वैज्ञानिक एवं तार्किक आधार पर कानून बनाने की आवश्यकता : अनूप नायर
(डॉ. एल.एन. वैष्णव)
दमोह, 4 जून 2026। मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के संबंध में अध्ययन एवं परीक्षण हेतु गठित उच्च स्तरीय समिति द्वारा गुरुवार को दमोह में जन-परामर्श बैठक आयोजित की गई। पी.एम. श्री कॉलेज के सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में समिति सदस्य एवं विधि विशेषज्ञ अनूप नायर ने नागरिकों, शिक्षाविदों, अधिवक्ताओं, जनप्रतिनिधियों तथा विभिन्न समाजों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद किया।
क्या है समान नागरिक संहिता (UCC)?
समान नागरिक संहिता अर्थात यूनिफॉर्म सिविल कोड (Uniform Civil Code) एक ऐसी कानूनी व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और पारिवारिक संबंधों से जुड़े कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे उनका धर्म या समुदाय कोई भी हो। वर्तमान में भारत में इन विषयों पर विभिन्न धार्मिक समुदायों के अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं।
इसे लागू करने के पीछे क्या है मंशा?
समान नागरिक संहिता का उद्देश्य धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों में समानता स्थापित करना बताया जाता है। इसके समर्थकों का मानना है कि इससे महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों को अधिक न्याय और सुरक्षा मिलेगी। साथ ही अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण उत्पन्न होने वाली कानूनी जटिलताओं को कम करने, न्यायिक प्रक्रिया को सरल बनाने तथा संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
संविधान में पहले से है प्रावधान
बैठक को संबोधित करते हुए अनूप नायर ने कहा कि समान नागरिक संहिता का विषय नया नहीं है। संविधान निर्माण के दौरान संविधान सभा में इस पर व्यापक चर्चा हुई थी। डॉ. भीमराव आंबेडकर एवं के.एम. मुंशी सहित कई सदस्यों ने इसका समर्थन किया था। बाद में इसे संविधान के नीति निदेशक तत्वों में शामिल करते हुए अनुच्छेद-44 के रूप में स्थान दिया गया।
उन्होंने कहा कि अनुच्छेद-44 राज्य को यह प्रयास करने का निर्देश देता है कि सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू की जा सके।
अलग-अलग समुदायों के लिए अलग कानून

अनूप नायर ने कहा कि वर्तमान समय में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार एवं दत्तक ग्रहण जैसे विषयों पर विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग कानून लागू हैं। इससे कई बार समान परिस्थितियों में भी अलग-अलग नागरिकों को अलग कानूनी अधिकार प्राप्त होते हैं।
उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य किसी धर्म विशेष को प्रभावित करना नहीं, बल्कि नागरिकों के लिए समान अधिकार आधारित कानूनी व्यवस्था विकसित करना है।
महिलाओं और बच्चों पर सबसे अधिक प्रभाव
समिति सदस्य ने कहा कि वर्तमान व्यक्तिगत कानूनों का प्रभाव सबसे अधिक महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है। समय-समय पर हुए कानूनी सुधारों का उद्देश्य भी महिलाओं को अधिक अधिकार और सुरक्षा प्रदान करना रहा है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि महिलाओं को पैतृक संपत्ति में अधिकार दिए जाने तथा तीन तलाक जैसी प्रथाओं को समाप्त करने जैसे निर्णय सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम रहे हैं।
इन विषयों पर मांगे जा रहे सुझाव
समिति विशेष रूप से निम्न विषयों पर सुझाव प्राप्त कर रही है—
- विवाह एवं विवाह पंजीकरण
- विवाह विच्छेद (तलाक)
- भरण-पोषण
- उत्तराधिकार एवं संपत्ति अधिकार
- दत्तक ग्रहण
- लिव-इन रिलेशनशिप
इन विषयों पर प्राप्त सुझावों का अध्ययन कर समिति अपनी अनुशंसाएं तैयार करेगी।
नागरिकों से सुझाव देने की अपील
अनूप नायर ने बताया कि इच्छुक नागरिक जन-परामर्श बैठकों में सीधे सुझाव दे सकते हैं, लिखित रूप में अपने विचार समिति को सौंप सकते हैं तथा ucc.mp.gov.in पोर्टल के माध्यम से भी सुझाव भेज सकते हैं।
उन्होंने कहा कि समिति द्वारा प्राप्त प्रत्येक सुझाव का गंभीरता से अध्ययन किया जाएगा और व्यापक विचार-विमर्श के बाद अंतिम रिपोर्ट राज्य शासन को सौंपी जाएगी।
नागरिकों ने भी रखे अपने विचार
बैठक के दौरान विभिन्न समाजों के प्रतिनिधियों, अधिवक्ताओं, शिक्षाविदों एवं नागरिकों ने समान नागरिक संहिता के सामाजिक, संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किए। कई वक्ताओं ने महिलाओं के अधिकार, पारिवारिक कानून, उत्तराधिकार व्यवस्था तथा सामाजिक समरसता से जुड़े मुद्दों पर सुझाव प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम में विभिन्न सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं, अधिवक्ताओं, शिक्षाविदों, मीडिया प्रतिनिधियों, जनप्रतिनिधियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
