वायरल वीडियो के बाद शिक्षिका वंदना भोज को नोटिस, हटा एसडीएम करेंगे जांच; जिला शिक्षा अधिकारी ने पूर्व की शिकायतों और कार्रवाई का रखा पक्ष, जनसुनवाई से लेकर अवकाश और बदलते बयानों तक कई सवालों के जवाब बाकी
दमोह जिले के पटेरा स्थित उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सामने आए वायरल वीडियो ने अब केवल एक भाषण को लेकर विवाद खड़ा नहीं किया है, बल्कि विद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था, शिक्षकों की कार्यप्रणाली, शिकायतों के लिए निर्धारित प्रक्रिया और राष्ट्रीय पर्व के मंच के उपयोग को लेकर भी कई सवाल सामने ला दिए हैं।वायरल वीडियो में शिक्षिका एवं पूर्व प्रभारी प्राचार्य वंदना भोज छात्र-छात्राओं को संबोधित करती नजर आ रही हैं। वीडियो में उनके द्वारा विद्यालय के वर्तमान प्राचार्य शैलेंद्र शर्मा को लेकर कुछ आरोप लगाए जाने की बात सामने आई है। वीडियो के सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के बाद मामला प्रशासन के संज्ञान में आया और अब शिक्षिका को नोटिस जारी किए जाने के साथ पूरे घटनाक्रम की जांच हटा एसडीएम को सौंपी गई है।
हालांकि, इस मामले में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी जांच का विषय है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को आरोपों के आधार पर दोषी मानना उचित नहीं होगा। लेकिन जिस तरह यह पूरा घटनाक्रम सामने आया है, उसने कुछ ऐसे सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब प्रशासनिक जांच से सामने आना जरूरी है।
प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की, जिला शिक्षा अधिकारी ने रखा विभाग का पक्ष
जिला शिक्षा अधिकारी सत्यम चौरसिया के अनुसार वंदना भोज को पूर्व में कुछ शिकायतों और विभागीय स्तर पर सामने आए मामलों के आधार पर प्रभारी प्राचार्य की जिम्मेदारी से हटाया गया था। उनके अनुसार विद्यालय में शासन की ओर से विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई जाने वाली पुस्तकों से संबंधित अनियमितता, विद्यालय की प्रगति रिपोर्ट से जुड़े मामले तथा छात्र संगठन की ओर से कलेक्टर को की गई शिकायतें कार्रवाई के आधार में शामिल थीं।
जिला शिक्षा अधिकारी ने यह भी बताया कि इन मामलों को लेकर जांच की प्रक्रिया चल रही है और वर्तमान घटनाक्रम की जांच हटा एसडीएम को सौंपी गई है।अब सवाल यह है कि यदि पूर्व में भी शिकायतें सामने आई थीं तो उनकी जांच किस स्तर तक पहुंची? उन शिकायतों में क्या तथ्य सामने आए? क्या विभागीय कार्रवाई नियमानुसार हुई? और यदि जांच अभी लंबित है तो उसके अंतिम परिणाम क्या होंगे?इन सभी सवालों का जवाब संबंधित दस्तावेज और जांच के निष्कर्ष ही दे सकते हैं।
राष्ट्रीय पर्व के मंच से उठे आरोपों पर सबसे बड़ा सवाल
स्वतंत्रता दिवस विद्यालयों के लिए सामान्य कार्यक्रम नहीं होता। यह वह अवसर होता है जब शिक्षक विद्यार्थियों के सामने देश, संविधान, स्वतंत्रता और नागरिक कर्तव्यों की बात रखते हैं।ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी शिक्षक को किसी सहकर्मी या अधिकारी से गंभीर शिकायत थी तो क्या उसके लिए राष्ट्रीय पर्व का मंच उपयुक्त माध्यम था?क्या ऐसी शिकायत विभागीय अधिकारियों, जनसुनवाई, लिखित आवेदन या अन्य वैधानिक माध्यमों से रखना अधिक उचित नहीं होता?यदि शिकायत वास्तव में गंभीर है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन क्या बच्चों के सामने आरोपों को सार्वजनिक करना विद्यालय के शैक्षणिक वातावरण के लिए उचित है?यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि विद्यालय की गरिमा और विद्यार्थियों पर पड़ने वाले प्रभाव का है।
आरोपों की गंभीरता के साथ प्रमाण भी जरूरी
