( डॉ. एल.एन. वैष्णव )
दमोह। शहर में लगातार गहराते पेयजल संकट को लेकर रविवार को दमोह कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने कलेक्ट्रेट सभाकक्ष में नगर पालिका से जुड़े जनप्रतिनिधियों, पार्षदों, पार्षद प्रतिनिधियों, मुख्य नगर पालिका अधिकारी, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग एवं अन्य संबंधित अधिकारियों की एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक आयोजित की। बैठक का उद्देश्य शहर के विभिन्न वार्डों में उत्पन्न पेयजल संकट, जलापूर्ति व्यवस्था में आ रही बाधाओं, टैंकरों की उपलब्धता, पाइपलाइन सुधार तथा वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर चर्चा कर त्वरित समाधान सुनिश्चित करना था।
शहर के नागरिकों को उम्मीद थी कि लंबे समय से बनी जल समस्या पर इस बैठक से राहत का कोई ठोस रास्ता निकलेगा, लेकिन बैठक समाप्त होते ही कलेक्ट्रेट परिसर में जो घटनाक्रम सामने आया उसने प्रशासनिक चर्चा से अधिक राजनीतिक सक्रियता और मीडिया प्रबंधन को केंद्र में ला दिया।
बैठक खत्म होते ही शुरू हुई नारेबाजी
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जैसे ही बैठक में शामिल जनप्रतिनिधि और अधिकारी सभाकक्ष से बाहर निकले, परिसर में मौजूद कुछ लोगों ने अचानक नारेबाजी शुरू कर दी। नारे जल संकट, नगर पालिका की कार्यप्रणाली और अव्यवस्था को लेकर लगाए जा रहे थे। शुरुआत में यह सामान्य विरोध प्रदर्शन जैसा लगा, लेकिन कुछ ही क्षणों में घटनास्थल का स्वरूप बदलता नजर आया।
नारेबाजी के साथ ही उसी समूह के कुछ लोग मोबाइल फोन लेकर वीडियो रिकॉर्डिंग में सक्रिय हो गए। अलग-अलग कोणों से नारे लगा रहे चेहरों, भीड़ की प्रतिक्रिया, अधिकारियों की मौजूदगी और मौके के माहौल को लगातार कैमरे में कैद किया जाने लगा। वहां मौजूद लोगों का कहना था कि रिकॉर्डिंग का तरीका ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा घटनाक्रम सिर्फ विरोध दर्ज कराने के लिए नहीं बल्कि बाद में प्रचार-प्रसार के लिए व्यवस्थित रूप से संकलित किया जा रहा हो।
मोबाइल कैमरे के सामने शुरू हुआ सवाल-जवाब
नारेबाजी के तुरंत बाद घटनास्थल पर मौजूद कुछ जनप्रतिनिधियों और उनके समर्थकों द्वारा मोबाइल फोन कैमरा ऑन कर मौके पर उपस्थित पार्षदों, प्रतिनिधियों तथा अधिकारियों से सवाल पूछे जाने लगे।प्रश्न जल संकट, वार्डों में पानी की उपलब्धता, नगर पालिका की विफलता और प्रशासन की जवाबदेही को लेकर किए गए, वहीं उत्तर भी क्रमशः रिकॉर्ड किए जाते रहे।
विशेष बात यह रही कि यह सवाल किसी स्वतंत्र मीडिया प्रतिनिधि द्वारा नहीं बल्कि उसी राजनीतिक समूह से जुड़े लोगों द्वारा पूछे जा रहे थे जो कुछ मिनट पहले नारेबाजी का हिस्सा थे। इस कारण कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद लोगों के बीच यह चर्चा तेजी से फैल गई कि विरोध प्रदर्शन के साथ-साथ मौके पर “तत्काल मीडिया कंटेंट” तैयार किया जा रहा है।
उपाध्यक्ष पक्ष के प्रतिनिधि की सक्रियता बनी चर्चा का विषय
पूरे घटनाक्रम में नगर पालिका परिषद के उपाध्यक्ष पक्ष से जुड़े प्रतिनिधि विशेष रूप से सक्रिय दिखाई दिए। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि वे लगातार मोबाइल फोन पर वीडियो रिकॉर्ड करते हुए कभी सवाल पूछते, कभी प्रतिक्रिया लेने के लिए लोगों को आगे बुलाते और कभी अधिकारियों के बयान को रिकॉर्ड करते नजर आए।
इसी सक्रियता ने पूरे मामले को और अधिक चर्चित बना दिया, क्योंकि सामान्यतः ऐसी भूमिका मीडिया प्रतिनिधियों की होती है, लेकिन यहां जनप्रतिनिधि स्वयं रिकॉर्डिंग, प्रस्तुतीकरण और प्रतिक्रियाओं के संकलन में जुटे दिखे।
CMO राजेंद्र सिंह लोधी की बाइट भी हुई रिकॉर्ड
