दमोह की दो आधार आईडी से कई राज्यों में बने दस्तावेज, अफगानी घुसपैठियों तक पहुंची जांच की कड़ियां
एफआईआर दर्ज, रिकॉर्ड मिले, लेकिन 13 माह बाद भी आरोपी अज्ञात; पुलिस जांच की रफ्तार पर उठ रहे सवाल
(डॉ. एल.एन. वैष्णव)
दमोह 31 may 2026/ देश की सबसे बड़ी पहचान प्रणाली आधार (Aadhaar) से जुड़े एक गंभीर मामले ने एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। दमोह जिले से सामने आए कथित आधार आईडी दुरुपयोग प्रकरण में 13 माह बीत जाने के बाद भी जांच किसी निर्णायक निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी है, जबकि उपलब्ध रिकॉर्ड और प्रारंभिक जांच कई चौंकाने वाले संकेत दे चुके हैं।
मामला केवल फर्जी आधार कार्ड या दस्तावेजों का नहीं है, बल्कि उन परिस्थितियों का है जिनमें दमोह से संचालित आधार आईडी के माध्यम से विभिन्न राज्यों में आधार सत्यापन और दस्तावेज निर्माण की गतिविधियां सामने आईं। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि जबलपुर में पकड़े गए पांच अफगानी नागरिकों में से दो के दस्तावेजों का ई-आधार सत्यापन दमोह डाकघर से होने की जानकारी भी जांच के दायरे में रही है।
अफगानी घुसपैठियों से जुड़ी कड़ियां

फरवरी माह में जबलपुर में पकड़े गए पांच अफगानी नागरिकों के मामले ने पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी थी। जांच में सामने आया कि इनमें से कुछ व्यक्तियों के पास ऐसे दस्तावेज थे जिनका आधार सत्यापन भारतीय पहचान प्रणाली के जरिए किया गया था।
जानकारी के अनुसार अफगानिस्तान निवासी सोहबत खान वर्ष 2015 में अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने के बाद मध्यप्रदेश पहुंचा और कथित रूप से फर्जी दस्तावेज तैयार कराए। जांच एजेंसियों के सामने यह तथ्य भी आया कि उसके माध्यम से अन्य अफगानी नागरिकों के दस्तावेज भी तैयार किए गए।
इन मामलों में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी आधार पहचान प्रणाली को माना जा रहा है, क्योंकि बिना आधार आधारित पहचान के कई अन्य दस्तावेजों की प्रक्रिया आगे बढ़ना कठिन होती है।
आखिर किसका था वह अंगूठा?
मामले में सबसे बड़ा और रहस्यमय सवाल उस बायोमेट्रिक पहचान को लेकर है जिसके आधार पर आधार सत्यापन और दस्तावेजी प्रक्रिया संचालित होने के आरोप सामने आए।
स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय यह भी है कि यदि किसी बायोमेट्रिक डेटा का दुरुपयोग हुआ, तो वह कैसे हुआ? क्या किसी व्यक्ति की पहचान का क्लोन तैयार किया गया? क्या किसी अधिकृत प्रणाली का दुरुपयोग हुआ? या फिर तकनीकी स्तर पर कोई बड़ी सेंध लगी?
हालांकि इन प्रश्नों का आधिकारिक उत्तर अभी तक सामने नहीं आया है।
क्या था पूरा मामला?
