वर्ष 2013-14 में भारत की अधिकतम बिजली मांग 135.9 गीगावाट थी। यह मांग 21 मई 2026 को बढ़कर 270.8 गीगावाट के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। सरकार के मुताबिक, बिजली मांग में यह वृद्धि देश में बढ़ती आर्थिक गतिविधियों, शहरीकरण, उद्योगों के विस्तार और घरों में बिजली के लगातार बढ़ते उपयोग से जुड़ी है।
बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए देश की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। मार्च 2014 में भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 249 गीगावाट थी। जुलाई 2026 तक यह बढ़कर 552 गीगावाट हो गई। इस दौरान जोड़ी गई क्षमता ने मौजूदा बिजली जरूरतों को पूरा करने के साथ भविष्य की मांग के लिए बिजली व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दिया है।
उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ बिजली के पारेषण ढांचे का भी विस्तार किया गया। अप्रैल 2014 में देश के ट्रांसमिशन नेटवर्क की लंबाई 2,91,336 सर्किट किलोमीटर थी। जुलाई 2026 तक यह बढ़कर 5,10,594 सर्किट किलोमीटर हो गई। नेटवर्क के विस्तार से राष्ट्रीय ग्रिड को अधिक एकीकृत बनाने और अलग-अलग क्षेत्रों के बीच बिजली के प्रवाह को सुगम करने में मदद मिली है। इससे बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता बढ़ाने में भी योगदान मिला है।
भारत ने पारंपरिक बिजली ढांचे के विस्तार के साथ स्वच्छ ऊर्जा क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया है। अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी की रिन्यूएबल एनर्जी स्टैटिस्टिक्स 2026 रिपोर्ट के अनुसार, स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में भारत चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है।
31 मार्च 2026 तक भारत की कुल गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित बिजली क्षमता 283.46 गीगावाट थी। इसमें 274.68 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा और 8.78 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता शामिल थी। वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने 55.3 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता जोड़ी। यह अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक इजाफा बताया गया है और पिछले वित्त वर्ष की तुलना में लगभग दोगुना है।
ऊर्जा क्षेत्र में भारत ने जलवायु लक्ष्यों के संदर्भ में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। जून 2025 में देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इस तरह भारत ने पेरिस समझौते के तहत वर्ष 2030 के लिए निर्धारित इस लक्ष्य को तय समय सीमा से पांच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया।
