देश-विदेश से पहुंचे ओशो के अनुयायी और साधक, मां आरती राजदान ने युवाओं के लिए ध्यान को बताया महत्वपूर्ण; 27 अक्टूबर तक चलेगा चार दिवसीय आयोजन
(डॉ.एल.एन.वैष्णव )
दमोह, 24 अक्टूबर 2026। मध्यप्रदेश के दमोह जिला मुख्यालय पर शनिवार दोपहर एक निजी होटल में ओशो महोत्सव 2026 का पारंपरिक रूप से शुभारंभ हुआ। 24 से 27 अक्टूबर तक आयोजित होने वाले इस चार दिवसीय महोत्सव में देश के विभिन्न राज्यों के साथ विदेशों से भी ओशो के अनुयायी, साधक और ध्यान में रुचि रखने वाले लोग शामिल होने पहुंचे हैं। दमोह में यह महोत्सव दूसरी बार आयोजित किया जा रहा है। पिछले आयोजन की सफलता के बाद इस वर्ष भी आयोजकों और साधकों में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है।
महोत्सव के शुभारंभ से पूर्व आयोजन के संयोजक और साधकों ने स्थानीय पत्रकारों से संवाद कर कार्यक्रम के उद्देश्यों, ओशो के दर्शन, ध्यान की विभिन्न पद्धतियों और वर्तमान जीवन में उनकी उपयोगिता के संबंध में विस्तार से जानकारी दी। इस दौरान पत्रकारों ने ध्यान की प्रक्रिया, ओशो की ध्यान विधियों की विशेषताओं, युवाओं की मानसिक उलझनों और आधुनिक जीवन में आध्यात्मिक चिंतन की आवश्यकता से जुड़े प्रश्न पूछे। साधकों ने इन प्रश्नों के उत्तर देते हुए अपने विचार रखे।आयोजन में सामने आया प्रमुख विचार यह रहा कि ध्यान केवल किसी एक स्थान पर बैठकर आंखें बंद करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि स्वयं को समझने, अपने विचारों के प्रति सजग होने और जीवन की परिस्थितियों को जागरूकता के साथ देखने का माध्यम भी है। ओशो के दर्शन में इसी सजगता को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
ओशो का दर्शन : भविष्य की चिंता से निकलकर वर्तमान को समझने का संदेश
ओशो के विचारों और जीवन दर्शन का एक महत्वपूर्ण पक्ष वर्तमान क्षण के प्रति जागरूक रहना है। मनुष्य का अधिकांश समय बीती हुई घटनाओं की स्मृतियों अथवा भविष्य की आशंकाओं में गुजर जाता है। इस प्रक्रिया में वह अपने वर्तमान अनुभवों, संबंधों और जीवन की वास्तविक परिस्थितियों को समझने से दूर हो सकता है। ओशो का चिंतन व्यक्ति को अपने भीतर चल रही विचारों और भावनाओं की गतिविधियों को देखने तथा जीवन के प्रति अधिक सजग दृष्टिकोण विकसित करने की प्रेरणा देता है।
ओशो ने ध्यान को केवल धार्मिक कर्मकांड या किसी विशेष परंपरा तक सीमित रखने के बजाय व्यक्ति की आंतरिक जागरूकता से जोड़कर प्रस्तुत किया। उनके दर्शन में ध्यान का अर्थ स्वयं को जानना, अपने मन की गतिविधियों को समझना और बिना अनावश्यक प्रतिक्रिया के अपने अनुभवों के प्रति सजग होना भी है।ओशो की ध्यान पद्धतियों में सक्रियता और शांति, शारीरिक गतिविधि और मौन, भावनाओं की अभिव्यक्ति और साक्षीभाव जैसे पहलुओं को स्थान दिया गया है। उनकी कुछ ध्यान विधियां आधुनिक मनुष्य की व्यस्त जीवनशैली को ध्यान में रखकर विकसित की गई हैं। इनका उद्देश्य व्यक्ति को अपने भीतर की बेचैनी को पहचानने और धीरे-धीरे अधिक सजगता के साथ जीवन जीने का अवसर प्रदान करना है।ओशो का दर्शन व्यक्ति को स्वयं प्रश्न करने, रूढ़ धारणाओं को समझने और जीवन को प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर देखने के लिए प्रेरित करता है। यही कारण है कि उनके विचारों और ध्यान पद्धतियों को लेकर आज भी विभिन्न देशों में अनुयायियों और साधकों के बीच रुचि बनी हुई है।
