सीमांकन के नाम पर मांगी थी 5 हजार रुपये की रिश्वत, लोकायुक्त की ट्रैप कार्रवाई में हुआ था गिरफ्तार, विशेष न्यायालय ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला
दमोह। सरकारी सेवा का उद्देश्य आम नागरिकों को पारदर्शी और निष्पक्ष सेवाएं उपलब्ध कराना है, लेकिन जब कोई लोकसेवक अपने पद का दुरुपयोग कर रिश्वत की मांग करता है तो वह न केवल कानून का उल्लंघन करता है, बल्कि जनता के विश्वास को भी ठेस पहुंचाता है। ऐसे ही एक महत्वपूर्ण भ्रष्टाचार प्रकरण में आज 31 जुलाई (शुक्रवार) को विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), दमोह ने बहुचर्चित रिश्वत मामले में तत्कालीन राजस्व निरीक्षक मनीराम गौंड को दोषी करार देते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 के अंतर्गत चार वर्ष के सश्रम कारावास एवं 2,000 रुपये के अर्थदंड से दंडित किया।
न्यायालय का यह फैसला केवल एक आरोपी को सजा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी लोकसेवकों के लिए भी कड़ा संदेश है जो अपने पद का दुरुपयोग कर अवैध आर्थिक लाभ लेने का प्रयास करते हैं। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में यदि शिकायतकर्ता साहस दिखाए और साक्ष्य मजबूत हों तो कानून दोषियों तक अवश्य पहुंचता है।
अभियोजन के अनुसार घटना के समय मनीराम गौंड राजस्व निरीक्षक के पद पर पदस्थ था। फरियादी पंकज कुमार जैन का राजस्व संबंधी सीमांकन का कार्य लंबित था। आरोप है कि सीमांकन की कार्रवाई करने के बदले आरोपी ने फरियादी से 5 हजार रुपये की रिश्वत की मांग की।
फरियादी रिश्वत देकर अपना कार्य कराना नहीं चाहता था। उसने भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने का निर्णय लेते हुए 15 मार्च 2022 को लोकायुक्त संगठन, सागर में लिखित शिकायत प्रस्तुत की। शिकायत मिलने के बाद लोकायुक्त पुलिस ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार शिकायत का सत्यापन कराया। सत्यापन में रिश्वत मांगने की पुष्टि होने पर विधिवत ट्रैप कार्रवाई की योजना बनाई गई।
इसके बाद 21 मार्च 2022 को लोकायुक्त संगठन, सागर की टीम ने स्वतंत्र पंच साक्षियों की उपस्थिति में ट्रैप कार्रवाई की। कार्रवाई के दौरान आरोपी के निर्देशानुसार रखी गई रिश्वत की राशि बरामद की गई। पूरी कार्रवाई वैज्ञानिक परीक्षण, दस्तावेजी साक्ष्यों और पंचनामा की प्रक्रिया के साथ संपन्न हुई। जांच के दौरान एकत्रित मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों ने भी अभियोजन के मामले की पुष्टि की।
विवेचना पूरी होने के बाद न्यायालय में अभियोग पत्र प्रस्तुत किया गया। विचारण के दौरान अभियोजन पक्ष ने स्वतंत्र पंच साक्षियों के बयान, वैज्ञानिक परीक्षण की रिपोर्ट, दस्तावेजी साक्ष्य तथा अन्य महत्वपूर्ण प्रमाण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए। सभी तथ्यों और साक्ष्यों का गहन परीक्षण करने के बाद न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में सफल रहा।
इसी आधार पर आज 31 जुलाई (शुक्रवार) को विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), दमोह ने आरोपी मनीराम गौंड को दोषसिद्ध ठहराते हुए चार वर्ष के सश्रम कारावास तथा 2,000 रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई।
प्रकरण में शासन की ओर से प्रभारी उपनिदेशक अभियोजन धर्मेन्द्र सिंह तारन के निर्देशन में सहायक जिला अभियोजन अधिकारी संजय कुमार रावत ने प्रभावी पैरवी की, जबकि सहायक ग्रेड-3 विनय नामदेव ने अभियोजन कार्य में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया।
यह फैसला समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है कि यदि कोई शासकीय अधिकारी किसी वैध कार्य के बदले रिश्वत की मांग करता है, तो नागरिकों को रिश्वत देने के बजाय कानून का सहारा लेना चाहिए। लोकायुक्त, सतर्कता एजेंसियां और न्यायालय ऐसे मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई करने के लिए सक्षम हैं। आम नागरिकों की जागरूकता और शिकायत दर्ज कराने का साहस ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध सबसे बड़ा हथियार है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ आए ऐसे फैसले न केवल दोषियों को दंडित करते हैं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के शासन को भी मजबूत करते हैं। दमोह की विशेष न्यायालय का यह निर्णय स्पष्ट संकेत देता है कि सरकारी पद का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों के लिए कानून में किसी प्रकार की रियायत नहीं है और भ्रष्टाचार करने वालों को देर-सवेर न्यायालय के कठघरे में जवाब देना ही पड़ता है।
