दमोह। मध्य प्रदेश के दमोह जिला मुख्यालय स्थित संयुक्त कलेक्ट्रेट भवन के प्रांगण से एक ऐसा दृश्य सामने आया है, जिसने सरकारी व्यवस्थाओं, स्वच्छता अभियान, बाल संरक्षण और शिक्षा के अधिकार को लेकर किए जा रहे दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस परिसर से जिले की प्रशासनिक व्यवस्था संचालित होती है, जहां प्रतिदिन कलेक्टर सहित विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी, कर्मचारी, जनप्रतिनिधि और आम नागरिकों का आना-जाना लगा रहता है, उसी परिसर में एक मासूम बच्चा कचरे के ढेर में अपना जीवन तलाशता नजर आया।
बच्चा गंदगी, बदबू और सड़ते हुए कचरे के बीच प्लास्टिक और अन्य कबाड़ बीन रहा था। उसके आसपास फैले कचरे से उठती दुर्गंध और संक्रामक बीमारियों का खतरा साफ दिखाई दे रहा था। यह दृश्य केवल एक गरीब परिवार की मजबूरी का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना भी है जो बच्चों को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन देने का दावा करती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिला प्रशासन के सबसे महत्वपूर्ण कार्यालय परिसर में यदि इस प्रकार का कचरा जमा है और उसी कचरे में एक मासूम बच्चा अपनी आजीविका खोजने को मजबूर है, तो स्वच्छता व्यवस्था की वास्तविक स्थिति क्या है? क्या संबंधित विभागों की नियमित निगरानी नहीं होती? यदि होती है तो फिर यह स्थिति कैसे बनी रही?
केंद्र और राज्य सरकार द्वारा करोड़ों रुपये खर्च कर स्वच्छ भारत मिशन, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, बाल संरक्षण अभियान, बाल श्रम उन्मूलन कार्यक्रम, समग्र शिक्षा अभियान तथा बच्चों के पुनर्वास से जुड़ी अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी बच्चा स्कूल से दूर न रहे और किसी भी प्रकार के जोखिमपूर्ण वातावरण में काम करने के लिए मजबूर न हो। लेकिन कलेक्ट्रेट परिसर का यह दृश्य इन योजनाओं की जमीनी हकीकत पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
यह भी विचारणीय है कि जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें, कॉपियां और स्कूल बैग होने चाहिए, उसी उम्र में यह मासूम अपने नंगे हाथों से गंदगी और कचरे के ढेर को खंगालकर प्लास्टिक और कबाड़ इकट्ठा कर रहा था। कचरे में टूटे कांच, जंग लगे लोहे, मेडिकल वेस्ट अथवा अन्य हानिकारक वस्तुओं से चोट लगने का खतरा बना रहता है। इसके अलावा गंदगी में पनपने वाले बैक्टीरिया, वायरस और अन्य संक्रमण बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक साबित हो सकते हैं।
समाजशास्त्रियों और बाल अधिकारों से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के दृश्य केवल आर्थिक अभाव की कहानी नहीं कहते, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही, सामाजिक असमानता और योजनाओं के कमजोर क्रियान्वयन की ओर भी संकेत करते हैं। यदि समय रहते ऐसे बच्चों की पहचान कर उन्हें शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से नहीं जोड़ा गया, तो उनका भविष्य अंधकारमय हो सकता है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कलेक्ट्रेट परिसर में प्रतिदिन सैकड़ों लोग पहुंचते हैं। यदि इतने महत्वपूर्ण स्थान पर स्वच्छता व्यवस्था की यह स्थिति है, तो ग्रामीण क्षेत्रों और दूरस्थ इलाकों की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। लोगों का कहना है कि प्रशासन को केवल अभियान चलाने और शपथ दिलाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रभावी निगरानी और नियमित कार्रवाई भी सुनिश्चित करनी चाहिए।
यह घटना बाल संरक्षण से जुड़े विभागों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करती है। क्या इस बच्चे की पहचान कर उसे स्कूल भेजने, परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति जानने और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया? क्या बाल कल्याण समिति, महिला एवं बाल विकास विभाग, श्रम विभाग और जिला प्रशासन के बीच समन्वय स्थापित कर ऐसे बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने की कोई प्रभावी पहल हो रही है? यदि हो रही है तो फिर यह बच्चा आज भी कचरे के ढेर में अपना भविष्य क्यों तलाश रहा है?
स्वच्छ भारत अभियान का मूल उद्देश्य केवल सड़कों और भवनों की सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण का निर्माण करना भी है। वहीं शिक्षा का अधिकार कानून प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है। इसके बावजूद यदि जिला मुख्यालय के प्रशासनिक परिसर में ही एक बच्चा कचरा बीनता दिखाई देता है, तो यह व्यवस्था की गंभीर विफलता मानी जाएगी।
प्रशासन से अपेक्षा की जा रही है कि वह इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल कलेक्ट्रेट परिसर की स्वच्छता व्यवस्था दुरुस्त कराए, संबंधित बच्चे की पहचान कर उसे शिक्षा और पुनर्वास से जोड़े, परिवार को आवश्यक सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाए तथा यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में कोई भी मासूम अपनी किस्मत कचरे के ढेर में तलाशने के लिए मजबूर न हो। क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके ऊंचे भवनों से नहीं, बल्कि उसके बच्चों के सुरक्षित, सम्मानजनक और शिक्षित भविष्य से होती है।
