1948 में सराफा व्यापारियों ने रखी थी धार्मिक परंपरा की नींव, स्वर्ण-रजत आभूषणों से सुसज्जित माँ महाकाली का अलौकिक स्वरूप बना आकर्षण का केंद्र
नौ दिनों तक दुर्गा सप्तशती पाठ, शतचंडी अनुष्ठान और महाआरती से गूंजता है परिसर, पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा बनी दमोह की धार्मिक पहचान
दमोह, शुक्रवार 16 अक्टूबर 2026मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक नगर दमोह में धार्मिक आस्था, सनातन संस्कृति और सामाजिक समरसता की अनेक परंपराएं पीढ़ियों से जीवंत हैं। इन्हीं में एक विशिष्ट स्थान है नगर के महाकाली चौराहे पर विराजमान माँ महाकाली का, जहां वर्ष 1948 से चली आ रही प्रतिमा स्थापना की परंपरा आज भी उसी श्रद्धा, विश्वास और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। नवरात्रि के अवसर पर यहां स्थापित होने वाली माँ की विशाल एवं भव्य प्रतिमा केवल धार्मिक आयोजन का केंद्र नहीं, बल्कि नगरवासियों की भावनाओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन चुकी है।माँ महाकाली के दर्शन के लिए नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। आकर्षक श्रृंगार, भव्य सजावट, वैदिक मंत्रोच्चार और माँ के जयकारों से संपूर्ण क्षेत्र भक्तिमय हो उठता है। विशेष बात यह है कि इस आयोजन को आगे बढ़ाने में अनेक परिवारों की कई पीढ़ियों का योगदान रहा है।
सराफा व्यापारियों से प्रारंभ हुई परंपरा ने लिया विराट स्वरूप
महाकाली उत्सव समिति के अध्यक्ष पं. प्रहलाद प्रसाद अवस्थी बताते हैं कि इस धार्मिक आयोजन की शुरुआत वर्ष 1948 में नगर के सराफा व्यापारियों द्वारा माँ महाकाली की प्रतिमा स्थापित करने के साथ हुई थी। उस समय सीमित संसाधनों और सामूहिक सहयोग से शुरू हुआ आयोजन समय के साथ दमोह की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल हो गया।प्रारंभिक वर्षों में स्वर्गीय राज बहादुर राय, स्वर्गीय कालूराम सोनी सहित अनेक धर्मप्रेमियों ने इस आयोजन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में समिति के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय सुभाष राय और उनके सहयोगियों ने इस परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान की।
आज 79वें वर्ष में पहुंच चुकी यह गौरवशाली यात्रा उन लोगों के समर्पण की कहानी भी है, जिन्होंने बदलते समय और परिस्थितियों के बावजूद माँ की प्रतिमा स्थापना की परंपरा को कभी रुकने नहीं दिया।समिति के अनुसार आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से अधिक सामूहिक आस्था और सेवा को महत्व दिया जाता है। यही कारण है कि बुजुर्गों से मिली धार्मिक विरासत को युवा पीढ़ी भी पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रही है।
स्वर्ण और रजत आभूषणों से होता है माँ का भव्य श्रृंगार
महाकाली चौराहे पर स्थापित माँ की प्रतिमा का स्वरूप और श्रृंगार श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रहता है। माँ को स्वर्ण एवं रजत आभूषणों से अलंकृत किया जाता है। भव्य मुकुट, आकर्षक आभूषण, मनोहारी सजावट और प्रकाश व्यवस्था से माँ का दरबार अत्यंत मनोहारी दिखाई देता है।माँ के आभूषणों की सुरक्षा को लेकर भी विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं। समिति के अनुसार नवरात्रि के नौ दिनों तक प्रशासन द्वारा चौबीस घंटे सशस्त्र सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है। इसके अतिरिक्त समिति के स्वयंसेवक भी रात्रि में जागरण करते हुए सुरक्षा, श्रद्धालुओं की सुविधा और आयोजन संबंधी व्यवस्थाओं में सहयोग देते हैं।यहां सेवा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए माँ का दरबार केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि निःस्वार्थ सेवा और समर्पण का केंद्र भी है।
नौ दिनों तक वैदिक मंत्रों और दुर्गा सप्तशती के पाठ से गूंजता है दरबार
