इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कंप्यूटर सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के अनुसार, ब्रिक्स देशों के साथ बढ़ता व्यापार यह संकेत देता है कि डिजिटल और तकनीकी सहयोग को कारोबारी अवसरों में बदलने की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। यदि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यापार सुगमता से जुड़े प्रस्ताव प्रभावी तरीके से लागू किए जाते हैं, तो भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यातकों को इसका सीधा लाभ मिल सकता है।
ब्रिक्स देशों में संयुक्त अरब अमीरात और चीन भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों के सबसे बड़े आयातक बने हुए हैं। दोनों देशों की संयुक्त हिस्सेदारी ब्रिक्स देशों को भारत के कुल इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में 88.50 प्रतिशत रही। इससे इन दोनों बाजारों की भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबार में महत्वपूर्ण भूमिका का पता चलता है।
उत्पादों की श्रेणी में दूरसंचार उपकरण भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात का सबसे बड़ा सेगमेंट रहा। ब्रिक्स देशों को होने वाले कुल इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में दूरसंचार उपकरणों की हिस्सेदारी 74.60 प्रतिशत रही। इससे इस क्षेत्र में भारत और ब्रिक्स बाजारों के बीच व्यापार की प्रमुख दिशा भी सामने आती है।
ब्रिक्स देशों का भारत के कुल वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में लगभग 19.61 प्रतिशत योगदान है। उद्योग के अनुसार, सदस्य देशों के बीच गहरा सहयोग नेटवर्क उपकरणों, डिवाइस सर्टिफिकेशन और साझा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को संचालित करने वाले सॉफ्टवेयर की मांग बढ़ा सकता है।
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान डिजिटल सहयोग और व्यापार से जुड़े कई प्रस्तावों को एजेंडे में शामिल किया गया है। उद्योग का मानना है कि इन प्रस्तावों का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सदस्य देश उन्हें कितनी तेजी और गंभीरता से लागू करते हैं।
ब्रिक्स डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर रिपॉजिटरी पर चर्चा और पिछले महीने पुणे में भारत तथा ब्राजील के बीच हुआ सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी समझौता इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताए गए हैं। इस समझौते में 5जी, 6जी, ओपन रैन और उपग्रह कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर जोर दिया गया है। ये क्षेत्र भविष्य में ब्रिक्स के डिजिटल सहयोग का आधार बन सकते हैं।
प्रस्तावित ब्रिक्स ग्लोबल वैल्यू चेन एक्शन प्लान 2026-2030 और एमएसएमई सहयोग पोर्टल को भी भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन पहलों से खासतौर पर छोटे और मध्यम उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़ने और नए बाजारों तक पहुंच बनाने का अवसर मिल सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए प्रस्तावित ब्रिक्स इनवॉइस डिस्काउंटिंग तंत्र भी महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य एमएसएमई के सामने आने वाली व्यापार वित्तपोषण संबंधी चुनौतियों को कम करना है। उद्योग जगत के मुताबिक, सऊदी अरब, रूस, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे बाजारों में विस्तार की योजना बना रहे भारतीय निर्यातकों के लिए यह व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।
