायुक्त की कार्रवाई जरूरी, लेकिन भ्रष्टाचारमुक्त व्यवस्था के लिए प्रशासनिक सुधार भी अनिवार्य
मध्यप्रदेश में लोकायुक्त संगठन द्वारा की जा रही ट्रैप कार्रवाइयां भ्रष्टाचार के आरोपों पर कानूनी कार्रवाई का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। पिछले वित्तीय वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि रिश्वतखोरी से संबंधित शिकायतों पर कार्रवाई की आवश्यकता लगातार बनी हुई है।हालांकि भ्रष्टाचार की वास्तविक स्थिति का आकलन केवल पकड़े गए मामलों की संख्या से नहीं किया जा सकता। इसके लिए शिकायतों की कुल संख्या, विभागवार स्थिति, जांच, अभियोजन, दोषसिद्धि और प्रशासनिक सुधारों का समग्र अध्ययन आवश्यक है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी व्यवस्था में आम नागरिक को अपने वैधानिक कार्य के लिए किसी अनुचित मांग का सामना न करना पड़े। उसे निर्धारित समय में सेवा मिले, अनावश्यक देरी का कारण बताया जाए और शिकायत करने पर प्रभावी सुनवाई हो।
लोकायुक्त की कार्रवाई भ्रष्टाचार के विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन भ्रष्टाचार की संभावनाओं को कम करने की जिम्मेदारी संबंधित विभागों और शासन की प्रशासनिक व्यवस्था पर भी है।अब आवश्यकता इस बात की है कि ट्रैप कार्रवाइयों के आंकड़ों के साथ-साथ उन सुधारात्मक कदमों का विवरण भी सार्वजनिक किया जाए, जिनसे नागरिकों को सरकारी कार्यालयों में पारदर्शी, समयबद्ध और जवाबदेह सेवाएं मिल सकें।क्योंकि भ्रष्टाचार के विरुद्ध व्यवस्था की सफलता का वास्तविक पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़े गए, बल्कि यह भी होना चाहिए कि कितने नागरिकों को बिना रिश्वत दिए, बिना अनावश्यक परेशानी के उनका अधिकार और सरकारी सेवा समय पर प्राप्त हुई।
