इंदौर न्यायालय का फैसला, धोखाधड़ी और कूटरचना सहित विभिन्न धाराओं में सुनाई सजा, 2 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया
इंदौर। न्यायालय में जमानत से संबंधित शासकीय दस्तावेजों में हेरफेर करने के मामले में इंदौर की अदालत ने आरोपी हाकम सिंह को दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्रीमती नमिता द्विवेदी ने 24 अक्टूबर 2026 को प्रकरण में निर्णय पारित करते हुए भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोपी को दंडित किया। न्यायालय ने आरोपी पर कुल 2,000 रुपये का अर्थदंड भी लगाया है।
उपनिदेशक अभियोजन आशीष कुमार खरे के अनुसार, थाना एमजी रोड इंदौर के अपराध क्रमांक 568/2005 तथा प्रकरण क्रमांक 7001375/2005 में यह निर्णय सुनाया गया। आरोपी हाकम सिंह, उम्र 45 वर्ष, निवासी सांवेर, जिला इंदौर को भारतीय दंड संहिता की धारा 467, 468 और 471 के तहत तीन-तीन वर्ष के सश्रम कारावास तथा धारा 420 के तहत दो वर्ष के सश्रम कारावास से दंडित किया गया। अभियोजन की ओर से सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी श्रीमती आरती रजौरिया ने पैरवी की।
जमानत के दस्तावेज में बदलाव से सामने आया मामला
अभियोजन के अनुसार, मामला वर्ष 2005 में सामने आया था। उस समय न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के न्यायालय से थाना एमजी रोड पुलिस को एक पत्र प्राप्त हुआ था, जिसमें जमानत से संबंधित दस्तावेजों में कथित हेरफेर के संबंध में अपराध दर्ज कर कार्रवाई करने के लिए कहा गया था।शिकायत के अनुसार, 9 अगस्त 2004 को फौजदारी प्रकरण क्रमांक 590/04 में आरोपी लवली उर्फ दुर्गा की जमानत हाकम सिंह ने दी थी। न्यायालय ने जमानत स्वीकार कर ली थी और इस संबंध में जमानत बुक क्रमांक 80471 पर प्रविष्टि की गई थी।
इसके बाद एक अन्य फौजदारी प्रकरण क्रमांक 720/04 में राजेन्द्र सिंह की जमानत प्रस्तुत की गई। न्यायालय में जमानत संबंधी बुक का अवलोकन किए जाने पर पूर्व प्रकरण से संबंधित दस्तावेज में बदलाव किए जाने की बात सामने आई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि पूर्व में दी गई जमानत के कागज को फाड़कर उसकी जगह नए कागज लगाए गए थे।
न्यायालय के शिकायती आवेदन पर दर्ज हुआ था मामला
तत्कालीन पीठासीन अधिकारी विजय सिंह कावछा के शिकायती आवेदन के आधार पर थाना एमजी रोड इंदौर में अपराध क्रमांक 568/2005 दर्ज किया गया। प्रारंभ में भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत मामला पंजीबद्ध किया गया था।प्रकरण की विवेचना प्रधान आरक्षक सेवाराम ने की। जांच के दौरान साक्षियों के कथन दर्ज किए गए और आरोपी को गिरफ्तार किया गया। विवेचना पूरी होने के बाद आरोपी के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420, 467 और 468 के तहत अभियोग पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। विचारण के दौरान प्रकरण में धारा 471 के तहत भी दोषसिद्धि हुई।
अभियोजन की पैरवी के बाद सुनाया गया फैसला
अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत प्रकरण पर विचार करने के बाद अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्रीमती नमिता द्विवेदी ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए विभिन्न धाराओं में सजा सुनाई। न्यायालय ने धारा 467, 468 और 471 के तहत तीन-तीन वर्ष तथा धारा 420 के तहत दो वर्ष के सश्रम कारावास और कुल 2,000 रुपये के अर्थदंड से दंडित किया।
इस प्रकरण में अभियोजन की ओर से सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी श्रीमती आरती रजौरिया ने पैरवी की। मामला न्यायालयीन दस्तावेजों की प्रामाणिकता और न्यायिक प्रक्रिया में प्रस्तुत अभिलेखों की विश्वसनीयता से जुड़ा रहा।
