पोषण माह के नाम पर होटल में कार्यशाला और व्यंजन प्रदर्शन ने खड़े किए कई सवाल; आखिर कुपोषण प्रभावित बस्तियों और गांवों तक क्यों नहीं पहुंचा आयोजन?

सरकारी योजनाओं और पोषण अभियान के बीच खर्च, स्थान चयन तथा वास्तविक लाभार्थियों की भागीदारी पर उठे सवाल; क्या कलेक्टर प्रताप नारायण यादव कराएंगे कार्यक्रम के उद्देश्य, व्यय और परिणामों की समीक्षा?
(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
दमोह,कुपोषण के खिलाफ लड़ाई केवल पौष्टिक व्यंजनों की प्रदर्शनी लगाने, कार्यशालाओं में भाषण देने और कार्यक्रम के बाद उपलब्धियों से भरी विज्ञप्ति जारी करने तक सीमित रहनी चाहिए या इसका वास्तविक लाभ उन बच्चों, गर्भवती महिलाओं और जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचना चाहिए, जिनके लिए शासन करोड़ों रुपये की योजनाएं संचालित कर रहा है? यह सवाल मध्यप्रदेश के दमोह जिला मुख्यालय पर आयोजित पोषण कार्यशाला एवं व्यंजन प्रदर्शन कार्यक्रम के बाद चर्चा का विषय बन गया है।
महिला एवं बाल विकास विभाग तथा अंतरा फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में पोषण माह के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में पौष्टिक व्यंजनों की आकर्षक प्रदर्शनी लगाई गई। जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, पोषण विशेषज्ञों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने इसमें भाग लिया। स्थानीय खाद्य सामग्री से तैयार विभिन्न व्यंजनों का प्रदर्शन हुआ, पोषण संबंधी जानकारी दी गई और प्रतियोगिता के विजेताओं को सम्मानित भी किया गया।कार्यक्रम के उद्देश्य और गतिविधियां निश्चित रूप से पोषण जागरूकता से जुड़ी थीं, लेकिन जिला मुख्यालय के एक बड़े होटल में कार्यक्रम आयोजित किए जाने को लेकर अब इसकी प्राथमिकताओं, खर्च और वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंच पर सवाल उठ रहे हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिस अभियान का उद्देश्य कुपोषित बच्चों और पोषण संबंधी जोखिम वाले परिवारों को जागरूक करना है, उसका आयोजन ऐसे स्थान पर क्यों किया गया, जहां आम ग्रामीण परिवारों और जरूरतमंद महिलाओं की सहज भागीदारी सीमित हो सकती है?क्या यही कार्यक्रम किसी कुपोषण प्रभावित गांव, आदिवासी बहुल क्षेत्र, आंगनवाड़ी केंद्र, सामुदायिक भवन अथवा सार्वजनिक परिसर में आयोजित नहीं किया जा सकता था?
होटल में सजे पौष्टिक व्यंजन, लेकिन जरूरतमंद बच्चों की भागीदारी कितनी?
कार्यक्रम के दौरान मोरिंगा के पराठे, महुआ के लड्डू, पौष्टिक चाट, मूंग दाल के चीले, सहजन की कचौड़ी, सोयाबीन के अप्पे, बफौरी तथा आंगनवाड़ी पोषाहार से तैयार केक और इडली सहित अनेक व्यंजन प्रदर्शित किए गए।इन व्यंजनों का उद्देश्य यह संदेश देना था कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध अनाज, दालों, सब्जियों और अन्य खाद्य सामग्रियों से कम खर्च में पौष्टिक भोजन तैयार किया जा सकता है।
लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है।
जिन बच्चों को पर्याप्त पोषण की आवश्यकता है, क्या उनके अभिभावक इस आयोजन में शामिल हुए? क्या कुपोषण प्रभावित परिवारों को इन व्यंजनों को तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण मिला? क्या कार्यक्रम के बाद इन विधियों को गांव-गांव पहुंचाने की कोई ठोस कार्ययोजना बनाई गई?आयोजन संबंधी विभागीय जानकारी में विभिन्न परियोजनाओं की आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों और विशेषज्ञों की भागीदारी का उल्लेख है, लेकिन कुपोषण प्रभावित बच्चों के अभिभावकों की संख्या तथा प्रत्यक्ष लाभार्थियों का स्पष्ट विवरण सामने नहीं आया है।ऐसे में विभाग से यह जानकारी सार्वजनिक किए जाने की अपेक्षा स्वाभाविक है कि कार्यक्रम से वास्तव में कितने जरूरतमंद परिवार लाभान्वित हुए।
जब गांवों में जागरूकता पहुंचाना उद्देश्य, तो होटल का चयन क्यों?
