नई दिल्ली । अपना घर खरीदना अधिकांश लोगों के लिए जीवन का बड़ा आर्थिक फैसला होता है। इसके लिए खरीदार अपनी बचत लगाने के साथ होम लोन का सहारा भी लेते हैं। लेकिन अगर बिल्डर तय समय पर फ्लैट का कब्जा नहीं देता, तो घर मिलने का इंतजार आर्थिक परेशानी में बदल सकता है। ऐसी स्थिति में खरीदार को एक तरफ किराये के मकान में रहना पड़ सकता है, वहीं दूसरी ओर बैंक की किस्तें और अन्य खर्च भी जारी रहते हैं। फ्लैट का सौदा रद्द करने की स्थिति में भी सभी खर्चों की रकम वापस मिलना जरूरी नहीं है।
फ्लैट का कब्जा मिलने में देरी का सबसे बड़ा असर होम लोन लेने वाले खरीदारों पर पड़ सकता है। बैंक और खरीदार के बीच ऋण का समझौता बिल्डर के साथ हुए बिक्री समझौते से अलग होता है। इसलिए बिल्डर की ओर से कब्जा देने में देरी होने मात्र से बैंक को किस्त चुकाने की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। खरीदार को निर्धारित शर्तों के अनुसार ईएमआई का भुगतान करना पड़ सकता है।
अगर खरीदार बिना किसी उचित समाधान के किस्तें चुकाना बंद कर देता है, तो इसका असर उसके क्रेडिट स्कोर पर पड़ सकता है। इसके अलावा, बैंक बकाया रकम की वसूली के लिए कार्रवाई भी कर सकता है। ऐसे में फ्लैट मिलने में देरी के बावजूद ऋण भुगतान को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है।
फ्लैट खरीदने के दौरान केवल उसकी कीमत ही खर्च नहीं होती। खरीदार को परिस्थितियों के अनुसार वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी, स्टांप ड्यूटी और पंजीकरण शुल्क भी देना पड़ सकता है। इनमें से कुछ रकम सरकारी विभागों को जमा की जाती है। इसलिए बिल्डर से फ्लैट की कीमत वापस मिलने पर इन सभी शुल्कों की वापसी अपने आप नहीं होती। खरीदार को संबंधित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार रिफंड के लिए अलग से कदम उठाने पड़ सकते हैं।
फ्लैट का सौदा रद्द कराने पर बिक्री समझौते की शर्तें भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। कुछ मामलों में बिल्डर समझौते में दर्ज प्रावधानों के आधार पर प्रशासनिक या रद्दीकरण शुल्क काटने का दावा कर सकता है। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले खरीदार को समझौते की शर्तों और लागू नियमों को ध्यान से समझना चाहिए।
होम लोन की प्रक्रिया के दौरान भी कई तरह के खर्च होते हैं। बैंक ऋण स्वीकृत करने के लिए प्रोसेसिंग फीस, कानूनी जांच और अन्य सेवाओं का शुल्क ले सकता है। इसके अतिरिक्त, यदि खरीदार ने बीमा कराया है, तो उसका प्रीमियम भी कुल खर्च में शामिल हो सकता है। फ्लैट का सौदा रद्द होने पर इन रकमों की वापसी सुनिश्चित नहीं होती। खरीदार को संबंधित बैंक, बीमा कंपनी और अन्य सेवा प्रदाताओं की शर्तों के अनुसार स्थिति स्पष्ट करनी पड़ सकती है।
ऐसी परिस्थितियों में रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम यानी RERA खरीदारों को कुछ महत्वपूर्ण अधिकार देता है। इसकी धारा 18 के तहत, निर्धारित शर्तें पूरी होने पर कब्जा देने में देरी के मामले में खरीदार बिल्डर से ब्याज सहित रकम वापसी और लागू प्रावधानों के अनुसार मुआवजे की मांग कर सकता है। ब्याज की गणना संबंधित नियमों और परिस्थितियों के आधार पर की जाती है।
हालांकि, ब्याज या रिफंड मिलने का अर्थ यह नहीं है कि खरीदार के सभी आर्थिक नुकसान स्वतः पूरे हो जाएंगे। प्री-ईएमआई ब्याज, ऋण की प्रोसेसिंग फीस, बीमा प्रीमियम और दूसरे खर्चों की भरपाई के लिए अलग से दावा करना पड़ सकता है। संबंधित प्राधिकरण या उपभोक्ता अदालत के आदेश और मामले के तथ्यों के आधार पर ही तय होगा कि किन खर्चों की भरपाई मिल सकती है।
इसलिए फ्लैट खरीदने से पहले कब्जा देने की समयसीमा, भुगतान की शर्तें, देरी पर ब्याज और समझौता रद्द करने के नियमों की जांच करना महत्वपूर्ण है। यदि बिल्डर समय पर कब्जा नहीं देता, तो खरीदार को सभी भुगतान रसीदें, बैंक दस्तावेज और समझौते सुरक्षित रखने चाहिए। जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाह लेकर उचित मंच पर शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
