बाल श्रम के खिलाफ निर्णायक संघर्ष ही विकसित भारत की आधारशिला
विश्व बाल श्रम निरोध दिवस (12 जून) पर विशेष

(डॉ. एल.एन.वैष्णव)
जब कोई बच्चा स्कूल की घंटी सुनने के बजाय किसी होटल में बर्तन धो रहा हो, जब उसकी उंगलियां पेंसिल और कॉपी के बजाय मशीनों और औजारों से जूझ रही हों, जब खेल के मैदान की जगह वह मजदूरी के बोझ तले दबा हो, तब यह केवल उस बच्चे की नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता होती है। बचपन जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील काल होता है, जिसमें शिक्षा, संस्कार, खेलकूद और व्यक्तित्व निर्माण की नींव रखी जाती है। लेकिन दुर्भाग्यवश आज भी लाखों बच्चे अपने अधिकारों से वंचित होकर श्रम करने को विवश हैं।
विश्व बाल श्रम निरोध दिवस हमें केवल एक दिवस मनाने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह आत्ममंथन करने का भी अवसर है कि आखिर आजादी के आठ दशक बाद भी बच्चों को श्रम करने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ रहा है? क्यों उनके हाथों में किताबों के स्थान पर औजार दिखाई देते हैं? और हम इस स्थिति को बदलने के लिए क्या कर रहे हैं?
बाल श्रम: मानवता पर कलंक
बाल श्रम केवल एक आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और मानवीय चुनौती है। यह बच्चों के शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन के अधिकारों का सीधा हनन है। जो बच्चा आज मजदूरी कर रहा है, वह कल समाज की मुख्यधारा से कट सकता है। शिक्षा से दूर रहने वाला बच्चा गरीबी और शोषण के उस चक्र में फंस जाता है जिससे निकलना अत्यंत कठिन हो जाता है।
संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार विश्वभर में लगभग 13.8 करोड़ बच्चे किसी न किसी प्रकार के श्रम में लगे हुए हैं। इनमें करोड़ों बच्चे ऐसे हैं जो खतरनाक परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि आधुनिकता और तकनीकी विकास के इस युग में भी दुनिया बाल श्रम जैसी बुराई से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है।
बाल श्रम के पीछे छिपे कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि बाल श्रम की समस्या का मूल कारण केवल गरीबी नहीं है। इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं—
- गरीबी और आर्थिक असमानता
जब परिवार की आय सीमित होती है तो माता-पिता बच्चों को भी कमाने के लिए भेज देते हैं। कई बार बच्चों की कमाई परिवार के लिए जीवनयापन का साधन बन जाती है।
- शिक्षा से दूरी
जहां विद्यालयों तक पहुंच सीमित होती है या शिक्षा की गुणवत्ता कमजोर होती है, वहां बच्चों के स्कूल छोड़ने की संभावना बढ़ जाती है।
- सामाजिक जागरूकता का अभाव
आज भी अनेक परिवार बाल श्रम को गलत नहीं मानते। उन्हें लगता है कि बच्चे को जल्दी काम सीखना चाहिए, जबकि यह सोच बच्चों के भविष्य को नुकसान पहुंचाती है।
- असंगठित क्षेत्र में रोजगार
होटल, ढाबे, वर्कशॉप, ईंट भट्टे, कृषि क्षेत्र, घरेलू कार्य और छोटे उद्योगों में बाल श्रमिकों का उपयोग अपेक्षाकृत अधिक देखा जाता है।
- पलायन और विस्थापन
ग्रामीण क्षेत्रों से रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने वाले परिवारों के बच्चे अक्सर शिक्षा से दूर हो जाते हैं और श्रम में शामिल हो जाते हैं।
भारत में बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में प्रयास
भारत सरकार ने बाल श्रम रोकने के लिए कई महत्वपूर्ण कानून बनाए हैं। बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम के तहत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को रोजगार देना प्रतिबंधित है। खतरनाक उद्योगों में किशोरों के रोजगार पर भी कड़े प्रावधान लागू हैं।इसके साथ ही शिक्षा का अधिकार अधिनियम, समग्र शिक्षा अभियान, मध्याह्न भोजन योजना, छात्रवृत्ति योजनाएं तथा विभिन्न सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम बच्चों को विद्यालयों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
पिछले वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा चलाए गए विशेष अभियान के कारण बाल श्रम के मामलों में कमी आई है, लेकिन लक्ष्य अभी भी दूर है। जब तक समाज स्वयं इस लड़ाई में भागीदार नहीं बनेगा, तब तक स्थायी सफलता संभव नहीं होगी।
