भाजपा के 2023 के संकल्प पत्र से लेकर 2028 के विधानसभा चुनाव तक जुड़ रहे तार, 10 अक्टूबर की कैबिनेट पर निगाहें

(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
भोपाल/नई दिल्ली/मध्यप्रदेश की राजनीति में इस समय एक ऐसा सवाल तेजी से चर्चा में है, जिसका सीधा संबंध प्रदेश के करोड़ों गरीब एवं पात्र हितग्राहियों की थाली से है। सवाल यह है कि क्या मध्यप्रदेश में गरीब परिवारों को हर महीने मिलने वाले मुफ्त गेहूं और चावल के साथ अब दो किलो दाल भी उपलब्ध कराई जाएगी?सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस मुद्दे को लेकर भाजपा के संगठनात्मक स्तर पर गंभीर मंथन चल रहा है। हालांकि अभी तक सरकार की ओर से इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन जिस तरह खाद्य सुरक्षा योजनाओं को लेकर पार्टी और सरकार के स्तर पर समीक्षा की चर्चा सामने आ रही है, उसने इस संभावित फैसले को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है।
सवाल सिर्फ दाल का नहीं, भाजपा के पुराने संकल्प का भी है
इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी भाजपा का मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2023 का संकल्प पत्र है। चुनाव के दौरान भाजपा ने गरीब परिवारों को गेहूं और चावल के साथ दाल उपलब्ध कराने का वादा किया था।अब सवाल उठता है कि यदि यह घोषणा चुनाव के समय संकल्प पत्र में शामिल थी, तो लगभग तीन वर्ष बाद तक इसका पूर्ण क्रियान्वयन क्यों नहीं हुआ?और यदि अब इस पर विचार हो रहा है, तो क्या यह उस पुराने संकल्प को जमीन पर उतारने की तैयारी है?यही वह बिंदु है, जहां से इस पूरे मामले की राजनीतिक अहमियत बढ़ जाती है।
गुजरात और उत्तरप्रदेश में व्यवस्था, मध्यप्रदेश में इंतजार क्यों?
सूत्रों के अनुसार भाजपा शासित कुछ राज्यों में गरीब परिवारों को गेहूं और चावल के साथ दाल अथवा दाल से संबंधित अतिरिक्त खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने की व्यवस्था लागू है। छत्तीसगढ़ में भी गेहूं-चावल के साथ चना दाल दिए जाने की व्यवस्था का उल्लेख सामने आता रहा है।ऐसे में मध्यप्रदेश को लेकर सवाल स्वाभाविक है कि यदि अन्य राज्यों में गरीब परिवारों की खाद्य टोकरी को व्यापक बनाया जा सकता है तो मध्यप्रदेश में ऐसा निर्णय कब होगा?
डेढ़ करोड़ परिवारों की थाली से जुड़ा मामला
मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में परिवार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना से जुड़े हुए हैं। पात्र हितग्राहियों को निर्धारित नियमों के अनुसार प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता है, जबकि अंत्योदय श्रेणी के परिवारों के लिए अलग प्रावधान हैं।यही वजह है कि यदि सरकार गेहूं और चावल के साथ दो किलो दाल देने का निर्णय करती है तो इसका दायरा छोटा नहीं होगा। इसका सीधा असर प्रदेश के करोड़ों हितग्राहियों पर पड़ सकता है।
सूत्रों के दावे ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल
सूत्रों का कहना है कि भाजपा के राष्ट्रीय स्तर पर मध्यप्रदेश सहित उन राज्यों की योजनाओं की समीक्षा की जा रही है, जहां आगामी वर्षों में विधानसभा चुनाव होने हैं।इसी क्रम में मध्यप्रदेश के खाद्य सुरक्षा मॉडल, हितग्राहियों की संख्या, वित्तीय भार और दाल वितरण की संभावनाओं पर भी रिपोर्ट और आंकड़ों के आधार पर विचार किए जाने की चर्चा है।सूत्रों के अनुसार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन नबीन तथा मध्यप्रदेश के संगठन प्रभारी की भूमिका इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकती है।हालांकि इस संबंध में भाजपा या मध्यप्रदेश सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
क्या 10 अक्टूबर को खुलेगा राज?
अब सबसे बड़ा सवाल आगामी कैबिनेट बैठक को लेकर है।सूत्रों के मुताबिक 10 अक्टूबर 2026 की कैबिनेट बैठक पर विशेष नजर रखी जा रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि सरकार दाल वितरण को लेकर कोई निर्णय लेती है तो यह गरीब परिवारों के लिए बड़ा फैसला होगा।लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है—10 अक्टूबर को दाल वितरण की घोषणा होगी, इसकी अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।इसलिए फिलहाल इसे संभावित निर्णय के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
चुनाव से पहले गरीबों की थाली में बड़ा बदलाव?
मध्यप्रदेश में वर्ष 2028 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इसके अगले वर्ष 2029 में लोकसभा चुनाव होंगे। ऐसे में गरीब एवं निम्न आय वर्ग से जुड़े खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों का राजनीतिक महत्व अपने आप बढ़ जाता है।प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना पहले ही देश की सबसे बड़ी जनकल्याणकारी योजनाओं में शामिल है। यदि गेहूं और चावल के साथ दाल को भी नियमित खाद्य वितरण व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाता है, तो इसका राजनीतिक संदेश भी व्यापक हो सकता है।यहां एक और सवाल खड़ा होता है—क्या सरकार इसे केवल खाद्य सुरक्षा के फैसले के रूप में देखेगी या भाजपा के 2023 के संकल्प पत्र को पूरा करने की दिशा में उठाए गए कदम के रूप में?
केंद्र और मध्यप्रदेश के बीच समन्वय की भी होगी परीक्षा
इस संभावित फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू आर्थिक भी है। करोड़ों हितग्राहियों को नियमित रूप से दाल उपलब्ध कराने के लिए खरीद, भंडारण, परिवहन, वितरण और वित्तीय व्यवस्था का बड़ा ढांचा तैयार करना होगा।ऐसे में केंद्र सरकार और मध्यप्रदेश सरकार के बीच समन्वय महत्वपूर्ण होगा।केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो सकती हैं, लेकिन इस संबंध में भी किसी निर्णय या हस्तक्षेप की आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।
खोजी रिपोर्ट का सबसे बड़ा सवाल
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या मध्यप्रदेश सरकार 2023 के अपने चुनावी संकल्प को अब गरीबों की थाली तक पहुंचाने जा रही है?क्या गेहूं और चावल के साथ दो किलो दाल देने का फैसला वास्तव में सरकार के एजेंडे में है?क्या 10 अक्टूबर की कैबिनेट बैठक इस संभावित फैसले पर मुहर लगाएगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या करोड़ों गरीब परिवारों के लिए दाल का यह फैसला केवल खाद्य सुरक्षा का विस्तार होगा या वर्ष 2028 और 2029 के चुनावों से पहले भाजपा की बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी बनेगा?इन सवालों के जवाब अब सरकार के आधिकारिक निर्णय से ही सामने आएंगे।फिलहाल सूत्रों की जानकारी के आधार पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश में गरीब परिवारों की थाली में गेहूं-चावल के साथ दाल जोड़ने की चर्चा ने राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर हलचल पैदा कर दी है।