इस दौरान मुख्य नगर पालिका अधिकारी राजेंद्र सिंह लोधी को भी मोबाइल कैमरे के सामने अपनी बात रखते देखा गया। उनसे शहर में पेयजल आपूर्ति की वर्तमान स्थिति, नगर पालिका द्वारा किए जा रहे सुधारात्मक प्रयास, टैंकर व्यवस्था, खराब पाइपलाइनों की मरम्मत तथा नागरिकों को राहत देने के संबंध में प्रश्न किए गए।CMO ने अपनी ओर से व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के प्रयासों की जानकारी दी, जिसे मौके पर मौजूद लोगों ने रिकॉर्ड किया।CMO की यह रिकॉर्डेड प्रतिक्रिया बाद में पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी गई, क्योंकि इससे यह धारणा मजबूत हुई कि नारेबाजी के साथ-साथ अधिकारियों की बाइट लेकर एक संपूर्ण वीडियो पैकेज तैयार किया जा रहा था।
नारे, रिकॉर्डिंग, बाइट और फोटो—क्रमवार चला पूरा घटनाक्रम
मौजूद लोगों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम में एक क्रम स्पष्ट दिखाई दिया—
पहले नारेबाजी,
फिर वीडियो रिकॉर्डिंग,
उसके बाद सवाल-जवाब,
फिर अधिकारियों की प्रतिक्रिया,
और अंत में फोटोग्राफी।
इस क्रम ने कई लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या यह सब स्वतःस्फूर्त था या फिर पहले से तय रणनीति के तहत संचालित किया गया।स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह प्रवृत्ति देखने में आ रही है कि कुछ जनप्रतिनिधि विरोध प्रदर्शन के साथ-साथ स्वयं ही वीडियो सामग्री तैयार कर उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, व्हाट्सएप समूहों और चुनिंदा मीडिया माध्यमों तक पहुंचाने का काम करते हैं। रविवार को कलेक्ट्रेट परिसर में जो दृश्य सामने आया, उसने इस धारणा को और मजबूत कर दिया।
पेयजल संकट के बीच प्रचार की राजनीति पर उठे सवाल
शहर के अनेक वार्ड इन दिनों गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। कहीं दो-दो दिन तक नलों में पानी नहीं पहुंच रहा, तो कहीं देर रात जलापूर्ति होने से नागरिकों को रातभर जागना पड़ रहा है। महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे पानी के इंतजार में परेशान हैं। नागरिकों की पहली अपेक्षा प्रशासनिक राहत और जल समस्या का समाधान है।ऐसे समय में जब पेयजल संकट शहर का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है, बैठक के बाद कलेक्ट्रेट परिसर में हुई नारेबाजी, मोबाइल रिकॉर्डिंग और बाइट संकलन की इस राजनीतिक सक्रियता ने लोगों के बीच यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या समस्या के समाधान से अधिक महत्व अब उसके दृश्यात्मक प्रदर्शन और प्रचार को दिया जाने लगा है।
स्थानीय राजनीति की बदलती कार्यशैली
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर अब विरोध प्रदर्शन का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले ज्ञापन और नारेबाजी तक सीमित रहने वाले कार्यक्रम अब वीडियो कवरेज, तत्काल बयान, सोशल मीडिया क्लिप और प्रचार सामग्री के रूप में भी तैयार किए जा रहे हैं। इससे जनसमस्या का मुद्दा तो सामने आता है, लेकिन उसके साथ राजनीतिक छवि निर्माण का तत्व भी उतनी ही मजबूती से जुड़ जाता है। दमोह कलेक्ट्रेट परिसर में रविवार को दिखाई दिया यह दृश्य इसी बदलती कार्यशैली का उदाहरण माना जा रहा है, जहां प्रशासनिक बैठक के बाद कुछ ही मिनटों में पूरा परिसर राजनीतिक मीडिया मंच में तब्दील होता नजर आया।
चर्चाओं में रहा पूरा मामला
रविवार शाम से ही शहर के विभिन्न सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में यह घटनाक्रम चर्चा का विषय बना हुआ है। लोगों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि पेयजल संकट जैसी गंभीर समस्या के समाधान की दिशा में ठोस प्रयास ज्यादा महत्वपूर्ण हैं या फिर उसके बाद कैमरे के सामने आक्रोश की पैकेजिंग।फिलहाल इतना तय है कि कलेक्ट्रेट परिसर में हुई यह नारेबाजी और सुनियोजित रिकॉर्डिंग अभियान स्थानीय राजनीति की नई शैली को उजागर कर गया है, जिसमें जनमुद्दा, विरोध प्रदर्शन और मीडिया प्रस्तुतीकरण तीनों एक साथ चलते दिखाई दे रहे हैं।