दमोह जिले में ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य एवं पोषण सेवाएं पहुंचाना महिला एवं बाल विकास विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।कुपोषण से निपटने के लिए केवल खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। परिवारों को संतुलित भोजन, स्वच्छता, स्तनपान, बच्चों के पूरक आहार, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण तथा समय पर उपचार के संबंध में जागरूक करना भी आवश्यक है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पोषण कार्यशाला का आयोजन किसी ऐसे ग्रामीण क्षेत्र में करना अधिक उपयोगी नहीं होता, जहां पोषण संबंधी जागरूकता और सेवाओं की विशेष आवश्यकता है?यदि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देना प्राथमिक उद्देश्य था, तो क्या शासकीय प्रशिक्षण भवन, सामुदायिक सभागार या अन्य सार्वजनिक परिसर उपलब्ध नहीं थे?
और यदि होटल में आयोजन करने के पीछे कोई विशेष प्रशासनिक, तकनीकी या व्यवस्थागत आवश्यकता थी, तो विभाग को उसका स्पष्ट विवरण सार्वजनिक करने में क्या कठिनाई है?यहां यह भी समझना आवश्यक है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण और व्यंजन प्रदर्शन अपने आप में अनुपयोगी गतिविधियां नहीं हैं। प्रशिक्षित कार्यकर्ता गांवों में पोषण संबंधी व्यवहार सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन प्रशिक्षण की सार्थकता का आकलन उसके बाद समुदाय में हुए वास्तविक बदलाव से होना चाहिए।
कितना खर्च हुआ और किस मद से हुआ भुगतान?
इस आयोजन को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सवाल आर्थिक पारदर्शिता का भी है ? कार्यक्रम में जिले की विभिन्न परियोजनाओं से आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पहुंचीं। अतिथियों की उपस्थिति रही, प्रदर्शनी लगाई गई और अन्य व्यवस्थाएं की गईं।ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि आयोजन पर कुल कितनी राशि खर्च हुई और उसका भुगतान किस संस्था अथवा मद से किया गया ?
क्या होटल परिसर का किराया दिया गया? यदि दिया गया तो कितना? भोजन, जलपान, सजावट, आवागमन और अन्य व्यवस्थाओं पर कितनी राशि व्यय हुई?क्या आयोजन का खर्च महिला एवं बाल विकास विभाग ने वहन किया, अंतरा फाउंडेशन ने किया अथवा दोनों संस्थाओं के बीच व्यय का विभाजन हुआ?
इन प्रश्नों का उत्तर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कार्यक्रम की वास्तविक लागत और भुगतान संबंधी दस्तावेज अभी उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए किसी निश्चित राशि के दुरुपयोग अथवा अनियमितता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
लेकिन सार्वजनिक उद्देश्य से आयोजित कार्यक्रम में यदि शासकीय धन खर्च हुआ है, तो उसका मदवार विवरण सामने आना चाहिए।यह भी जांचने योग्य है कि यदि समान प्रशिक्षण कम खर्च में किसी शासकीय भवन में आयोजित किया जाता, तो क्या बची हुई राशि का उपयोग अतिरिक्त सामुदायिक गतिविधियों के लिए किया जा सकता था।
सरकारी प्रयासों के बावजूद कुपोषण की चुनौती, परिणामों का मूल्यांकन कब?
भारत सरकार और मध्यप्रदेश सरकार द्वारा बच्चों, गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं तथा किशोरियों के पोषण स्तर में सुधार के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं।आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से पूरक पोषण आहार, वृद्धि निगरानी, स्वास्थ्य संबंधी परामर्श और पोषण जागरूकता जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है।इन योजनाओं का उद्देश्य केवल कार्यक्रम आयोजित करना नहीं, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण स्तर में वास्तविक सुधार लाना है।
इसीलिए दमोह जिले में कुपोषण की वर्तमान स्थिति का अद्यतन और सत्यापित विवरण सामने आना भी जरूरी है।जिले में इस समय कितने बच्चे गंभीर तीव्र कुपोषण और मध्यम तीव्र कुपोषण की श्रेणी में दर्ज हैं? पिछले एक वर्ष में कितने बच्चों की पोषण स्थिति में सुधार हुआ? कितने बच्चों को उपचार और विशेष पोषण सहायता की आवश्यकता है?
