बिना अनुमति भवन ध्वस्त, मलबा खुर्द-बुर्द कर बनाई गई सीसी रोड; जांच में आर्थिक अनियमितता उजागर होने के बाद भी कार्रवाई अधूरी
दमोह। ग्राम पंचायत आमखेड़ा में नव-निर्मित आंगनबाड़ी भवन को बिना किसी शासकीय अनुमति के गिराए जाने का मामला अब केवल आरोपों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जांच में आर्थिक अनियमितता और शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के तथ्य भी सामने आ चुके हैं। इसके बावजूद आज तक संबंधित दोषियों के विरुद्ध पुलिस में एफआईआर दर्ज नहीं होना कई सवाल खड़े कर रहा है।
मामले की शिकायत करने वाले अधिवक्ता मृत्युंजय हजारी का कहना है कि जांच में यह स्पष्ट हो चुका है कि आंगनबाड़ी भवन को बिना सक्षम अनुमति के गिराया गया। इतना ही नहीं, भवन से निकले मलबे और निर्माण सामग्री का भी उचित रिकॉर्ड नहीं मिला। आरोप है कि भवन के अवशेषों को खुर्द-बुर्द कर उसी स्थान पर बाद में सीसी रोड का निर्माण करा दिया गया, जिससे मूल निर्माण के साक्ष्य भी लगभग समाप्त हो गए।

जांच में आर्थिक अनियमितता सिद्ध, वसूली के आदेश जारी
मामले की जांच के दौरान आर्थिक अनियमितता पाए जाने पर 1 लाख 78 हजार 376 रुपए की वसूली निकालने के आदेश भी दिए गए। प्रशासनिक स्तर पर वसूली की कार्रवाई होना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि सरकारी संपत्ति के मामले में अनियमितता और वित्तीय नुकसान की पुष्टि हुई है।
यदि किसी मामले में आर्थिक क्षति निर्धारित कर वसूली के आदेश जारी किए जाते हैं, तो यह स्वतः गंभीर प्रश्न खड़ा करता है कि जब अनियमितता स्वीकार कर ली गई है, तब संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ दंडात्मक और आपराधिक कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही?
तत्कालीन सचिव निलंबित, फिर भी आपराधिक कार्रवाई नहीं
जानकारी के अनुसार, मामले से जुड़े तत्कालीन सचिव को बाद में निलंबित भी किया गया था। जांच के समय वे दूसरी पंचायत में पदस्थ थे। वहीं तत्कालीन सरपंच की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई और वसूली आदेशों के बावजूद पुलिस में अपराध दर्ज नहीं कराया गया।
सबसे बड़ा सवाल: जब दोष सिद्ध हैं तो FIR क्यों नहीं?
शिकायतकर्ता का कहना है कि अब विवाद इस बात का नहीं है कि भवन गिराया गया या नहीं, क्योंकि जांच रिपोर्ट, वसूली आदेश और उपलब्ध रिकॉर्ड स्वयं इसकी पुष्टि कर रहे हैं। असली प्रश्न यह है कि—
- बिना अनुमति सरकारी भवन गिराने वालों पर आपराधिक मामला क्यों नहीं दर्ज किया गया?
- शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही कब तय होगी?
- जब आर्थिक अनियमितता सिद्ध हो चुकी है तो पुलिस कार्रवाई से परहेज क्यों?
- क्या केवल वसूली कर लेने से सरकारी संपत्ति को पहुंचाए गए नुकसान की भरपाई हो जाएगी?
- आखिर किसके संरक्षण में यह मामला वर्षों से लंबित पड़ा है?
न्यायिक जांच की मांग तेज
अधिवक्ता मृत्युंजय हजारी का कहना है कि यदि प्रशासन दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं कराता तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। उनका कहना है कि यह केवल एक भवन का मामला नहीं, बल्कि सरकारी धन और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है।
अब यह मामला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रहा है। क्योंकि एक ओर जांच में भवन गिराया जाना, आर्थिक अनियमितता और वसूली के तथ्य सामने आते हैं, वहीं दूसरी ओर दोषियों के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज न होना पूरे मामले को संदेह के घेरे में खड़ा कर रहा है। प्रशासन को अब स्पष्ट करना होगा कि जब तथ्य स्थापित हो चुके हैं, तो आखिर FIR दर्ज करने में बाधा क्या है?
