मैराथन फ्यूजन ने बताया कि उसने पिछले साल फ्यूजन रिएक्टर की मदद से सोना बनाने का प्रस्ताव पेश किया था। अब कंपनी का दावा है कि उसने फ्यूजन से पैदा होने वाले न्यूट्रॉनों का इस्तेमाल करके पारे को स्थायी सोने में बदलने की प्रक्रिया प्रदर्शित की है। यह दावा इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सोना बनाने की कोशिश लंबे समय से वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की दिलचस्पी का विषय रही है। हालांकि कंपनी के दावे और औद्योगिक स्तर पर बड़े पैमाने पर सोना उत्पादन की व्यावहारिक क्षमता के बीच अभी कई सवालों के जवाब मिलना बाकी है।
इससे पहले CERN के वैज्ञानिकों ने लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर की मदद से सीसे के परमाणुओं को सोने के परमाणुओं में बदलने की प्रक्रिया दर्ज की थी। यह उपलब्धि परमाणु विज्ञान के लिहाज से अहम थी लेकिन उससे तैयार सोने की मात्रा बेहद कम थी। मैराथन फ्यूजन अब अपनी तकनीक को इसी क्षेत्र में अगला कदम बता रही है। कंपनी ने अपने प्रयोग से जुड़े गामा किरणों के मापन का भी उल्लेख किया है। उसके अनुसार इन मापों से विकिरण प्रक्रिया के बाद पारा-197 और सोना-197 की मौजूदगी का संकेत मिला।
कंपनी की तकनीक न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन यानी परमाणु रूपांतरण के सिद्धांत पर आधारित है। सामान्य रासायनिक प्रतिक्रियाओं में परमाणु का नाभिक नहीं बदलता बल्कि परमाणुओं के बीच रासायनिक बंधों में बदलाव होता है। इसके उलट परमाणु रूपांतरण में नाभिक की संरचना बदलकर एक तत्व को दूसरे तत्व में बदला जा सकता है। मैराथन फ्यूजन की प्रस्तावित प्रक्रिया में ड्यूटेरियम और ट्रिटियम के फ्यूजन से पैदा होने वाले उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रॉनों का इस्तेमाल किया जाता है। ये न्यूट्रॉन पारा-198 के नाभिक के साथ प्रतिक्रिया करके पारा-197 बना सकते हैं। इसके बाद पारा-197 रेडियोधर्मी क्षय के जरिए सोने के स्थिर समस्थानिक गोल्ड-197 में बदल सकता है।
मैराथन फ्यूजन ने अपनी तकनीक के संभावित आर्थिक फायदे भी बताए हैं। कंपनी ने 2025 में प्रकाशित एक शोधपत्र में प्रस्ताव दिया था कि फ्यूजन रिएक्टर के कोर के आसपास मौजूद ब्लैंकेट में पारा रखा जा सकता है। कंपनी के अनुमान के मुताबिक एक गीगावाट तापीय ऊर्जा पैदा करने वाला संयंत्र सालाना करीब दो टन सोना तैयार कर सकता है। उसका तर्क है कि इससे बिजली बेचने के अलावा सोने की बिक्री के जरिए भी आमदनी हो सकती है। कंपनी का दावा है कि ऐसा करने से बिजली उत्पादन और फ्यूजन ईंधन ट्रिटियम तैयार करने की क्षमता प्रभावित नहीं होगी।
हालांकि सालाना दो टन सोना उत्पादन का आंकड़ा फिलहाल कंपनी का अनुमान है न कि किसी व्यावसायिक संयंत्र में हासिल किया गया प्रमाणित परिणाम। तकनीक की लागत ऊर्जा दक्षता सुरक्षा और बड़े स्तर पर उत्पादन की व्यवहार्यता जैसे पहलुओं की जांच भी जरूरी होगी। इसलिए पारे से सोना बनाने का दावा वैज्ञानिक दृष्टि से दिलचस्प जरूर है लेकिन इसे बड़े पैमाने पर सस्ता सोना बनाने की स्थापित तकनीक मानने से पहले स्वतंत्र पुष्टि और आगे के परीक्षण महत्वपूर्ण होंगे।
