सरकार प्राकृतिक खेती को बना रही आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला
( डॉ. एल.एन. वैष्णव )
देश में किसानों की आय बढ़ाने, खेती की लागत कम करने, मिट्टी की उर्वरता बचाने और आम नागरिकों को रसायन मुक्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (National Mission on Natural Farming – NMNF) संचालित किया जा रहा है। इस मिशन के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने, जैविक उत्पादों का उत्पादन बढ़ाने तथा उनके विपणन की बेहतर व्यवस्था उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
मध्यप्रदेश सरकार भी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन, जैविक इनपुट तथा जैविक उत्पादों की बिक्री हेतु विशेष हाट-बाजार संचालित करने का दावा कर रही है।
दमोह में योजना की जमीनी हकीकत ने खोली व्यवस्थाओं की पोल
राष्ट्रीय स्तर पर चलाई जा रही इस महत्वाकांक्षी योजना की वास्तविक तस्वीर दमोह जिले में बिल्कुल अलग नजर आती है। यहां प्राकृतिक एवं रसायन मुक्त खेती करने वाले किसान ऐसे स्थान पर अपने उत्पाद बेचने को मजबूर हैं, जहां चारों ओर गंदगी, बदबू, कीचड़ और अव्यवस्था का साम्राज्य है।
बारिश के कारण बाजार परिसर में जलभराव हो गया है। नालियों की सफाई नहीं होने से दुर्गंध फैल रही है। जगह-जगह कचरे के ढेर लगे हैं, जिससे ग्राहकों का बाजार तक पहुंचना भी मुश्किल हो रहा है।
स्वच्छ उत्पाद, लेकिन गंदे माहौल में बिक्री
विडंबना यह है कि जिन किसानों के उत्पाद स्वास्थ्य, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं, उन्हीं किसानों को अस्वच्छ वातावरण में बैठकर अपने उत्पाद बेचने पड़ रहे हैं।
ग्राहकों का कहना है कि बदबू और गंदगी के कारण वे बाजार में अधिक देर तक रुकना नहीं चाहते, जिससे जैविक उत्पादों की बिक्री लगातार प्रभावित हो रही है।
भारतीय किसान संघ ने उठाए गंभीर सवाल
भारतीय किसान संघ के प्रांतीय पदाधिकारी रमेश यादव ने इस पूरी व्यवस्था पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन स्थानीय स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही योजना की सफलता में सबसे बड़ी बाधा बन रही है।
उन्होंने कहा कि यदि किसानों को सम्मानजनक और स्वच्छ बाजार उपलब्ध नहीं कराया जाएगा तो राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
रमेश यादव ने संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करते हुए उनके विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है।
किसानों का दर्द: बिक्री घटी, बीमारी बढ़ी
प्राकृतिक खेती करने वाले किसान थम्मन सिंह ने बताया कि वे वर्षों से बिना रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों के खेती कर रहे हैं। काफी मेहनत के बाद तैयार होने वाले उत्पादों को बेचने के लिए उन्हें जिस स्थान पर बैठाया गया है, वहां की गंदगी देखकर कई ग्राहक वापस लौट जाते हैं।
किसान बहादुर ने बताया कि बाजार की बदहाल स्थिति के कारण उनकी आय लगातार घट रही है। कई बार पूरा दिन बैठने के बाद भी पर्याप्त बिक्री नहीं हो पाती।
महिला किसानों ने सुनाई अपनी पीड़ा
बाजार में बैठने वाली महिला किसानों ने बताया कि सुबह से शाम तक बदबू, मच्छरों और गंदगी के बीच बैठना उनकी मजबूरी बन गया है। लगातार दूषित वातावरण में रहने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई बार बीमार होने के बावजूद उन्हें रोजी-रोटी के लिए इसी स्थान पर बैठना पड़ता है।
ग्राहकों की संख्या लगातार हो रही कम
किसानों का कहना है कि बाजार स्थल की गंदगी और अव्यवस्था के कारण ग्राहक आने से बचते हैं। इससे उनकी बिक्री पर सीधा असर पड़ रहा है। यदि बाजार स्वच्छ और व्यवस्थित हो जाए तो अधिक ग्राहक आएंगे और प्राकृतिक खेती के प्रति लोगों का विश्वास भी बढ़ेगा।
आखिर किसकी अनदेखी का परिणाम?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या संबंधित विभाग, स्थानीय निकाय और जनप्रतिनिधियों ने कभी इस बाजार की स्थिति का गंभीरता से निरीक्षण किया?
यदि निरीक्षण किया गया तो अब तक सफाई, जल निकासी और मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
क्या सरकार की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन योजना को स्थानीय स्तर पर लापरवाही की भेंट चढ़ाया जा रहा है?
किसानों की मांग
- बाजार परिसर की नियमित सफाई हो।
- जल निकासी की स्थायी व्यवस्था बनाई जाए।
- बैठने के लिए स्वच्छ एवं सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराया जाए।
- ग्राहकों के लिए पेयजल, शेड और पार्किंग जैसी सुविधाएं विकसित की जाएं।
- लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय कर कार्रवाई की जाए।
अब प्रशासन की परीक्षा
प्राकृतिक खेती केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके उत्पादों को सम्मानजनक बाजार उपलब्ध कराना भी सरकार की जिम्मेदारी है। दमोह के जैविक किसानों की यह पीड़ा केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की जमीनी चुनौतियों की ओर भी इशारा करती है।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन, संबंधित विभाग और जनप्रतिनिधि इस गंभीर मुद्दे पर कब तक ठोस कदम उठाते हैं, ताकि प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को उनका सम्मान और स्वच्छ बाजार दोनों मिल सकें।