ध्यान की विभिन्न पद्धतियां सही, लेकिन ओशो की विधियों में आधुनिक जीवन पर विशेष जोर
पत्रकारों के संवाद के दौरान जब साधकों से पूछा गया कि संसार में ध्यान की अनेक पद्धतियां प्रचलित हैं, तो ओशो की ध्यान विधियों में क्या अंतर और विशेषता है, इस पर साधकों ने स्पष्ट किया कि ध्यान की विभिन्न पद्धतियों का अपना महत्व है। उनके अनुसार, ओशो ने वर्तमान समय के मनुष्य की मानसिक स्थिति, जीवनशैली और बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ध्यान की ऐसी विधियों पर जोर दिया, जिनमें सक्रियता के साथ आंतरिक मौन और सजगता को भी महत्व दिया गया है।
साधकों ने बताया कि ओशो की कुछ ध्यान विधियों में श्वास, शरीर की गतिविधियों, भावनाओं की अभिव्यक्ति और अंत में शांत होकर स्वयं को देखने की प्रक्रिया शामिल होती है। उनका उद्देश्य मनुष्य को अपनी मानसिक उलझनों से परिचित कराना और स्वयं के प्रति जागरूक होने का अवसर देना है।आज के दौर में कामकाज का दबाव, सामाजिक अपेक्षाएं, प्रतिस्पर्धा और भविष्य की चिंता अनेक लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे वातावरण में ध्यान को आत्मनिरीक्षण और मानसिक संतुलन की दिशा में उपयोगी अभ्यास के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है, लेकिन ध्यान के माध्यम से अपने विचारों और प्रतिक्रियाओं को समझने का प्रयास किया जा सकता है।
मां आरती राजदान ने कहा, ध्यान हमें जीवन जीने की कला सिखाता है
पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए महिला साधिका मां आरती राजदान ने ध्यान की आवश्यकता और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में इसकी प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि ध्यान हमें जीवन जीने की कला सिखाता है। उनके अनुसार, वर्तमान समय में युवाओं को ध्यान की आवश्यकता विशेष रूप से महसूस की जा रही है, क्योंकि अनेक युवा भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं और कई बार मानसिक असमंजस की स्थिति में पहुंच जाते हैं।
मां आरती राजदान ने युवाओं से जुड़े समकालीन मुद्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब व्यक्ति लगातार भविष्य की चिंता में डूबा रहता है, तो उसका ध्यान वर्तमान से हटने लगता है। जबकि जीवन का वास्तविक अनुभव वर्तमान में ही संभव है। उनके विचारों में यह संदेश प्रमुख रहा कि युवाओं को स्वयं को समझने, अपनी क्षमताओं को पहचानने और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की दिशा में ध्यान से जुड़ना चाहिए।
उन्होंने ध्यान के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए इस बात पर जोर दिया कि व्यक्ति को बाहरी परिस्थितियों के साथ-साथ अपने भीतर की स्थिति को समझना भी आवश्यक है। उनके अनुसार, जागरूकता व्यक्ति को अपने विचारों और भावनाओं को बेहतर ढंग से पहचानने में सहायता कर सकती है। आयोजन के माध्यम से युवाओं तक ध्यान का संदेश पहुंचाने और उन्हें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करने के प्रयासों की जानकारी भी दी गई।
