दमोह शहर की रहने वाली 75 वर्षीय मनोरमा असाटी ने मातृत्व, साहस और त्याग की ऐसी प्रेरणादायक मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा पूरे क्षेत्र में हो रही है। जिस उम्र में अधिकांश लोग स्वयं स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझते हैं, उस उम्र में मनोरमा असाटी ने अपनी बेटी की जिंदगी बचाने के लिए अपनी किडनी दान कर दी। सफल ट्रांसप्लांट के बाद मां और बेटी दोनों स्वस्थ हैं तथा सामान्य जीवन की ओर लौट रही हैं।
यह भावुक कर देने वाली कहानी सिर्फ एक चिकित्सा सफलता नहीं, बल्कि मां के असीम प्रेम और समर्पण की जीवंत मिसाल बन गई है। परिवार के कठिन संघर्ष, आर्थिक और मानसिक परेशानियों के बीच एक मां ने अपनी बेटी के जीवन के लिए जो साहस दिखाया, उसने हर किसी को भावुक कर दिया है।
जानकारी के अनुसार दमोह निवासी कंचन असाटी पिछले करीब एक दशक से गंभीर किडनी बीमारी से पीड़ित थीं। लगातार बिगड़ती सेहत के कारण उनकी दोनों किडनियां प्रभावित हो चुकी थीं और उन्हें नियमित डायलिसिस पर निर्भर रहना पड़ रहा था। सप्ताह में कई बार अस्पताल जाना, दवाइयों का लंबा खर्च और लगातार बढ़ती शारीरिक कमजोरी ने पूरे परिवार को चिंता में डाल रखा था।
परिजनों ने कंचन के इलाज के लिए कई शहरों के अस्पतालों के चक्कर लगाए। दिल्ली, हरियाणा, इंदौर और हैदराबाद तक विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह ली गई। लंबे इलाज और अनेक परीक्षणों के बाद डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि अब किडनी ट्रांसप्लांट ही कंचन को बचाने का अंतिम विकल्प है।
हालांकि ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त डोनर मिलना आसान नहीं था। परिवार लगातार प्रयास करता रहा, लेकिन परिस्थितियां अनुकूल नहीं बन पा रही थीं। ऐसे समय में मां मनोरमा असाटी ने अपनी बेटी को जीवनदान देने का फैसला लिया।
डॉक्टरों ने शुरुआत में उनकी उम्र को देखते हुए चिंता जाहिर की। 75 वर्ष की आयु में किडनी डोनेट करना सामान्य बात नहीं मानी जाती और इसमें कई प्रकार के चिकित्सकीय जोखिम भी होते हैं। इसके बावजूद मनोरमा असाटी अपने निर्णय पर अडिग रहीं। उन्होंने साफ कहा कि यदि उनकी किडनी से बेटी की जिंदगी बच सकती है तो वे हर जोखिम उठाने को तैयार हैं।
इसके बाद डॉक्टरों की टीम ने मां की विस्तृत मेडिकल जांच की। रिपोर्ट संतोषजनक आने पर ट्रांसप्लांट प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। सफल ऑपरेशन के बाद कंचन असाटी को नई जिंदगी मिली। डॉक्टरों की निगरानी में मां और बेटी दोनों तेजी से स्वस्थ हुईं और अब सामान्य दिनचर्या की ओर लौट रही हैं।
परिवार के लिए यह संघर्ष सिर्फ बीमारी तक सीमित नहीं था। वर्ष 2024 में कंचन असाटी के पति डॉ. अमित आनंद असाटी के निधन के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। पति के जाने के बाद कंचन की बीमारी और बच्चों की जिम्मेदारी ने स्थिति को और कठिन बना दिया। ऐसे समय में मनोरमा असाटी ने परिवार को संभालने के साथ-साथ अपनी बेटी के इलाज में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
परिजनों का कहना है कि मां ने कभी हिम्मत नहीं हारी। उम्र और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बावजूद उन्होंने बेटी को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया। परिवार के लोगों के अनुसार यह सिर्फ एक मां का फैसला नहीं था, बल्कि ममता की सबसे बड़ी ताकत का उदाहरण है।
इस प्रेरणादायक घटना की जानकारी सामने आने के बाद शहर और आसपास के क्षेत्र में लोग मनोरमा असाटी की सराहना कर रहे हैं। कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने उनके साहस को नमन करते हुए इसे समाज के लिए प्रेरणा बताया है।
यह घटना बताती है कि मां का प्रेम केवल भावनाओं तक सीमित नहीं होता, बल्कि जरूरत पड़ने पर वह अपने बच्चों के लिए जीवन का सबसे बड़ा त्याग भी कर सकती है। मनोरमा असाटी ने यह साबित कर दिया कि सच्ची ममता उम्र नहीं देखती, बल्कि अपने बच्चे की मुस्कान और जीवन को सबसे ऊपर रखती है।