सूत्रों के अनुसार पिछले वर्ष जिला प्रशासन को गोपनीय शिकायत प्राप्त हुई थी कि दमोह जिले की कुछ आधार ऑपरेटर आईडी सीमावर्ती राज्यों और अन्य प्रदेशों में उपयोग की जा रही हैं।
इसके बाद उच्च स्तर पर रिकॉर्ड मंगाए गए और जांच शुरू हुई।
जांच में कथित रूप से दो आधार स्टेशन आईडी सामने आईं—
- आईडी क्रमांक 29026
- आईडी क्रमांक 29832
इनमें से एक आईडी के उपयोग के रिकॉर्ड कई राज्यों और जिलों में मिलने की बात सामने आई।
कई राज्यों तक पहुंचा नेटवर्क
जांच के दौरान जिन क्षेत्रों में संबंधित आईडी के संचालन के संकेत मिले, उनमें शामिल बताए जाते हैं—
मध्यप्रदेश
- सागर
- पन्ना
- छिंदवाड़ा
- सतना
- छतरपुर
- सीधी
- शहडोल
- जबलपुर
- कटनी
पश्चिम बंगाल
- मालदा
- कलियाचक
- कूचबिहार
- उत्तर दिनाजपुर
- पश्चिम मेदिनीपुर
- दार्जिलिंग
- पुरुलिया
- बांकुरा
- झाड़ग्राम
बिहार
- किशनगंज
- कटिहार
- पूर्णिया
- अररिया
- मधेपुरा
- सहरसा
- खगड़िया
अन्य क्षेत्र
- दक्षिण-पश्चिम दिल्ली
- बीकानेर (राजस्थान)
- पानीपत (हरियाणा)
- पूर्वी सिंहभूम (झारखंड)
यदि जांच रिकॉर्ड सही हैं तो यह मामला केवल एक जिले की अनियमितता नहीं बल्कि बहु-राज्यीय गतिविधि का संकेत देता है।
कलेक्टर ने लिखी थी एफआईआर की अनुशंसा
मामले की प्रारंभिक जांच में तथ्यों को गंभीर मानते हुए तत्कालीन जिला प्रशासन द्वारा पुलिस अधीक्षक को कार्रवाई के लिए पत्र भेजा गया था।
इसके बाद सिटी कोतवाली थाना में अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया गया।
एफआईआर दर्ज होने के बाद उम्मीद थी कि तकनीकी जांच के आधार पर जल्द ही जिम्मेदार लोगों तक पहुंचा जाएगा, लेकिन एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी मामला ‘अज्ञात आरोपी’ की स्थिति में बना हुआ है।
जांच अटकी या उलझाई गई?
मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या जांच को आवश्यक गंभीरता मिली?
कुछ जानकारों का कहना है कि मामले को केवल साइबर फ्रॉड की दिशा में सीमित कर देखने का प्रयास किया गया, जबकि इसमें पहचान प्रणाली, दस्तावेज सत्यापन और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलू भी मौजूद थे।
यदि किसी आधार ऑपरेटर आईडी का उपयोग विभिन्न राज्यों में हुआ, तो यह सामान्य तकनीकी त्रुटि का विषय नहीं माना जा सकता।
राष्ट्रीय सुरक्षा का पहलू क्यों महत्वपूर्ण?
आधार अब केवल पहचान पत्र नहीं है। बैंकिंग, मोबाइल सिम, सरकारी योजनाएं, वित्तीय लेन-देन, पासपोर्ट सत्यापन और अनेक सरकारी प्रक्रियाओं में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
ऐसे में यदि आधार प्रणाली से जुड़े किसी कथित दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।
विशेषज्ञों का मानना है कि पहचान प्रणाली में सेंध का अर्थ है पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना।
जनता पूछ रही है पांच बड़े सवाल
- आखिर 13 माह बाद भी आरोपी अज्ञात क्यों हैं?
- क्या जांच में सभी तकनीकी पहलुओं की पड़ताल की गई?
- क्या मामले को उच्च स्तरीय एजेंसी को सौंपने पर विचार हुआ?
- यदि रिकॉर्ड उपलब्ध हैं तो जिम्मेदार लोगों तक पहुंचने में देरी क्यों?
- क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई नई निगरानी व्यवस्था बनाई जाएगी?
सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी
दमोह का यह मामला अब केवल एक एफआईआर या प्रशासनिक जांच का विषय नहीं रह गया है। यह सवाल व्यवस्था की पारदर्शिता, जवाबदेही और सुरक्षा तंत्र की प्रभावशीलता से जुड़ चुका है।
एक साल बाद भी यदि आरोपी अज्ञात हैं, जांच अधूरी है और सवालों के जवाब नहीं मिले हैं, तो स्वाभाविक रूप से लोगों की निगाहें अब उन एजेंसियों पर टिक गई हैं जिन्हें सच सामने लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
क्योंकि मामला केवल आधार कार्ड का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जिस पर देश की पूरी पहचान व्यवस्था टिकी हुई है।
