दमोह (मध्य प्रदेश)। सनातन धर्म में भगवत आराधना के विविध स्वरूप बताए गए हैं, जिनमें नवरात्रि का पर्व शक्ति उपासना का विशेष काल माना जाता है। हिंदू नववर्ष का शुभारंभ भी मां भगवती की आराधना से होता है, इसलिए चैत्र शुक्ल पक्ष से प्रारंभ होने वाली नवरात्रि का महत्व अत्यंत विशेष माना जाता है। इन नौ दिनों में श्रद्धालु व्रत, पूजन, अनुष्ठान, साधना और भक्ति के माध्यम से मां भगवती को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, दुर्गा सप्तशती पाठ, हवन और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है, वहीं घरों में भी श्रद्धालु विधि-विधान से मां दुर्गा की आराधना करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वर्ष में चार नवरात्रि आती हैं, जिनमें दो प्रत्यक्ष और दो गुप्त नवरात्रि होती हैं। चैत्र नवरात्रि का महत्व इसलिए भी विशेष माना जाता है क्योंकि यह नववर्ष का आरंभ होने के साथ-साथ बदलते मौसम का संकेत भी देती है। आयुर्वेद और पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इस समय उपवास, फलाहार और नीम के सेवन का विशेष महत्व बताया गया है। अन्न का त्याग कर सात्विक आहार ग्रहण करने से शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यही कारण है कि नवरात्रि को धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

देशभर में मां भगवती की आराधना अलग-अलग परंपराओं के अनुसार की जाती है, वहीं बुंदेलखंड क्षेत्र की अपनी विशिष्ट पहचान है। यहां देवालयों को स्थानीय भाषा में ‘दिवाले’ कहा जाता है, जहां नवरात्रि के प्रथम दिन जवारों की बोआई की जाती है। इन जवारों को बंद कमरे में बिना सूर्य के प्रकाश के रखा जाता है और नौ दिनों में यह हरे-भरे होकर मां भगवती की शक्ति का प्रतीक माने जाते हैं। नौवें दिन इन्हें भक्ति भाव के साथ जुलूस के रूप में सरोवरों या नदी में विसर्जित किया जाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
दमोह जिले के ग्रामीण अंचलों में इस वर्ष भी नवरात्रि के दौरान अनूठी आस्था देखने को मिली। जिले के एक ग्राम में पूर्व परंपराओं के अनुसार सैकड़ों युवक नंगे बदन तपती चिलचिलाती धूप में दंड भरते हुए मां भगवती की आराधना के लिए पहुंचे। श्रद्धालु लंबी दूरी तय करते हुए दंडवत प्रणाम करते आगे बढ़ते रहे। भक्ति और तपस्या का यह दृश्य लोगों को भाव-विभोर करता रहा। श्रद्धालु “जय माता दी” के जयकारे लगाते हुए मां के दरबार तक पहुंचे और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना की।
वहीं दमोह नगर में नवरात्रि के अंतिम दिन संध्या के समय जवारों का विसर्जन करने के लिए बड़ी संख्या में महिलाएं सिर पर खप्पर और घट लेकर सरोवरों की ओर निकलीं। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाएं भक्ति गीतों और जयकारों के साथ समूह में आगे बढ़ती रहीं। पूरे मार्ग में “जय माता दी” और “मां भगवती की जय” के उद्घोष से वातावरण भक्तिमय हो गया। कई स्थानों पर श्रद्धालुओं द्वारा पुष्प वर्षा कर जुलूस का स्वागत भी किया गया।
इस दौरान बुंदेलखंड की पारंपरिक भक्ति साधना के अनूठे स्वरूप भी देखने को मिले। कई भक्तों ने गले और गालों में मां भगवती के त्रिशूल का प्रतीक ‘बाना’ छेदने की परंपरा का निर्वहन किया। बिना किसी भय या दर्द के भाव के साथ श्रद्धालु इसे धारण कर भक्ति में लीन दिखाई दिए। इसके अलावा लोहे की गर्म जंजीर और गोले को मुंह से उठाना, कंटीली खड़ाऊ पहनकर चलना और लोहे की जंजीरों से अपने शरीर पर प्रहार करते हुए मां के प्रति समर्पण व्यक्त करना भी आकर्षण का केंद्र रहा। श्रद्धालुओं की यह कठिन साधना और अटूट आस्था देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग मार्गों पर एकत्रित रहे।
जवारों के विसर्जन के दौरान पारंपरिक ढोल-नगाड़ों और वाद्य यंत्रों की धुन पर भक्त झूमते हुए आगे बढ़ते रहे। युवक-युवतियां भक्ति गीतों पर नृत्य करते नजर आए, जबकि महिलाएं सिर पर जवारों के घट लेकर अनुशासित रूप से चलती रहीं। नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए जुलूस सरोवरों तक पहुंचा, जहां विधि-विधान से जवारों का विसर्जन किया गया।
देर रात्रि तक जवारों के विसर्जन का सिलसिला चलता रहा और पूरा दमोह नगर भक्ति के रंग में डूबा नजर आया। मंदिरों में आरती और भजन-कीर्तन का आयोजन जारी रहा। श्रद्धालुओं ने मां भगवती से सुख-समृद्धि, शांति और समृद्ध जीवन की कामना की।
नवरात्रि के इस आयोजन ने एक बार फिर बुंदेलखंड की लोक परंपराओं, कठिन साधना और मां भगवती के प्रति अटूट आस्था की झलक प्रस्तुत की। श्रद्धालुओं की भक्ति, समर्पण और उत्साह ने पूरे नगर को भक्तिमय बना दिया और नवरात्रि का पर्व श्रद्धा, साधना और सांस्कृतिक परंपरा के अद्भुत संगम के रूप में संपन्न हुआ।