यदि विभाग पोषण जागरूकता के लिए कार्यशालाएं आयोजित कर रहा है, तो उनके परिणामों की निगरानी भी उतनी ही आवश्यक है।सवाल कार्यक्रम आयोजित करने का विरोध नहीं, बल्कि कार्यक्रम की उपयोगिता, प्राथमिकता और जवाबदेही का है।
मंच से पोषण का संदेश, अब धरातल पर परिणाम की अपेक्षा
कार्यक्रम का शुभारंभ जिला पंचायत अध्यक्ष रंजीता गौरव पटेल, जिला पंचायत उपाध्यक्ष मंजू धर्मेन्द्र कटारे, जनपद अध्यक्ष प्रीति कमल ठाकुर, डिप्टी कलेक्टर रचना प्रजापति तथा अन्य विशेषज्ञों की उपस्थिति में दीप प्रज्वलित कर किया गया।डिप्टी कलेक्टर रचना प्रजापति ने अंतरा फाउंडेशन द्वारा समुदाय और जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग पर जोर दिया।
जिला पंचायत अध्यक्ष रंजीता पटेल ने कहा कि विभिन्न परियोजनाओं की आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने स्थानीय अनाज, दालों, सब्जियों, मौसमी फलों और आंगनवाड़ी पोषाहार से तैयार पौष्टिक व्यंजनों का प्रदर्शन किया है। यह प्रतियोगिता एक-दूसरे से सीखने और अनुभव साझा करने का अवसर है।जिला पंचायत उपाध्यक्ष मंजू कटारे तथा जनपद अध्यक्ष प्रीति ठाकुर ने भी गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और बच्चों के लिए संतुलित भोजन की आवश्यकता बताई।
विशेषज्ञों ने गर्भावस्था के दौरान पौष्टिक भोजन, समय पर पंजीयन तथा आवश्यक स्वास्थ्य देखभाल के संबंध में जानकारी दी।इन संदेशों का महत्व निर्विवाद है। लेकिन आयोजन के बाद यह देखना भी जरूरी होगा कि इन जानकारियों को कितने गांवों, आंगनवाड़ी केंद्रों और परिवारों तक पहुंचाया गया।
बीस मिनट में पौष्टिक व्यंजन बनाने की प्रतियोगिता, लेकिन आगे की योजना क्या?
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण ‘20 मिनट की कोशिश, पौष्टिक हो हर डिश’ गतिविधि रही।प्रतियोगिता में दमोह ग्रामीण परियोजना ने प्रथम, जबेरा परियोजना ने द्वितीय और पथरिया परियोजना ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।प्रतिभागियों की रचनात्मकता और स्थानीय खाद्य सामग्री के उपयोग की सराहना की गई।
लेकिन प्रतियोगिता समाप्त होने के बाद एक महत्वपूर्ण प्रश्न शेष रह जाता है।क्या विजेता परियोजनाओं द्वारा तैयार व्यंजनों की विधियां जिले के सभी आंगनवाड़ी केंद्रों तक पहुंचाई जाएंगी? क्या इन व्यंजनों की पोषण गुणवत्ता और लक्षित आयु वर्ग के अनुसार उपयोगिता का मूल्यांकन किया गया? क्या गर्भवती महिलाओं और बच्चों के अभिभावकों के लिए गांवों में व्यावहारिक प्रशिक्षण शिविर आयोजित होंगे?यदि ऐसा होता है, तो इस आयोजन को व्यापक सामुदायिक अभियान का प्रारंभ माना जा सकता है। अन्यथा इसकी उपयोगिता का आकलन केवल एक दिवसीय गतिविधि तक सीमित रह जाने का जोखिम बना रहेगा।
विभाग से जवाब मांगते दस महत्वपूर्ण सवाल
- पोषण कार्यशाला के लिए बड़े होटल का चयन किस अधिकारी अथवा समिति ने किया और इसके क्या कारण थे?
- क्या आयोजन से पहले शासकीय भवन या सार्वजनिक परिसर के विकल्पों पर विचार किया गया था?
- कार्यक्रम पर कुल कितना खर्च हुआ और उसका मदवार विवरण क्या है?