विकसित भारत और बाल श्रम मुक्त भारत
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की परिकल्पना प्रस्तुत की गई है। लेकिन विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब देश का प्रत्येक बच्चा शिक्षित, सुरक्षित और सशक्त होगा।कोई भी राष्ट्र तब तक विकसित नहीं कहलाया जा सकता जब तक उसके बच्चे कारखानों और ढाबों में काम करने के लिए मजबूर हों। इसलिए बाल श्रम उन्मूलन केवल सामाजिक सुधार नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण अभियान है।
मध्य प्रदेश में ‘जीरो टॉलरेंस’ की दिशा
मध्य प्रदेश सरकार ने बाल श्रम के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए विभिन्न स्तरों पर अभियान तेज किए हैं। श्रम विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, पुलिस प्रशासन तथा जिला प्रशासन के संयुक्त प्रयासों से बाल श्रमिकों की पहचान और पुनर्वास की कार्रवाई की जा रही है।
राज्य सरकार की मंशा स्पष्ट है कि बच्चों को शिक्षा और संरक्षण मिले तथा किसी भी स्थिति में उनसे मजदूरी न कराई जाए। विभिन्न जिलों में समय-समय पर विशेष अभियान चलाकर बाल श्रमिकों को मुक्त कराया जा रहा है और उन्हें पुनः शिक्षा से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं।
दमोह: संभावनाओं का जिला, जिम्मेदारियों का भी केंद्र
बुंदेलखंड क्षेत्र का प्रमुख जिला दमोह कृषि, शिक्षा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ रहा है। यहां पंचायतों, स्वयंसेवी संस्थाओं, शिक्षकों और प्रशासन के संयुक्त प्रयासों से अनेक सामाजिक अभियानों को सफलता मिली है।फिर भी ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में बाल श्रम के प्रति निरंतर सतर्कता की आवश्यकता है। कई बार आर्थिक अभाव के कारण बच्चे खेतों, दुकानों, निर्माण कार्यों या अन्य श्रम कार्यों में लग जाते हैं। यह स्थिति न केवल उनके शिक्षा के अधिकार को प्रभावित करती है बल्कि उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
दमोह जिले में यदि प्रत्येक ग्राम पंचायत, स्कूल, आंगनवाड़ी, सामाजिक संस्था और नागरिक यह संकल्प ले लें कि कोई भी बच्चा स्कूल छोड़कर श्रम नहीं करेगा, तो यह जिला बाल श्रम मुक्त जिले का आदर्श मॉडल बन सकता है।
समाज की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
बाल श्रम उन्मूलन की लड़ाई सरकार अकेले नहीं जीत सकती। इसमें समाज की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।
- यदि किसी दुकान, होटल, ढाबे या प्रतिष्ठान में बाल श्रमिक दिखाई दे तो इसकी सूचना संबंधित विभाग को दें।
- बच्चों को स्कूल भेजने के लिए अभिभावकों को प्रेरित करें।
- गरीब परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने में सहयोग करें।
- समाज में यह संदेश फैलाएं कि बाल श्रम अपराध है और शिक्षा अधिकार।
जब समाज जागरूक होगा, तभी बाल श्रम जैसी कुरीति का स्थायी समाधान संभव होगा।
बच्चों के सपनों का सम्मान करें
एक बच्चा डॉक्टर बनना चाहता है, दूसरा वैज्ञानिक, तीसरा शिक्षक और चौथा खिलाड़ी। यदि बचपन में ही उसके सपनों को मजदूरी के बोझ तले दबा दिया जाए तो राष्ट्र भी अपनी प्रतिभाओं को खो देता है।हमें यह समझना होगा कि किसी बच्चे को काम पर लगाना केवल उसके वर्तमान को नहीं, बल्कि देश के भविष्य को भी नुकसान पहुंचाना है। इसलिए प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आए।
संकल्प का समय
विश्व बाल श्रम निरोध दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि यह सामाजिक चेतना का दिवस है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि बच्चों को बचपन, शिक्षा, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन का अधिकार दिलाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।आइए, हम संकल्प लें कि न तो किसी बच्चे से श्रम कराएंगे और न ही ऐसा होते हुए देखकर मौन रहेंगे। बच्चों के हाथों में औजार नहीं, किताबें हों; उनके कंधों पर मजदूरी का बोझ नहीं, सपनों की उड़ान हो; यही एक विकसित, संवेदनशील और समृद्ध भारत की पहचान होगी।
क्योंकि जब बचपन सुरक्षित होगा, तभी भारत का भविष्य सुरक्षित होगा।
