( डॉ.एल.एन.वैष्णव)
भोपाल/मध्यप्रदेश में भीषण गर्मी के बीच पेयजल संकट अब केवल मौसमी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक प्रबंधन, संसाधन उपयोग, जवाबदेही और योजनाओं के क्रियान्वयन की बड़ी परीक्षा बन चुका है। प्रदेश के कई जिले पानी की उपलब्धता, वितरण व्यवस्था, भूजल गिरावट और पेयजल आपूर्ति की चुनौतियों से जूझ रहे हैं। कुछ स्थानों पर लोग सड़कों पर उतर रहे हैं तो कहीं ग्रामीण क्षेत्रों में पानी के लिए लंबा इंतजार आम बात बनता जा रहा है।
प्रदेश के जिन जिलों में पेयजल संकट, गर्मी और जल प्रबंधन की चुनौतियां प्रमुख रूप से सामने आ रही हैं, उनमें इंदौर, रतलाम, उज्जैन, देवास, दमोह, आगर-मालवा, मंदसौर, नीमच, अशोकनगर, गुना, विदिशा, रायसेन, सागर, टीकमगढ़, निवाड़ी, छतरपुर, पन्ना, सतना, रीवा, सीधी, मऊगंज, खंडवा, खरगोन, धार, झाबुआ, अलीराजपुर, बड़वानी, बुरहानपुर सहित कई जिले शामिल हैं, जहां गर्मी, जल स्रोतों पर दबाव और वितरण संबंधी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं।
योजनाएं बनीं, लेकिन कई जगह असर अधूरा
मध्यप्रदेश में जल जीवन मिशन, समूह नल-जल योजनाएं, एकल नल-जल योजनाएं, पाइपलाइन विस्तार और ग्रामीण पेयजल ढांचे को मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर बजट खर्च किया गया। लेकिन कई क्षेत्रों में आज भी पाइपलाइन होने के बावजूद पर्याप्त जल स्रोत नहीं हैं। कहीं मोटर खराब हैं, कहीं पाइपलाइन लीकेज है, कहीं रखरखाव प्रभावित है और कई जगह जल वितरण की क्षमता वास्तविक जरूरत के मुकाबले कमजोर पड़ रही है।
दमोह: करोड़ों खर्च, फिर भी सवाल बरकरार
दमोह नगर भी प्रदेश की जल चुनौती का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आ रहा है। नगर क्षेत्र में वर्षों से पेयजल योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च हुए। पाइपलाइन नेटवर्क, जल संरचनाओं और वितरण व्यवस्था को मजबूत करने के दावे हुए, लेकिन आज भी कई क्षेत्रों में दो से तीन दिन के अंतराल में पानी मिलने जैसी शिकायतें चर्चा में बनी रहती हैं।
गर्मी बढ़ते ही कई मोहल्लों में जल संकट की स्थिति गंभीर हो जाती है। नागरिकों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि यदि सार्वजनिक धन से संचालित परियोजनाओं पर बड़े स्तर पर राशि खर्च हुई, तो फिर स्थायी समाधान क्यों नहीं निकल पाया।
केवल प्राकृतिक संकट नहीं, व्यवस्थागत चुनौतियां भी
विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट केवल कम बारिश या बढ़ती गर्मी का परिणाम नहीं है। कई मामलों में तकनीकी कमियां, रखरखाव की कमी, समय पर निगरानी नहीं होना, परियोजनाओं के संचालन में व्यवस्थित समीक्षा का अभाव और स्थानीय स्तर पर समस्याओं का समय पर समाधान नहीं होना भी संकट को बढ़ाता है।
कुछ क्षेत्रों में यह भी चर्चा का विषय बनता रहा है कि यदि किसी योजना में गंभीर संचालन संबंधी कमी, निर्माण गुणवत्ता संबंधी प्रश्न, वित्तीय अनियमितता के आरोप या कार्य निष्पादन में त्रुटियां सामने आती हैं, तो समयबद्ध जांच, तकनीकी ऑडिट और जिम्मेदारी निर्धारण की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होनी चाहिए। किसी भी आपराधिक या आर्थिक कार्रवाई का आधार जांच और प्रमाण ही होना चाहिए, लेकिन जवाबदेही तंत्र मजबूत होना भी उतना ही आवश्यक माना जाता है।
जवाबदेही कमजोर होने पर बढ़ती है समस्या
प्रशासनिक जानकार मानते हैं कि यदि परियोजनाओं की स्वतंत्र समीक्षा, तकनीकी मूल्यांकन, नियमित ऑडिट और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया प्रभावी नहीं होगी, तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाएगा।
बढ़ते संकट के दुष्परिणाम
- महिलाओं और परिवारों पर अतिरिक्त बोझ
- टैंकर आधारित निर्भरता बढ़ना
- भूजल स्तर लगातार नीचे जाना
- खेती और पशुपालन प्रभावित होना
- स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ना
- स्थानीय स्तर पर जन असंतोष बढ़ना
- आर्थिक बोझ में वृद्धि
समाधान केवल बजट नहीं, बेहतर क्रियान्वयन
विशेषज्ञ मानते हैं कि जल संकट से निपटने के लिए केवल नई परियोजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। इसके लिए जल संरक्षण, वर्षा जल संग्रहण, भूजल पुनर्भरण, मजबूत निगरानी तंत्र, तकनीकी रखरखाव, पारदर्शिता और जवाबदेही आधारित प्रशासनिक मॉडल जरूरी है।
मध्यप्रदेश के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है — क्या योजनाओं की वास्तविक सफलता कागजों पर प्रगति से तय होगी या हर घर तक नियमित और पर्याप्त पेयजल पहुंचने से? प्रदेश के कई जिले और दमोह जैसे शहर यही जवाब तलाश रहे हैं।