माँ महाकाली के इस आयोजन की एक प्रमुख विशेषता नौ दिनों तक चलने वाले धार्मिक अनुष्ठान हैं। आचार्य पं. चंद्रगोपाल पौराणिक के मार्गदर्शन में विद्वान आचार्यों द्वारा प्रतिदिन शाम चार बजे से सामूहिक श्री दुर्गा पाठ एवं शतचंडी अनुष्ठान संपन्न कराया जाता है।दुर्गा सप्तशती के मंत्र, विधिवत पूजन, हवन और माँ की आराधना से वातावरण में विशेष आध्यात्मिक अनुभूति होती है। इन अनुष्ठानों में श्रद्धालु परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य, शांति और मंगल की कामना के साथ सहभागिता करते हैं।विशेष रूप से हवन के उपरांत वितरित किए जाने वाले अभिमंत्रित गंडे के प्रति भक्तों में गहरी आस्था है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार श्रद्धालु इसे माँ के आशीर्वाद का प्रतीक मानते हैं। इसे प्राप्त करने के लिए दूरस्थ क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।
सप्तमी की महाआरती और छप्पन भोग का विशेष महत्व
नवरात्रि के दौरान माँ की नियमित पूजा-अर्चना एवं आरती का दायित्व पुजारी पं. राजेश तिवारी निभाते हैं। आरती के समय माँ के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति रहती है।शंख, घंटा-घड़ियाल और माँ के जयकारों के बीच जब दीपों से आरती उतारी जाती है, तो पूरा महाकाली चौराहा श्रद्धा और भक्ति के रंग में रंग जाता है।नवरात्रि की सप्तमी तिथि इस आयोजन में विशेष महत्व रखती है। इस अवसर पर माँ की भव्य महाआरती के साथ छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं। आकर्षक सजावट, धार्मिक अनुष्ठान और सामूहिक आराधना के कारण इस दिन श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह दिखाई देता है।महाआरती के पश्चात प्रसाद वितरण किया जाता है। इस आयोजन में महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों और बच्चों की सहभागिता इसकी व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता को भी दर्शाती है।
जिन परिवारों ने संभाली विरासत, आज भी निभा रहे सेवा का दायित्व
करीब आठ दशकों से चली आ रही इस धार्मिक परंपरा को जीवंत बनाए रखने में अनेक परिवारों और श्रद्धालुओं का योगदान रहा है। वर्तमान में समिति के साथ वीरेंद्र राय, रंजीत राय और शिवम राय सहित अनेक सहयोगी आयोजन की व्यवस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।प्रतिमा स्थापना, श्रृंगार, धार्मिक अनुष्ठान, श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा, प्रसाद वितरण और विसर्जन तक प्रत्येक व्यवस्था सामूहिक सहयोग से संचालित होती है।इस आयोजन की विशेषता केवल इसकी भव्यता नहीं, बल्कि वह सामाजिक एकजुटता है, जिसके माध्यम से विभिन्न आयु वर्गों के लोग एक उद्देश्य के लिए साथ आते हैं।पुरानी पीढ़ी के अनुभव और नई पीढ़ी के उत्साह का यही संगम इस धार्मिक विरासत को निरंतर आगे बढ़ा रहा है।
केवल चौराहा नहीं, दमोह की सांस्कृतिक स्मृतियों का जीवंत केंद्र
महाकाली चौराहा आज नगर की धार्मिक पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है। वर्षों से यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए माँ के दर्शन एक आत्मीय अनुभव हैं। अनेक परिवार ऐसे हैं, जिनकी कई पीढ़ियां नवरात्रि में माँ के दरबार में उपस्थित होती रही हैं।समय के साथ नगर का स्वरूप बदला, बाजारों का विस्तार हुआ और सामाजिक जीवन में अनेक परिवर्तन आए, लेकिन माँ महाकाली के प्रति श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहा।
वर्ष 1948 में कुछ धर्मप्रेमियों द्वारा प्रारंभ की गई प्रतिमा स्थापना की परंपरा आज हजारों श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ चुकी है। यह आयोजन इस बात का उदाहरण है कि जब किसी धार्मिक परंपरा के साथ समाज की सामूहिक आस्था और सेवा भावना जुड़ जाती है, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य विरासत बन जाती है।महाकाली चौराहे की यह 79 वर्षों की यात्रा केवल एक उत्सव का इतिहास नहीं, बल्कि दमोह की धार्मिक चेतना, सामाजिक एकता और सनातन संस्कृति के प्रति अटूट विश्वास की जीवंत गाथा है।माँ के दरबार में गूंजता जयघोष मानो यही संदेश देता है कि आस्था की वह ज्योति, जो 1948 में प्रज्वलित हुई थी, आज भी जनमानस के हृदय में उसी श्रद्धा और समर्पण के साथ प्रकाशमान है।
