इसके बाद परिवार के सामने बेहद कठिन समय था। एक तरफ नरेंद्र को खोने का दुख था तो दूसरी तरफ उनके अंगों से दूसरे लोगों की जान बचाने का अवसर था। पत्नी पूजा रजक और परिजनों ने अंगदान की सहमति दी। इसके बाद अस्पताल और प्रशासन ने प्रत्यारोपण की प्रक्रिया शुरू कर दी। ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. राजेश पटेल के मुताबिक एक किडनी मेट्रो प्राइम अस्पताल में ही मरीज को प्रत्यारोपित की जाएगी जबकि दूसरी किडनी जबलपुर मेडिकल कॉलेज भेजी गई। लिवर को अहमदाबाद के मरेन्गो सिम्स अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था की गई।
लिवर के प्रत्यारोपण के लिए अहमदाबाद से पांच सदस्यीय डॉक्टरों की टीम चार्टर्ड विमान से जबलपुर पहुंची थी। टीम में कार्डियक सर्जन डॉ. निकुंज व्यास और लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. विकास पटेल के साथ कार्डियक एनेस्थेटिस्ट डॉ. चिंता सेठ तथा दो स्टाफ नर्स शामिल थीं। शुरुआत में लिवर और हार्ट दोनों को अहमदाबाद ले जाने की तैयारी थी लेकिन जांच के दौरान हार्ट प्रत्यारोपण के अनुकूल नहीं पाया गया। इसके कारण हार्ट का प्रत्यारोपण नहीं हो सका और उसे नहीं ले जाया गया।
अंगों को सुरक्षित रखते हुए समय पर अस्पताल और एयरपोर्ट तक पहुंचाने के लिए प्रशासन ने दो ग्रीन कॉरिडोर बनाए। पहला ग्रीन कॉरिडोर मेट्रो प्राइम अस्पताल से अब्दुल हमीद चौक होते हुए डुमना एयरपोर्ट तक बनाया गया। दूसरा रास्ता अस्पताल से रानी दुर्गावती फ्लाईओवर होते हुए मेडिकल कॉलेज तक तैयार किया गया। एंबुलेंस के आगे पुलिस वाहन चल रहे थे और रास्ते को यातायात के लिए खाली कराया गया। चूंकि रात के समय जबलपुर एयरपोर्ट सामान्य रूप से बंद रहता है इसलिए प्रशासन ने विशेष अनुमति लेकर नाइट लैंडिंग और एयरपोर्ट संचालन की व्यवस्था कराई।
सुबह करीब चार बजे लिवर को विशेष मेडिकल सुरक्षा के साथ एंबुलेंस से एयरपोर्ट रवाना किया गया। चार्टर्ड विमान के जरिए इसे अहमदाबाद भेजा गया। इसके कुछ देर बाद सुबह करीब साढ़े चार बजे दूसरी एंबुलेंस से किडनी को मेडिकल कॉलेज पहुंचाया गया। इस दौरान अस्पताल परिसर में मोमबत्तियां जलाकर अंगदान के फैसले के प्रति श्रद्धांजलि भी दी गई। पत्नी पूजा और उनके दोनों बच्चे भावुक नजर आए।
इस दुखद घटना के बीच पूजा रजक ने दूसरे परिवारों से अंगदान के लिए आगे आने की अपील की। उन्होंने कहा कि जिन परिवारों के मरीज ब्रेनडेड घोषित होते हैं उन्हें अंगदान पर जरूर विचार करना चाहिए क्योंकि इससे दूसरे लोगों को जीवन मिल सकता है। नरेंद्र अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके परिवार के फैसले से कई जरूरतमंद मरीजों को नई उम्मीद मिली है।
