ब्रह्मोस को भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना में शामिल किया जा चुका है। अब इसके नेक्स्ट जेनरेशन वर्जन ब्रह्मोस-एनजी पर काम चल रहा है। इसके अलावा, लंबी दूरी तक मार करने वाले स्ट्राइक वेरिएंट की अवधारणा पर भी काम किया जा रहा है।
भारत का रक्षा निर्यात सालाना 62.7 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 38,400 करोड़ रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है। इसमें ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की अहम हिस्सेदारी है।
डॉ. जोशी के मुताबिक, ब्रह्मोस की निर्यात सफलता की शुरुआत 2025 में इसके युद्ध में इस्तेमाल से पहले ही हो गई थी। वर्ष 2022 में भारत को इस मिसाइल के लिए पहला बड़ा निर्यात ऑर्डर मिला था। इस सौदे ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रक्षा उत्पादों की संभावनाओं को मजबूती दी।
फिलीपींस के साथ शुरुआती निर्यात समझौते के बाद इस साल दक्षिण-पूर्व एशिया के दो और देशों के साथ सौदे किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम को मिले ऑर्डर और डिलीवरी के साथ ब्रह्मोस का निर्यात 600 मिलियन डॉलर से अधिक होने का अनुमान है।
ब्रह्मोस की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कंपनी उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन का विस्तार कर रही है। डॉ. जोशी ने बताया कि हैदराबाद, नागपुर, पिलानी और लखनऊ स्थित उत्पादन इकाइयां तेजी से काम कर रही हैं।
कंपनी हर सिस्टम और सब-सिस्टम के लिए औद्योगिक साझेदारों की संख्या बढ़ाने की तैयारी में है। अभी जहां एक या दो प्रमुख साझेदारों पर निर्भरता रही है, वहीं इसे बढ़ाकर 45 सोर्स तक विकसित करने की योजना है। इससे उत्पादन में तेजी लाने के साथ गुणवत्ता और लागत के स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
ब्रह्मोस के नए संस्करणों में ब्रह्मोस-एनजी यानी नेक्स्ट जेनरेशन मिसाइल महत्वपूर्ण है। यह मौजूदा मिसाइल की तुलना में छोटी और हल्की होगी। इसका उद्देश्य लड़ाकू विमानों में इसे एकीकृत करना आसान बनाना और भारत की हवाई हमले की क्षमता को मजबूत करना है।
इस मिसाइल को भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रूस की एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया के सहयोग से विकसित किया जा रहा है।
डॉ. जोशी के अनुसार, ब्रह्मोस-एनजी का पहला प्रोटोटाइप 2027 या 2028 तक तैयार होने की उम्मीद है। इसमें अधिक स्वदेशी तकनीक और उन्नत सामग्री का इस्तेमाल करने की योजना है। इसके लिए व्यापक अनुसंधान एवं विकास की जरूरत होगी।
ब्रह्मोस एयरोस्पेस 1,500 किलोमीटर की रेंज वाले स्ट्राइक वेरिएंट पर भी काम कर रहा है। कंपनी के मुताबिक, मिसाइल ने जमीन, समुद्र और हवा से किए गए परीक्षणों में लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता दिखाई है। हालांकि, 1,500 किलोमीटर रेंज वाला वर्जन अभी अवधारणा के स्तर पर है।
ब्रह्मोस की खासियत इसकी सुपरसोनिक गति, सटीक निशाना लगाने की क्षमता और अलग-अलग प्लेटफॉर्म से लॉन्च किए जाने की सुविधा है। नए संस्करणों के विकास से भारतीय सेनाओं की परिचालन क्षमता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात की संभावनाओं को मजबूत करने का लक्ष्य है।
रक्षा मंत्रालय ने 6 अक्टूबर को भारतीय नौसेना के जहाजों के लिए ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर खरीदने के लिए ब्रह्मोस एयरोस्पेस के साथ अनुबंध किया। इस परियोजना में कम से कम 68 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) सहित विभिन्न भारतीय उद्योगों की भागीदारी भी रहेगी।
डॉ. जोशी के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर ने ब्रह्मोस की परिचालन क्षमता को प्रदर्शित किया है। कंपनी का जोर अब इस मिसाइल को अधिक स्वदेशी बनाने, उत्पादन बढ़ाने और नई पीढ़ी के संस्करणों को विकसित करने पर है।
