खेडीघाट/”माँ नर्मदा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति, आस्था, सभ्यता और जीवनधारा की प्रतीक हैं। उनका संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय कर्तव्य भी है।”
इन्हीं प्रेरणादायी विचारों के साथ खेडीघाट में माँ नर्मदा सेवा संगम का भव्य शुभारंभ श्रद्धा, सेवा और पर्यावरण संरक्षण के संकल्प के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश सोनी, प्रांत संघचालक डॉ. प्रकाश शास्त्री तथा परम पूज्य प्रकाशानंद महाराज (बागदी संगम) सहित अनेक संत, समाजसेवी, पर्यावरण प्रेमी एवं सेवा कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता एवं माँ नर्मदा के विग्रह का वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजन, दीप प्रज्वलन तथा सामूहिक रूप से नर्मदा अष्टक के पाठ के साथ हुआ। संपूर्ण वातावरण धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक ऊर्जा और सेवा भावना से ओत-प्रोत दिखाई दिया। उपस्थित लोगों ने माँ नर्मदा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके संरक्षण एवं संवर्धन का सामूहिक संकल्प लिया।
मालवा प्रांत के माँ नर्मदा तट से जुड़े छह जिलों से बड़ी संख्या में सामाजिक संगठनों, सेवा संस्थाओं, सेवा पथिकों, नर्मदा सेवा कार्य से जुड़े स्वयंसेवकों तथा वर्षों से नर्मदा तट पर सेवा कार्य कर रहे समाजसेवियों ने इस संगम में सहभागिता की। विभिन्न जिलों से आए कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में चल रहे सेवा कार्यों की जानकारी साझा करते हुए अनुभवों का आदान-प्रदान किया।
कार्यक्रम के दौरान उन सेवा कार्यकर्ताओं का विशेष सम्मान किया गया, जो नर्मदा परिक्रमा मार्ग के दुर्गम क्षेत्रों जैसे शूलपानी झाड़ी और लक्कड़ कोड के जंगलों में वर्षों से निस्वार्थ भाव से परिक्रमावासियों की सेवा कर रहे हैं। इन सेवाव्रतियों द्वारा श्रद्धालुओं के लिए अन्न एवं जल की व्यवस्था, चाय वितरण, प्राथमिक चिकित्सा, मार्गदर्शन, मार्ग अवरोधों को हटाने, घाटों की स्वच्छता, आटे के दीपक निर्माण, वृक्षारोपण तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे कार्य लगातार किए जा रहे हैं। मंचासीन अतिथियों ने उन्हें माँ नर्मदा का चित्र, सम्मान पत्र, शाल एवं श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया तथा उनके सेवा भाव की सराहना की।
माँ नर्मदा सेवा कार्य, मालवा प्रांत की कार्ययोजना, भौगोलिक विस्तार एवं आगामी कार्यक्रमों का विस्तृत प्रतिवेदन प्रांत प्रमुख राजेंद्र सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने बताया कि नर्मदा संरक्षण के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी ही इस अभियान को सफल बना सकती है। उन्होंने प्रत्येक जिले एवं घाट स्तर पर सेवा गतिविधियों को संगठित रूप से संचालित करने की रूपरेखा भी प्रस्तुत की।
अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में सुरेश सोनी ने कहा कि माँ नर्मदा भारतीय संस्कृति की जीवंत धरोहर हैं। नर्मदा केवल जलधारा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, जीवन, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का आधार हैं। उन्होंने कहा कि नर्मदा संरक्षण को केवल एक अभियान नहीं बल्कि जनभागीदारी से जुड़े व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप दिया जाना चाहिए।
उन्होंने माँ नर्मदा सेवा कार्य के छह प्रमुख आयामों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि श्रद्धा जागरण, नर्मदा परिक्रमा पथ सेवा, जैविक खेती, आदर्श घाट निर्माण, सामाजिक जागरण तथा पर्यावरण संरक्षण को एक साथ लेकर चलना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि समाज इन छह क्षेत्रों में संगठित होकर कार्य करेगा तो माँ नर्मदा की निर्मलता और अविरलता लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकेगी।
उन्होंने वृक्षारोपण को जल संरक्षण का सबसे प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि नर्मदा तटों पर अधिक से अधिक पौधारोपण किया जाना चाहिए। साथ ही नदी किनारों को प्लास्टिक मुक्त बनाने, जल स्रोतों के संरक्षण, जैविक खेती को बढ़ावा देने तथा रासायनिक प्रदूषण को रोकने के लिए व्यापक जनजागरण चलाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और जीवनदायिनी नर्मदा सौंपना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने नर्मदा परिक्रमा करने वाले श्रद्धालुओं की सेवा को राष्ट्रसेवा का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए कहा कि परिक्रमा मार्ग पर भोजन, पेयजल, स्वास्थ्य सहायता, विश्राम, स्वच्छता तथा सुरक्षा जैसी सुविधाओं के लिए समाज को आगे आना चाहिए। सेवा का यह भाव भारतीय संस्कृति की पहचान है और यही समाज को जोड़ने का सबसे सशक्त माध्यम भी है।
कार्यक्रम में उपस्थित संतों एवं वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि नर्मदा संरक्षण केवल पर्यावरणीय अभियान नहीं बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अभियान है। उन्होंने जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग तथा प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवनशैली अपनाने का संदेश दिया।
संगम में शामिल सभी कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में किए जा रहे सेवा कार्यों के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि नर्मदा तटों की स्वच्छता, पौधारोपण, परिक्रमावासियों की सेवा, ग्रामीण क्षेत्रों में जनजागरण तथा जल संरक्षण के लिए निरंतर अभियान चलाए जा रहे हैं। आगामी समय में इन गतिविधियों को और अधिक व्यापक एवं संगठित स्वरूप देने पर भी सहमति बनी।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर उपस्थित सभी कार्यकर्ताओं ने सामूहिक रूप से माँ नर्मदा की निर्मलता, अविरलता और पवित्रता बनाए रखने का संकल्प लिया। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, व्यापक वृक्षारोपण, प्लास्टिक मुक्त घाट, जैविक खेती के विस्तार तथा समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए निरंतर सेवा कार्य करने का संकल्प दोहराया।
माँ नर्मदा सेवा संगम केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सेवा, संस्कार, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सहभागिता का ऐसा प्रेरणादायी मंच बनकर उभरा, जिसने यह संदेश दिया कि यदि समाज संगठित होकर प्रकृति और संस्कृति के संरक्षण का संकल्प ले, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए माँ नर्मदा जैसी अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखा जा सकता है।
