दमोह में तीन दिवसीय कार्यशाला के दूसरे दिन शिक्षकों को स्वावलंबन, कौशल विकास और मातृभाषा आधारित शिक्षा के महत्व से कराया गया अवगत

दमोह, 7 मई 2026/मध्यप्रदेश के जिला मुख्यालय स्थित संयुक्त कलेक्ट्रेट भवन के डीपीसी कार्यालय सभा कक्ष में विजयवर्धन संस्थान द्वारा आयोजित तीन दिवसीय “नवीन शिक्षण पद्धति 2020” आधारित कार्यशाला का दूसरा दिन गुरुवार को गंभीर शैक्षणिक विमर्श, नवाचारपूर्ण विचारों और शिक्षकों की सक्रिय सहभागिता के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यशाला में जिलेभर से आए जन शिक्षक, बीआरसी, शिक्षाविद, शिक्षा विभाग के अधिकारी एवं विभिन्न विद्यालयों के शिक्षक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। पूरे आयोजन के दौरान नई शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्यों, भारतीय शिक्षा परंपरा, मातृभाषा आधारित शिक्षण, कौशल विकास, स्वावलंबन एवं व्यवहारिक शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि जिला पंचायत अध्यक्ष Ranjita Gaurav Patel ने दीप प्रज्वलन कर कार्यशाला का शुभारंभ किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति 2020 देश की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और ऐतिहासिक परिवर्तन लाने वाली नीति है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर, संस्कारित, व्यवहारिक एवं राष्ट्र निर्माण में सहभागी नागरिक बनाना है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में शिक्षा को केवल डिग्री प्राप्ति का माध्यम मानना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो विद्यार्थियों को जीवन की चुनौतियों से लड़ने, रोजगार प्राप्त करने, तकनीकी रूप से दक्ष बनने और सामाजिक जिम्मेदारियों को समझने में सक्षम बनाए। नई शिक्षा नीति इसी सोच के साथ तैयार की गई है, जिसमें विद्यार्थियों के समग्र विकास पर विशेष जोर दिया गया है।
शिक्षक ही समाज निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति
Ranjita Gaurav Patel ने कहा कि शिक्षक समाज निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। यदि शिक्षक सकारात्मक सोच, नवीन प्रयोग और समर्पण भावना के साथ कार्य करेंगे तो आने वाली पीढ़ी अधिक जागरूक, संवेदनशील और सक्षम बनेगी। उन्होंने कहा कि विद्यालय केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि संस्कार निर्माण का भी माध्यम है। इसलिए शिक्षकों को विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने मातृभाषा एवं स्थानीय भाषाओं में शिक्षा देने के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि बच्चे अपनी भाषा में अधिक सहजता से सीखते और समझते हैं। नई शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिकता देना भारतीय संस्कृति और स्थानीय ज्ञान परंपरा को सशक्त बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।
शिक्षकों ने रखीं समस्याएं, समाधान का मिला आश्वासन
कार्यक्रम के दौरान जिला पंचायत अध्यक्ष ने जन शिक्षकों एवं बीआरसी से सीधा संवाद भी किया। शिक्षकों ने विद्यालयों में संसाधनों की कमी, प्रशिक्षण व्यवस्था, प्रशासनिक दबाव, डिजिटल संसाधनों की आवश्यकता तथा ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा संबंधी चुनौतियों को उनके समक्ष रखा। उन्होंने सभी समस्याओं को गंभीरता से सुनते हुए यथासंभव समाधान कराने का आश्वासन दिया। उनके सहज संवाद और सकारात्मक दृष्टिकोण से उपस्थित शिक्षकों में उत्साह और विश्वास दिखाई दिया।
नई शिक्षा नीति केवल पाठ्यक्रम परिवर्तन नहीं : डॉ. असलम खान

कार्यशाला में शासकीय कमला नेहरू महिला महाविद्यालय के सहायक प्राध्यापक Dr. Aslam Khan ने नवीन शिक्षण पद्धति की बारीकियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति केवल पाठ्यक्रम में बदलाव भर नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों की सोच, समझ, व्यक्तित्व और व्यवहारिक क्षमता को विकसित करने की व्यापक प्रक्रिया है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास कराना नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों में तार्किक क्षमता, सृजनात्मकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नैतिक मूल्यों का विकास करना भी आवश्यक है। उन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे शिक्षकों के प्रश्नों के उत्तर देते हुए नई शिक्षा नीति को व्यवहारिक रूप से लागू करने के सुझाव भी दिए।
डॉ. खान ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि बदलते समय के साथ शिक्षकों को भी अपनी शिक्षण पद्धति में परिवर्तन लाना होगा। विद्यार्थियों को रटने की बजाय समझने और प्रयोग करने की दिशा में प्रेरित करना समय की आवश्यकता है।
भारतीय शिक्षा परंपरा और आधुनिकता का समन्वय : डॉ. राजेश पौराणिक
सहायक प्राध्यापक Dr. Rajesh Pauranik ने अपने संबोधन में भारतीय शिक्षा परंपरा और आधुनिक शिक्षा प्रणाली के बीच संबंधों को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था ज्ञान, संस्कृति, नैतिकता और व्यवहारिक जीवन का अद्भुत समन्वय थी। नई शिक्षा नीति उसी परंपरा को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप आगे बढ़ाने का प्रयास है।
उन्होंने उदाहरणों एवं प्रमाणों के माध्यम से बताया कि स्थानीय ज्ञान, क्षेत्रीयता और मातृभाषा आधारित शिक्षण विद्यार्थियों के बौद्धिक एवं मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि विद्यार्थी अपनी संस्कृति और स्थानीय परिवेश से जुड़कर शिक्षा प्राप्त करेंगे तो उनका आत्मविश्वास और समझ दोनों मजबूत होंगे।
उन्होंने विजयवर्धन संस्थान द्वारा आयोजित इस कार्यशाला की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम शिक्षकों को नई सोच, नई तकनीक और नवीन कार्यपद्धति अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने उपस्थित शिक्षकों एवं बीआरसी द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भी विस्तारपूर्वक दिए।
कार्यशाला की रूपरेखा और उद्देश्य पर हुई चर्चा
कार्यक्रम में Jinendra Jain ने कार्यशाला की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए प्रशिक्षण सत्रों, उद्देश्यों एवं गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों को नई शिक्षा नीति 2020 के मूल सिद्धांतों एवं व्यवहारिक पक्षों से परिचित कराना है, ताकि विद्यालय स्तर पर इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में लगातार हो रहे बदलावों को समझना और नई तकनीकों को अपनाना आज समय की आवश्यकता बन चुका है। वहीं Kiran Upadhyay सहयोगी के रूप में पूरे आयोजन में सक्रिय रूप से उपस्थित रहीं और व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शिक्षकों में दिखा उत्साह, बोले- ऐसे प्रशिक्षण जरूरी
पूरे कार्यक्रम के दौरान शिक्षकों में नई शिक्षा नीति एवं नवीन शिक्षण पद्धति को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला। सहभागियों ने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं शिक्षकों को नवीन शैक्षणिक दृष्टिकोण प्रदान करने के साथ-साथ विद्यार्थियों के समग्र विकास के लिए नई दिशा देती हैं। शिक्षकों ने माना कि नई शिक्षा नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए लगातार प्रशिक्षण, संवाद और नवाचार आधारित गतिविधियों की आवश्यकता है।