मामले में शैलेंद्र शर्मा के विरुद्ध अभद्र व्यवहार और अन्य गंभीर आरोप लगाए जाने की बात सामने आई है। ऐसे आरोपों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन किसी भी आरोप को प्रमाणित तथ्य मानने से पहले जांच आवश्यक है।कानून का सामान्य सिद्धांत यही है कि आरोप और अपराध सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं।इसलिए अब जांच में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों के समर्थन में क्या साक्ष्य हैं, संबंधित पक्षों के बयान क्या हैं और उपलब्ध दस्तावेज क्या कहते हैं।यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो संबंधित व्यक्ति की स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए।
अवकाश को लेकर भी उठ रहे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में शिक्षिका के जनसुनवाई और जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में मौजूद रहने को लेकर भी क्षेत्र में चर्चा है। यह चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि यह सवाल उठाया जा रहा है कि जिस दिन वह विद्यालय की नियमित ड्यूटी पर नहीं थीं, उस दिन उनकी अनुपस्थिति किस प्रकार दर्ज हुई थी।यदि शिक्षिका अवकाश पर थीं तो क्या उनका अवकाश स्वीकृत था?यदि मेडिकल अवकाश का दावा किया गया था तो क्या नियमानुसार मेडिकल दस्तावेज प्रस्तुत किए गए?यदि सामान्य अवकाश था तो क्या उसकी अनुमति संबंधित अधिकारी से ली गई थी?और यदि कोई स्वीकृत अवकाश नहीं था तो उनकी अनुपस्थिति का विभागीय रिकॉर्ड क्या कहता है?इन सवालों का जवाब रिकॉर्ड से आसानी से सामने आ सकता है। इसलिए इस विषय में किसी तरह की धारणा बनाने के बजाय विभागीय अभिलेखों की जांच ही सबसे उचित रास्ता है।
क्या बयान बदले या संदर्भ अलग-अलग सामने आए?
मामले की चर्चा के दौरान शिक्षिका की ओर से अलग-अलग अवसरों पर कही गई बातों और वायरल वीडियो में सामने आए कथनों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि किसी शिकायत या घटना के संबंध में अलग-अलग समय पर अलग-अलग तथ्य सामने आते हैं तो जांच अधिकारी के लिए यह देखना आवश्यक हो जाता है कि मूल घटनाक्रम क्या था।क्या बयान शब्दशः एक जैसे हैं?क्या किसी आरोप में बाद में कोई बदलाव हुआ?क्या किसी बात को वीडियो में एक संदर्भ में और शिकायत में दूसरे संदर्भ में प्रस्तुत किया गया?या फिर अलग-अलग परिस्थितियों में कही गई बातों को अलग तरीके से समझा जा रहा है?इन प्रश्नों का उत्तर केवल निष्पक्ष जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड से ही मिल सकता है। किसी व्यक्ति पर जानबूझकर झूठ बोलने या गलत आरोप लगाने का निष्कर्ष जांच पूरी होने से पहले निकालना उचित नहीं होगा।
एक शिक्षक के साथ लगातार मौजूदगी भी चर्चा का विषय
इस घटनाक्रम के दौरान एक अन्य शिक्षक द्वारा वंदना भोज के साथ लगातार रहने और जनसुनवाई से लेकर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय तक उनके साथ मौजूद रहने को लेकर भी क्षेत्र में चर्चाएं सामने आई हैं।यहां भी सवाल किसी शिक्षक के साथ खड़े होने को अपने आप में गलत ठहराने का नहीं है। किसी सहकर्मी का किसी दूसरे कर्मचारी को प्रशासनिक प्रक्रिया समझने या आवेदन प्रस्तुत करने में सहयोग करना सामान्य बात हो सकती है।लेकिन यदि किसी व्यक्ति की भूमिका लगातार और सक्रिय रूप से किसी एक पक्ष के साथ दिखाई देती है तो प्रशासन के लिए यह स्पष्ट करना उपयोगी होगा कि उनकी भूमिका क्या थी? क्या वे केवल सहकर्मी के रूप में सहयोग कर रहे थे? क्या उनके पास कोई आधिकारिक जिम्मेदारी थी? या वे व्यक्तिगत स्तर पर सहायता कर रहे थे?इन सवालों का जवाब संबंधित व्यक्तियों से पूछताछ और उपलब्ध रिकॉर्ड से सामने आ सकता है। केवल साथ दिखाई देने के आधार पर किसी प्रकार का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
विभागीय निर्णयों के पीछे की पूरी कहानी सामने आना जरूरी
वंदना भोज को प्रभारी प्राचार्य के पद से हटाकर शैलेंद्र शर्मा को जिम्मेदारी दिए जाने के बाद विवाद और अधिक चर्चा में आया। इसलिए जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी होना चाहिए कि प्राचार्य पद की जिम्मेदारी बदलने का प्रशासनिक आदेश किन परिस्थितियों में जारी हुआ था।क्या इसके पीछे पूर्व में प्राप्त शिकायतें थीं?