ध्वनि, संगीत और ध्यान के माध्यम से आंतरिक शांति पर चर्चा
महोत्सव के दौरान ध्वनि के उपयोग, नकारात्मक विचारों से दूरी बनाने और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने के विषय पर भी जानकारी साझा की गई। साधकों ने बताया कि ध्यान की कुछ प्रक्रियाओं में ध्वनि, संगीत और श्वास पर एकाग्रता का सहारा लेकर मन को शांत करने तथा व्यक्ति को अपने अनुभवों के प्रति जागरूक बनाने का प्रयास किया जाता है।
इस संदर्भ में यह विचार भी सामने आया कि सकारात्मकता का अर्थ जीवन की कठिनाइयों को नकारना नहीं, बल्कि परिस्थितियों को समझते हुए संतुलित दृष्टिकोण विकसित करना है। ध्यान और आत्मनिरीक्षण के माध्यम से व्यक्ति अपने व्यवहार, प्रतिक्रियाओं और सोच के तरीकों पर विचार कर सकता है। आयोजन में इस बात पर जोर दिया गया कि बाहरी उपलब्धियों के साथ आंतरिक संतुलन और स्वयं को समझने का प्रयास भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दमोह में दूसरी बार आयोजन, देश-विदेश के साधकों की सहभागिता
दमोह में ओशो महोत्सव का यह दूसरा आयोजन है। पिछले कार्यक्रम की सफलता से उत्साहित आयोजक इस बार भी महोत्सव को व्यापक स्वरूप देने के लिए प्रयासरत हैं। देश के विभिन्न प्रदेशों और विदेशों से अनुयायियों के पहुंचने से आयोजन में विविध क्षेत्रों के साधकों की सहभागिता देखने को मिल रही है।चार दिवसीय महोत्सव के माध्यम से ओशो के विचारों, ध्यान की विभिन्न विधियों और जीवन दर्शन से संबंधित विषयों पर संवाद का अवसर उपलब्ध कराया जा रहा है। आयोजन के संबंध में पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर देते हुए साधकों ने इसके उद्देश्यों और ध्यान को आम जनमानस तक पहुंचाने की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।इस अवसर पर आयोजन को सफल बनाने के लिए प्रयासरत स्वामी चंदू चंद्र प्रकाश राय के प्रति साधकों ने आभार व्यक्त किया। आयोजकों और साधकों ने महोत्सव के माध्यम से लोगों को ध्यान, आत्मनिरीक्षण और जागरूक जीवन के महत्व से परिचित कराने की अपेक्षा व्यक्त की।
जीवन की भागदौड़ में स्वयं को समझने का अवसर है ध्यान
ओशो महोत्सव 2026 का मूल संदेश जीवन के प्रति सजगता, वर्तमान क्षण की समझ और स्वयं को जानने के महत्व से जुड़ा दिखाई देता है। आज जब व्यक्ति अनेक सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत अपेक्षाओं के बीच जीवन व्यतीत कर रहा है, तब अपने विचारों और भावनाओं को समझने के लिए समय निकालना भी आवश्यक है।ओशो के दर्शन में ध्यान को स्वयं को देखने और जीवन को अधिक जागरूकता के साथ जीने के अभ्यास के रूप में समझा जा सकता है। यह दृष्टिकोण व्यक्ति को केवल भविष्य की चिंता में उलझे रहने के बजाय वर्तमान परिस्थितियों को समझने, अपने व्यवहार पर विचार करने और जीवन के प्रति संतुलित दृष्टि विकसित करने की प्रेरणा देता है।दमोह में आयोजित यह महोत्सव इसी विचार को संवाद और साधना के माध्यम से सामने रखने का प्रयास है। 27 अक्टूबर तक चलने वाले इस आयोजन में ओशो के विचारों और ध्यान पद्धतियों को लेकर साधकों के बीच विचार-विमर्श जारी रहेगा।