- आयोजन का वित्तीय भार महिला एवं बाल विकास विभाग, अंतरा फाउंडेशन अथवा किसी अन्य संस्था ने वहन किया?
- कितने कुपोषण प्रभावित बच्चों के अभिभावकों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं ने कार्यक्रम में प्रत्यक्ष भागीदारी की?
- क्या आयोजन से पहले जिले के अधिक कुपोषण प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर वहां कार्यक्रम करने पर विचार हुआ?
- जिले में वर्तमान में गंभीर एवं मध्यम कुपोषण से प्रभावित बच्चों की परियोजनावार संख्या कितनी है?
- कार्यक्रम में प्रदर्शित व्यंजनों को ग्रामीण परिवारों तक पहुंचाने की कार्ययोजना और समयसीमा क्या है?
- इस आयोजन से प्राप्त परिणामों का मूल्यांकन कौन करेगा और उसकी रिपोर्ट कब सार्वजनिक होगी?
- क्या भविष्य में ऐसे कार्यक्रम सीधे आंगनवाड़ी केंद्रों, ग्रामीण बस्तियों और जरूरतमंद परिवारों के बीच आयोजित करने को प्राथमिकता दी जाएगी?
क्या कलेक्टर प्रताप नारायण यादव लेंगे संज्ञान?
अब इस पूरे मामले में जिला प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।कलेक्टर प्रताप नारायण यादव से अपेक्षा की जा रही है कि वे आयोजन के स्थान चयन, वित्तीय व्यवस्थाओं, वास्तविक लाभार्थियों की भागीदारी और कार्यक्रम के परिणामों का तथ्यात्मक विवरण संबंधित विभाग से प्राप्त करें।यह जांच किसी संस्था या अधिकारी के प्रयासों को कमतर आंकने के लिए नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों के बेहतर उपयोग और योजनाओं की प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो सकती है।
यदि आयोजन नियमानुसार और उचित लागत पर हुआ है, तो संबंधित दस्तावेज सामने आने से अनावश्यक आशंकाएं दूर होंगी। वहीं यदि व्यवस्थाओं में सुधार की गुंजाइश है, तो भविष्य के कार्यक्रमों के लिए अधिक प्रभावी व्यवस्था बनाई जा सकती है।विशेष रूप से यह देखा जाना चाहिए कि कार्यशाला से प्राप्त जानकारी और प्रशिक्षण को गांवों में किस प्रकार लागू किया जाएगा।
कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में दिखावे से अधिक जरूरी है परिणाम
कुपोषण एक गंभीर स्वास्थ्य और सामाजिक चुनौती है। इससे निपटने के लिए शासन, प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, सामाजिक संस्थाओं और समुदाय के बीच निरंतर समन्वय आवश्यक है।पोषण संबंधी कार्यशालाएं, व्यंजन प्रदर्शन और प्रशिक्षण कार्यक्रम इस अभियान के उपयोगी माध्यम हो सकते हैं, बशर्ते उनका लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचे।दमोह में आयोजित कार्यशाला में अंतरा फाउंडेशन के कार्यक्रम निदेशक पीयूष भट्ट, जिला प्रमुख रवि यादव तथा विभागीय और परियोजना स्तर की टीमों ने भाग लिया। आयोजन में पोषण जागरूकता से जुड़ी अनेक गतिविधियां हुईं, लेकिन इसके खर्च और प्रत्यक्ष सामुदायिक प्रभाव का स्पष्ट विवरण सामने आना अभी शेष है।
आखिरकार सवाल यह नहीं कि होटल में कितने प्रकार के पौष्टिक व्यंजन सजाए गए, बल्कि सवाल यह है कि उन व्यंजनों का ज्ञान और पोषण संबंधी सहायता जरूरतमंद बच्चों के घरों तक कितनी पहुंची।दमोह में पोषण अभियान की सफलता का वास्तविक पैमाना मंच की भव्यता, अतिथियों की संख्या या जारी की गई विज्ञप्तियां नहीं, बल्कि कुपोषण से प्रभावित बच्चों की स्वास्थ्य स्थिति में दिखाई देने वाला सुधार होना चाहिए।अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इन प्रश्नों पर संबंधित विभाग से तथ्यात्मक जानकारी लेकर सार्वजनिक करेगा या फिर आयोजन की सफलता के दावों के बीच खर्च, प्राथमिकता और परिणामों से जुड़े सवाल अनुत्तरित रह जाएंगे।