क्या कोई विभागीय जांच चल रही थी?क्या पद परिवर्तन सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा था?क्या इससे संबंधित कोई लिखित आदेश या अभिलेख मौजूद हैं?यदि इन सवालों के जवाब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर स्पष्ट हो जाएं तो कई तरह की चर्चाओं पर स्वतः विराम लग सकता है।
बच्चों के सामने विवाद आखिर क्यों?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पक्ष विद्यार्थी हैं।बच्चे विद्यालय में शिक्षा लेने आते हैं। शिक्षक उनके लिए अनुशासन, व्यवहार और संवाद के उदाहरण होते हैं। यदि विद्यालय के भीतर शिक्षकों के बीच विवाद है तो उसका प्रभाव विद्यार्थियों पर पड़ना स्वाभाविक है।इसलिए सवाल यह भी है कि क्या व्यक्तिगत अथवा प्रशासनिक विवादों को बच्चों के सामने लाना उनकी शिक्षा और मानसिक वातावरण के लिए उचित है?यदि शिक्षक को शिकायत है तो वह शिकायत अवश्य करे, लेकिन क्या उसके लिए विद्यालय का मंच इस्तेमाल करना उचित है?और यदि किसी शिक्षक पर आरोप हैं तो क्या उसका जवाब भी विद्यालय के विद्यार्थियों के सामने देने के बजाय सक्षम अधिकारी के समक्ष देना ज्यादा उचित नहीं होगा?
अब एसडीएम जांच में क्या सामने आता है, यह महत्वपूर्ण
फिलहाल प्रशासन ने मामले को जांच के दायरे में ले लिया है। शिक्षिका को नोटिस दिया गया है और हटा एसडीएम को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है। जिला शिक्षा अधिकारी ने भी पूर्व की शिकायतों और विभागीय कार्रवाई से संबंधित अपना पक्ष सामने रखा है।अब सबसे जरूरी है कि जांच केवल वायरल वीडियो तक सीमित न रहे।वायरल वीडियो की पूरी रिकॉर्डिंग, कार्यक्रम का संदर्भ, शिक्षिका का स्पष्टीकरण, संबंधित प्राचार्य का पक्ष, पूर्व में की गई शिकायतें, विभागीय आदेश, विद्यालय के अभिलेख, अवकाश से संबंधित रिकॉर्ड और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों को भी जांच का हिस्सा बनाया जाए।यदि किसी शिकायत में तथ्य हैं तो वे सामने आने चाहिए। यदि किसी आरोप में तथ्य नहीं हैं तो वह भी स्पष्ट होना चाहिए।
विवाद से बड़ा है विद्यालय की गरिमा का प्रश्न
पटेरा का यह मामला किसी एक महिला शिक्षिका और किसी एक प्राचार्य के बीच विवाद के रूप में सीमित कर देना शायद पूरे विषय को छोटा कर देना होगा।यह मामला यह सवाल भी पूछता है कि सरकारी विद्यालयों में प्रशासनिक विवादों का समाधान किस तरह होना चाहिए? शिक्षक अपनी शिकायत किस माध्यम से रखें? विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी क्या हो? सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री को प्रशासन किस प्रकार देखे? और राष्ट्रीय पर्व जैसे अवसरों की गरिमा कैसे कायम रखी जाए?सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच से पहले किसी पक्ष को दोषी या निर्दोष घोषित करने के बजाय तथ्यों को सामने आने दिया जाए।क्योंकि यदि शिकायत सही है तो शिकायतकर्ता को न्याय मिलना चाहिए, और यदि शिकायत तथ्यहीन साबित होती है तो जिस व्यक्ति पर आरोप लगाए गए हैं, उसकी प्रतिष्ठा की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
लोकतंत्र में आवाज उठाना अधिकार है, लेकिन आरोप की सत्यता जांच का विषय है। विद्यालय में शिकायत होना असामान्य नहीं, लेकिन उसका समाधान नियम और प्रक्रिया से होना चाहिए।पटेरा के इस विवाद में अब प्रशासन के सामने चुनौती यही है कि वह बिना किसी दबाव के निष्पक्ष जांच करे और तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करे। तभी यह मामला विवाद से निकलकर एक ऐसी सीख बन सकेगा, जिससे विद्यालयों में शिकायतों के समाधान, शिक्षकों की जिम्मेदारी और विद्यार्थियों के सामने आचरण की स्पष्ट मर्यादा तय हो सके।
