क्षतिग्रस्त सड़क पर जारी आवागमन, जिम्मेदार विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल; आखिर आदेश के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?
(डॉ. एल.एन.वैष्णव)
दमोह, 21 अगस्त 2026 /शहर के महत्वपूर्ण सरदार वल्लभभाई पटेल सेतु मार्ग की बदहाली अब केवल सड़क की समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक आदेशों के पालन और संबंधित विभाग की कार्यप्रणाली पर भी बड़ा सवाल बनती जा रही है। मार्ग की खराब स्थिति को लेकर पहले खबर सामने आई, प्रशासन ने संज्ञान लिया और कलेक्टर स्तर से संबंधित अधिकारियों को आवश्यक सुधार के निर्देश दिए गए। इसके बावजूद यदि सड़क आज भी क्षतिग्रस्त नजर आ रही है, तो सवाल सीधा है—आखिर कलेक्टर के आदेश का पालन कौन कराएगा?
जिस सड़क से रोजाना बड़ी संख्या में छोटे-बड़े वाहन गुजरते हैं, उसी मार्ग पर क्षतिग्रस्त हिस्से वाहन चालकों के लिए परेशानी और संभावित खतरे का कारण बने हुए हैं। बारिश के मौसम में सड़क की स्थिति और अधिक चिंताजनक हो सकती है। बावजूद इसके समस्या का स्थायी समाधान होता दिखाई नहीं दे रहा।
खबर चली, कलेक्टर ने निर्देश दिए, फिर भी हालात जस के तस

सरदार वल्लभभाई पटेल सेतु मार्ग की बदहाल स्थिति पहले भी सामने लाई गई थी। खबर के बाद प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित विभाग को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए थे। उस समय उम्मीद जगी थी कि जिम्मेदार विभाग तत्काल मौके पर पहुंचकर सड़क की मरम्मत कराएगा।लेकिन अब दोबारा सड़क की स्थिति सामने आने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रशासनिक निर्देश आखिर किस स्तर पर जाकर रुक गए?यदि कलेक्टर के निर्देश के बाद भी सड़क की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ तो क्या संबंधित विभाग ने मौके का निरीक्षण किया? क्या मरम्मत की कार्ययोजना बनाई गई? यदि बनाई गई तो उस पर काम क्यों नहीं हुआ? इन सवालों का जवाब जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए।
सड़क पर लापरवाही, जिम्मेदारी किसकी?
शहर के प्रमुख मार्ग की नियमित निगरानी और रखरखाव संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है। सड़क क्षतिग्रस्त होने के बाद उसकी मरम्मत के लिए प्रशासनिक स्तर पर निर्देश जारी होने के बावजूद स्थिति नहीं सुधरती है तो यह महज तकनीकी समस्या नहीं रह जाती।
यह विभागीय निगरानी और जवाबदेही का विषय बन जाता है।स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क की मरम्मत के नाम पर यदि केवल अस्थायी खानापूर्ति की जाती है और कुछ समय बाद सड़क फिर खराब हो जाती है, तो इससे सरकारी धन और समय दोनों की बर्बादी होती है। जरूरत इस बात की है कि सड़क के क्षतिग्रस्त होने के मूल कारण का पता लगाया जाए और स्थायी समाधान किया जाए।
बारिश में बढ़ सकता है खतरा
वर्तमान में बारिश का दौर चल रहा है। ऐसे में क्षतिग्रस्त सड़क पर पानी जमा होने और गड्ढों की गहराई स्पष्ट दिखाई नहीं देने से वाहन चालकों के लिए जोखिम बढ़ सकता है। दोपहिया वाहन चालक विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं।रात के समय स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है। यदि समय रहते क्षतिग्रस्त हिस्सों को दुरुस्त नहीं किया गया तो किसी दुर्घटना के बाद कार्रवाई करने से बेहतर है कि प्रशासन पहले ही संभावित खतरे को समाप्त करे।
कलेक्टर के आदेश की मॉनिटरिंग कौन करेगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कलेक्टर स्तर से कार्रवाई के निर्देश दिए जा चुके हैं तो उनके पालन की निगरानी किस अधिकारी की जिम्मेदारी है?क्या संबंधित विभाग ने कलेक्टर को कार्रवाई की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया? क्या मौके का दोबारा निरीक्षण हुआ? क्या सड़क की गुणवत्ता और क्षति के कारणों की तकनीकी जांच की गई? या फिर फाइलों में कार्रवाई पूरी मान ली गई?यदि जमीनी स्थिति और कागजी कार्रवाई में अंतर है तो यह गंभीर प्रशासनिक विषय है।
सिर्फ पैबंद नहीं, स्थायी समाधान चाहिए
स्थानीय नागरिकों की मांग है कि सड़क पर अस्थायी पैचवर्क के बजाय तकनीकी विशेषज्ञों से निरीक्षण कराया जाए। सड़क की परत, जल निकासी और निर्माण की गुणवत्ता सहित उन सभी कारणों की जांच होनी चाहिए जिनके कारण मार्ग बार-बार क्षतिग्रस्त हो रहा है।लोगों का कहना है कि महत्वपूर्ण मार्ग को बार-बार मरम्मत की जरूरत पड़ रही है तो कहीं न कहीं मूल समस्या मौजूद है। उसे दूर किए बिना केवल ऊपर से मरम्मत करने का कोई स्थायी लाभ नहीं होगा।
जिम्मेदार विभाग की चुप्पी पर भी सवाल
सड़क की स्थिति सामने आने के बाद अब यह भी जरूरी है कि संबंधित विभाग सार्वजनिक रूप से बताए कि कलेक्टर के निर्देश के बाद क्या कार्रवाई की गई। यदि कार्रवाई नहीं हुई तो देरी का कारण क्या है और यदि मरम्मत की गई थी तो सड़क दोबारा क्षतिग्रस्त कैसे हुई?जनता को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि सड़क पर दिखाई देने वाला काम चाहिए।
अब सवाल सड़क का नहीं, जवाबदेही का है
सरदार वल्लभभाई पटेल सेतु मार्ग की बदहाली अब प्रशासन के लिए एक परीक्षा बन गई है। खबर के बाद कलेक्टर का संज्ञान, निर्देश और उसके बाद भी सड़क की खराब स्थिति—यह पूरा घटनाक्रम विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।अब जरूरत है कि संबंधित अधिकारी मौके पर पहुंचें, वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करें और मरम्मत की समयसीमा तय करें। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि कलेक्टर के पूर्व निर्देशों पर क्या कार्रवाई हुई और यदि नहीं हुई तो जिम्मेदारी किसकी है।
सवाल सीधा है—जब कलेक्टर का आदेश जारी हो चुका था, तो फिर सड़क अब तक क्यों नहीं सुधरी?
क्या आदेश केवल कागजों तक सीमित रह गया या जिम्मेदार विभाग ने उसे गंभीरता से लिया? इसका जवाब अब प्रशासन और संबंधित विभाग को देना होगा।
